समाज में बुजुर्गों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है।
महाभारत के उद्योगपर्व में कहा गया है।-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्।।(घर के बड़े-बुजुर्गों की सेवा से आयु, विद्या, यश और बल- इन चारों की वृद्धि होती है।)
हितोपदेश का कथन है, “बुजुर्गों के वचन विपत्ति में रामबाण के समान अमोघ होते हैं।”
कहते हैं, वह घर घर नहीं, जहां बच्चे, महिलाएं और बूढ़े नहीं हों । घर के बड़े-बुजुर्गों की थोड़ी सेवा और संगति से भी विनयभाव, तथा विनयभाव के साथ-साथ वे शिक्षाएं स्वत: प्राप्त हो जाती हैं, जो उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव द्वारा अर्जित किया है।
मेरे आदरणीय गुरुदेव डॉ के एस ओझा सर कहते थे, “छोटों को प्यार देना, मगर संगत हमेशा बड़े लोगों से रखना ।”
परिवार के पूर्वज, बुजुर्ग अपने संघर्ष, उद्योग और तपस्या से कई संपदाओं, भूमि, कुल-आचार, सद्संस्कार, श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को अर्जित करते हैं, जो वंशजों, परिजनों-पुरजनों तथा संगत में रहने वाले लोगों को स्वत: प्राप्त हो जाता है। उसके संरक्षण-संवर्धन का दायित्व वंशजों का होता है।
पिता के वचनों में पूर्वजों के संस्कार-सद्विचार स्वत: झलक जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है।- मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ।।
समाज में भी कुछ बुजुर्ग ऐसे होते हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान, अनुभव, धूप-छांव से बहुत कुछ अर्जित किया है, जिनके पास थोड़ा भी बैठ जाने से हम वह सबकुछ स्वत: प्राप्त करने लगते हैं। फिर हमसे भावी पीढ़ियों में स्वत: उसका संवहन व संचारण होता है। हमारे गुरुजन भी बड़े-बुजुर्ग ही होते हैं। गुरु शब्द का अर्थ ही है।- भारी अर्थात् जो ज्ञान, अनुभव, विद्वत्ता और ईश्वरीय साधना में उच्चतर व श्रेष्ठतर हो, वही गुरु है।
वेद बुजुर्गों की परिभाषा में कहता है, “वृद्ध वे ही हैं, जो श्रेष्ठ अनुभवी व विवेकी हों, किसी भी परिस्थिति में जिनके पग विचलित न हों।”
एक संत के द्वारा कथित कथा के अनुसार, “एक जंगल में चारों ओर आग लगी थी। एक अंधा और एक लंगड़ा था । वे दोनों कैसे बचते? अंधे ने लंगड़े को कंधे पर बैठा लिया और वे दोनों आग को पार कर गये । आज भी चारों ओर आग लगी है।- ईर्ष्या-द्वेष की आग । अंधा और लंगड़ा है।- अंधी जवानी और लंगड़ा बुढ़ापा। युवावस्था जब वृद्धों के अनुभवों को लेकर आगे बढ़ेगी, तो वह हर आग से पार हो सकती है और शिखर तक पहुंच सकती है।”
भगवान राम ने वनवास के दौरान ऋषियों-मुनियों से विनम्रता और सद्व्यवहार के बल पर थोड़े देर की संगति से वे सभी शिक्षाएं और उपयोगी अस्त्र-शस्त्र स्वत: प्राप्त कर लिया, जो उन्होंने कई वर्षों की तपस्या से अर्जित किया था ।
मैंने अनुभव किया है, घर के बड़े-बुजुर्गों के पास थोड़ी देर भी बैठकर उनसे बातें कर लेने से, उनकी सेवा-शुश्रुषा कर लेने से हमें विनयभाव के साथ-साथ वह सबकुछ स्वत: प्राप्त होने लगता है, जो उन्होंने अपने जीवन के ज्ञान-अनुभव, कई धूप-छांवों से अर्जित किया है। उन बड़े-बुजुर्गों का भी मनोरंजन हो जाता है। समाज में भी कुछ ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानी, विचारशील बुजुर्ग होते हैं, जिनके सान्निध्य में कुछ समय बैठने पर भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। बड़े-बड़े कार्यक्रमों में भी उनके वचन सुनाने-सुनाने, थोड़ी देर सम्प्रेषण से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। पुस्तकों में भी लेखक अपने ज्ञान और अनुभवों को रखते हैं। कहते हैं, “यदि आपने एक पुस्तक पढ़ा तो आपने उस पुस्तक के लेखक के चालीस वर्षों को पढ़ लिया।”
श्रीमद्भगवद्गीता में भी तत्वज्ञानियों के पास श्रद्धापूर्वक बैठकर, झुककर, सेवा-सुश्रुषा कर शिक्षा-लाभ करने की बात कही गयी है।
बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों की डांट-फटकार में भी जीवन-संदेश छिपा होता है।
हमें परिवार और समाज में बड़े-बुजुर्गों का सम्मान अवश्य करना चाहिए।
कहते हैं, विषम स्थितियों में बुजुर्गों के वचन रामबाण सिद्ध होते हैं। श्री हनुमानजी ने भी बूढ़े जामवंत से ही सुझाव लिया था ।- जामवंत मैं पूछउं तोही । उचित सिखावनु दीजहु मोही ।। हमारे सनातन सांस्कृतिक पद्धति में इस प्रकार से मरणोपरांत भी अपने पूर्वजों का इस प्रकार आदर किया जाता है।- तर्पण, पार्वण आदि कर्मों द्वारा कि समाज में वृद्ध आश्रम अथवा बाल आश्रम की आवश्यकता ही न पड़े !
गिरीन्द्र मोहन झा