ज़िंदगी में लोग भी कितने अजीब होते हैं… पहले कहते हैं—“हम हैं न, तुम्हारे साथ।” कुछ वक़्त तक हाथ थामते[...]
Category: संस्मरण
सहसा स्मरण में आती वह चहचहाहट : उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’सहसा स्मरण में आती वह चहचहाहट : उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’
बसंत का समय था। पेड़ों पर पतझर की आहट सुनाई देने लगी थी और कहीं-कहीं हरे पत्ते अपनी उपस्थिति का[...]
अल्पसंख्यक इलाके में बच्चों को स्कूल तक लाना : डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्याअल्पसंख्यक इलाके में बच्चों को स्कूल तक लाना : डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या
बिहार की साक्षरता दर भारत के औसत दर से कम है उसपर बिहार के पिछड़े इलाके इस अल्पसंख्यक इलाके का[...]
कुछ रिश्ते शब्दों से परे होतें हैं : चन्दन कुमार उर्फ मनीष अग्रवालकुछ रिश्ते शब्दों से परे होतें हैं : चन्दन कुमार उर्फ मनीष अग्रवाल
(एक शिक्षक की आत्मीय यात्रा)लेख विधा :- संस्मरण कुछ रिश्ते शब्दों से परे होते हैं, और कुछ पलों की आवाजें[...]
पहला झूठ और पहली सज़ा : सुरेश कुमार गौरवपहला झूठ और पहली सज़ा : सुरेश कुमार गौरव
बचपन में कोई सिखाता नहीं कि झूठ बोलना बुरा है, पर जब बोलते हैं और पकड़े जाते हैं – तभी[...]
डिबिया-सत्यम कुमारडिबिया-सत्यम कुमार
डिबिया डिबिया का नाम सुनते ही सामने वो ग्राइप वाटर की शीशी के ढक्कन में[...]