31 दिसंबर की रात बचपन में या यों कहें कुछ वर्ष पहले तक मुझे सोने नहीं देती थी। मन उत्साह और रोमांच से भरा होता था कि साल के पहले दिन नव वर्ष के आने की खुशी क्या करे क्या न करे, दोस्त, मित्रों को बधाई देना अनिवार्य कार्यों में शामिल था।
घर से बाहर किंतु बहुत दूर न जाकर अपने ग्राम क्षेत्र में ही पिकनिक मनाना
उसी में हसी ठिठोली करना ये सब आज भी याद कर के आनंदित हुआ करती हूं।
आज भी 31 दिसंबर की तारीख है
वही सर्द रात है अगले दिन नव वर्ष की पहली सुबह होने वाली है किंतु ये
रात कोई उत्साह और रोमांच पैदा नहीं कर रही अब…. सोने की बैचेनी भी नहीं है क्योंकि रात्रि बस में बैठी मैं
बीते दिनों की तुलना आज से कर रही हूं…. ऐसा नहीं है मैं अकेली हूं इस सोच के साथ बस में कई लोग हैं जिन्हें नहीं फर्क पड़ रहा कि मध्य रात्रि के बाद नव वर्ष का आगमन हो रहा है सब अपने दैनिक जीवन कार्य हेतु किसी न किसी गंतव्य की ओर जा रहे हैं। अधिकांश लोग सो चुके हैं कुछ अपने मोबाइल में रिल्स स्क्रॉल कर रहें हैं। इसी क्रम में रात के बारह भी बज
गए किंतु कोई कोलाहल नहीं। यथास्थिति बनी रही। मैं स्वयं मोबाइल से थक कर उसे बैग में लॉक कर चुकी थी। महसूस हुआ मुझे… लोगों को अब बधाई देना भी बोझिल लगने लगा है, जहां पहले दोस्तो के घर तक जाकर गले मिला करते थे अब एक तीन अक्षरों का संदेश टाइप करना भी बोझिल हो गया है।
कारण जो भी है यह हमारे अंदर की उदासीनता को जाहिर करता है। ये बता रहा है कि लोगों ने अपने आप को कितना सामाजिक तौर पर समेट लिया है। जबकि समाज का अर्थ ही है लोग और उनके बीच के भावनात्मक, खून के तथा दोस्ती के रिश्ते। उत्सव मनाना समाज में ऊर्जा संचार का सबसे अच्छा माध्यम है किंतु लोगों ने इसे समय की बरबादी समझ ली है जोसमाज की नींव को कमजोर करने की शुरुआत हो सकती है।मनुष्य को चाहिए कि ऐसी नकारात्मक भावना और उदासीनता से बचा जाए। तो आइए……
मनाइए उत्सव उत्साह के साथ।🎉
Happy new year all of you 2026
