ध्यान (Meditation) : गिरीन्द्र मोहन झा

भारतीय योग-पद्धति, उपासना पद्धति की एक महत्वपूर्ण देन है।- ध्यान।
अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि आते हैं।
ध्यान शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘ध्यै’ धातु में ल्युट् प्रत्यय के योग से हुआ है।

इसका अर्थ है- चिंतन करना, मन की वृत्तियों का निरोध।
ध्यान मनुष्य के मन को कल्पवृक्ष के समान बना देता है।


महर्षि पतंजलि ने ध्यान की परिभाषा देते हुए कहा है, तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।।२।।
(जिस ध्येय वस्तु में चित्त को लगाया जाय, उसी में चित्त का एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्र की एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह चलना, उसके बीच में किसी भी दूसरी वृत्ति का न उठना ‘ध्यान’ है।)(पतंजलि योग दर्शन से)


श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परमेश्वर के ध्यान की विधि बताते हुए कहा, “एकांत में, आसन न अधिक नीचा और न अधिक ऊंचा, एक आसन में रीढ़, गर्दन आदि को सीधा रखकर नासिकाग्र पर परमेश्वर के स्वरूप का कुछ समय ध्यान करना ।”


ध्यान एक आसन पर रीढ़, गर्दन आदि को सीधा रखते हुए बैठकर किया जाता है। ध्यान का सबसे उपयुक्त समय प्रातः और सायं का समय ही होता है।
ध्यान दो प्रकार से होता है।- बहिर्मुखी और अन्तर्मुखी।


बहिर्मुखी ध्यान में किसी बाहरी बिंदु पर, आज्ञा-चक्र (दोनों भृकुटियों के मध्य), नासिकाग्र पर, ऊं पर अथवा आते-जाते श्वास पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। ध्यान का प्रारंभ प्रायः श्वास के आवागमन पर ध्यान केंद्रित करने से किया जाता है। ध्यान में परमेश्वर के स्वरूप का भी ध्यान किया जाता है।


अन्तर्मुखी ध्यान में अपने ही स्वरूप का ध्यान किया जाता है। ध्यान का उद्देश्य भी प्रायः आत्मसाक्षात्कार ही होता है। अपने भीतर उपस्थित ईश्वर का ध्यान करना । अपनी क्षमता, प्रतिभा को पहचानना। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण प्रातःकालीन सन्ध्या-वन्दन आदि से निवृत्त होकर कुछ समय अपने ही स्वरूप का ध्यान करते थे । बहिर्मुखी ध्यान से प्रारंभ होकर अन्तर्मुखी की ओर जाता है।


सुबह या शाम का समय ध्यान के लिए उचित है। कुछ समय प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान करना चाहिए।


स्वामी विवेकानंद ने कहा है, “The highest meditation is to think of nothing. If you can remain one moment without thought, great power will come.”


स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु भगवान रामकृष्ण परमहंस से पूछा, गुरुदेव ! शुकदेव जी(महर्षि वेदव्यास के पुत्र) कैसे रहा करते थे? उन्होंने कहा, ‘छि: नरेन ! तुम यहां कार्य करने आये हो, केवल ध्यान में रहने नहीं।’


श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात्-
ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्याग:
त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌॥(श्रीमद्भगवद्गीता, १२/१२)
(मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।)


भगवद् उपासना में भी आवाहन और ध्यान के पश्चात् ही पूजा-पाठ होता है।
योग- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और ध्यान और उसके लाभ को विज्ञान ने भी स्वीकार कर लिया है।
ऊर्जा विज्ञान के अनुसार, “भोजन से ऊर्जा मिलती है, नींद में ऊर्जा संग्रहित होती है, जागरण में खर्च होती है, प्राणायाम और व्यायाम से जागती है, धारणा से केन्द्रित होती है, ध्यान से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है, भय से सिकुड़ती, वासना से नीचे गिरती है, प्रेम में फैलती और विस्तृत होती और समाधि में विराट के साथ एक होती है, उसमें विलीन होती है। यह ऊर्जा का पूरा विज्ञान है।”
ध्यान से मन की एकाग्रता का विकास होता है। मन-मस्तिष्क पूर्णत: शांत हो जाता है। सभी प्रकार के तनावों से मुक्त हो जाता है। ध्यान से कोई कार्य करने का अर्थ हुआ, ‘एकाग्रतापूर्वक कार्य करना।’
अत: प्रातः या सायं कुछ समय व्यक्ति को ध्यान करना चाहिए।


– गिरीन्द्र मोहन झा

+२ भागीरथ उच्च विद्यालय, चैनपुर-पड़री, सहरसा

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