बच्चें और उनका समाजीकरण : आशीष अम्बर

बाल संस्कृति विशेष

विषय वस्तु :- बच्चे का विकास अधिकांशतः अनेक स्थितियों और परिस्थितियों में होता है , जो उसको एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित और परिपक्व करता है । बच्चों में यह प्रक्रिया अनेक कारकों अथवा घटकों के कारण प्रभावित होती है, जिनमें से कुछ इस प्रकार है :-

  1. परिवार (Family):- जैसा कि हमें पूर्व से ही ज्ञात है कि बच्चों की समाजीकरण की प्रक्रिया उसके अपने परिवार से ही प्रारंभ हो जाती है । बच्चा सबसे पहले अपने परिवार के ही सम्पर्क में आता है । अतः उसका अपने घर के सदस्यों जैसे – माता – पिता , भाई – बहन , चाचा – चाची , दादा – दादी आदि से एक घनिष्ठ संबंध होता है । इनके बीच दुलार – प्यार , सहयोग आदि की भावना अधिक होती है । इन सबका प्रभाव बच्चों के समाजीकरण पर स्पष्ट रूप से पड़ता है । परिवार ही वह पहली संस्था है जिसके सम्पर्क में बच्चा सबसे पहले शिष्टाचार के कुछ नियम सीखता है । परिवार के सदस्यों का व्यवहार , उनका बच्चों के प्रति रवैया , बच्चों से बात करने व उनकी बात सुनने का तरीका आदि बच्चों को दूसरों से व्यवहार करने की समझ प्रदान करता है ।
  2. साथियों का समूह ( Peer Group ):- समाजीकरण के माध्यम के रूप में परिवार के बाद साथियों का समूह बहुत अहम भूमिका निभाता है । बच्चें जब थोड़े बड़े होते हैं तो वह समान उम्र के अन्य बच्चों के सम्पर्क में आते हैं और वह एक समूह का निर्माण करते हैं । इस समूह की विशेषता यही होती है कि इसमें करीब – करीब सभी बच्चें एक ही उम्र के होते हैं परन्तु भिन्न – भिन्न परिवारों के होते हैं । विद्यालय जाने के पश्चात् बच्चे जिस तरह के समूह का हिस्सा बनते हैं, वह बहुत अलग भूमिका निभाता है । इस उम्र के बालकों के समूह प्रायः एक दूसरे पर अधिक ध्यान देते हैं तथा समूह में मौजूद अन्य सदस्यों का अनुमोदन व स्वीकृति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं । इससे बच्चों में सहयोग , सहनशीलता , सामाजिक समझ जैसे गुणों का विकास होता है जो आगे चलकर बच्चों को सामाजिक रूप से अधिक समझदार बनाता है ।
  3. विद्यालय (School):- बच्चों के समाजीकरण के साधन के रूप में विद्यालय का भी महत्व अधिक है । विद्यालय में बालकों को केवल शिक्षा ही नहीं दी जाती बल्कि सामाजिक मूल्यों , सामाजिक संज्ञान , सामाजिक मानकों व मापदंडों के आधार या ढाँचे में बच्चों को ढालते हैं । विद्यालय की भौतिक संरचना , शिक्षक , पाठ्यपुस्तक आदि का असर भी बच्चों के समाजीकरण पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है । विद्यालय में शिक्षक की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है । शिक्षक खुद किन मूल्यों / मानक पर चलते हैं, वह भी काफी हद तक बच्चे के समाजीकरण का हिस्सा है । शिक्षक बच्चों से कैसे बात करते हैं ?, कैसे उदाहरण पेश करते हैं ये सब व्यवहार बच्चों के सामाजिक विकास का अहम हिस्सा है । आमतौर पर यह देखा जाता है कि शिक्षक कक्षा में किसी बच्चे को मॉनिटर चयनित करते हैं, जो उसकी गैरहाजरी में कक्षा को संभालता है । इस दौरान बच्चा कक्ष को नियंत्रण करने और सुचारू रूप से कार्यान्वय करने हेतु वही मापदण्ड अपनाता है जो कि शिक्षक कक्षा – कक्षीय प्रक्रियाओं के दौरान अपनाते हैं । यहाँ तक कि बच्चों को संबोधित करने में, डॉटने में, निर्देश देने में इत्यादि बच्चे उसी प्रकार की भाषा का भी प्रयोग करता है जिस प्रकार शिक्षक करता है, विद्यालय में शिक्षक ही बच्चों के आपसी संबंध व उनके समाज के साथ संबंध की बुनियाद रखता है । एक और महत्वपूर्ण आयाम यह है कि शिक्षक बच्चों को किस प्रकार पठन सामग्री उपलब्ध कराते हैं । पठन सामग्री की सहायता से बच्चों में धीरे – धीरे सामाजिक मनोवृति व सांस्कृतिक मूल्यों का विकास होता है ।
  4. पास – पड़ोस (Neighborhood):- बच्चों के समाजीकरण में पास – पड़ोस भी एक महत्वपूर्ण साधन है । पार – पड़ोस के व्यक्तियों के सम्पर्क में आने से बच्चे नए – नए व्यवहार सीखते हैं । परिवार व विद्यालय के अलावा बच्चे अपने समय का कुछ भाग पास – पड़ोस के साथ बिताते हैं । यह एक ऐसा स्थान है जिससे बच्चों को हर कदम पर परामर्श मिलता है तथा आसपास हो रही क्रियाओं का अवलोकन करने का अवसर मिलता है , जिससे बच्चे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से बहुत कुछ सीखते हैं ।
  5. जाति एवं वर्ग (Caste and class) :- जाति व्यक्ति के जन्म द्वारा निर्धारित होने वाली एक ऐसी व्यवस्था है जो अपने व्यक्तियों या सदस्यों के समक्ष कुछ नियम या प्रतिबंध प्रस्तुत करता है । हमारा समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में बँटा हुआ है – उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग । यही वर्गीकरण बच्चों को आपस में बातचीत करने से बाधित करता है और बच्चे दूसरे वर्गों के प्रति वही नजरिया अपनाते हैं, जो वह बड़ों से सीखते आए हैं ।
  6. जनसंचार के माध्यम (Sources of Mass- Communication):- बच्चों के समाजीकरण पर जनसंचार के विभिन्न माध्यमों का भी उतना ही प्रभाव पड़ता है जितना अन्य कारकों का । आजकल बच्चों का अधिकतर समय टी० वी० एवं मोबाइल फोन देखने में ही व्यतीत होता है । बच्चे आरंभ से ही जनसंचार के विभिन्न साधनों के सम्पर्क में रहते हैं जैसे – टी० वी० , रेडियो , कम्प्यूटर , इंटरनेट, पत्र – पत्रिकाएँ , मोबाइल आदि । इन सभी साधनों से बच्चों नई जानकारी तो मिलती है साथ में वह बहुत लोगों से सम्पर्क बना पाते हैं । परन्तु यह समझना भी जरूरी है कि इन सब के माध्यम से क्या जानकारी मिल रही है और बच्चे इसे कैसे समझ रहें हैं । अतः हम यह सावधानी पूर्वक देखना होगा कि समाजीकरण के आड़ में बच्चें कहीं इन सब माध्यमों का दुरुपयोग तो नही कर रहें हैं । हमें बस सचेत रहने की आवश्यकता है ।

सारांश :- निष्कर्ष यह निकलता है कि बच्चों के समाजीकरण में उपरोक्त सभी पहलुओं के सकारत्मक पक्ष पर ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है । चूँकि हमारे बच्चें आने वाली पीढ़ी की जिम्मेदारी एवं उत्तराधिकारी हैं इसलिए हमें उनसे जुड़कर रहना होगा ।

संदर्भ :- समाचार पत्र एवं अन्य स्रोत ।

आशीष अम्बर
( विशिष्ट शिक्षक)
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
जिला – दरभंगा
बिहार

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