बचपन में रामू महतो और मनोहर सिंह के बीच दांत कटी दोस्ती थी, ना जात का बंधन ना अमीरी का रोब प्राथमिक विद्यालय भरगामा में दोनों साथ पढ़ते थे। उस वक्त कोई प्राइवेट स्कूल नहीं होता था, सब के लिए एक ही विद्यालय की व्यवस्था थी। भरगामा ब्लाक चौक पर सहुवा का एक टूटा -फूटा पुराना होटल था जहां सिर्फ एक ही किस्म की मिठाई बनती थी, जिसे अमीर और गरीब दोनों खाते थे। हाट हो या बाजार एक ही तरह की वस्तु की बिक्री होती थी। अमीर हो या गरीब एक साथ बैठकर भोज खाते थे, लेकिन गांव में आई आर्थिक सम्पन्नता ने अमीर और गरीब के बीच एक लकीर खींच दी थी। उनके लिए बाजार भी अलग हो गये थे, टोले में आई धन ने अंहकार को जन्म दिया था। अब गांव के अमीर-गरीब एक साथ बैठना नहीं चाहते थे।
उधर समय के साथ रामू और मनोहर की दोस्ती का भी प्रमोशन हो गया था। अब रामू महतो दलित हो गये थे और मनोहर सिंह बबुवान। मनोहर सिंह को शहर में मास्टरी की नौकरी लग गई थी, इसलिए अब वो गांव कम ही आते थे।
इधर महतो जी गांव में लीज पर जमीन लेकर खेती-बाड़ी करने लगे थे। उनकी पत्नी, बच्चें सब उनके काम में हाथ बंटाते थे । महतो की माली हालत कुछ खास ठीक नहीं थी । एक ही कपड़े उसके परिवार के लोग बरसों शरीर पर धूनते रहते थे ।
मनोहर सिंह ने तो महतो की दोस्ती को कब का भूला दिया था, मगर महतो है की ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ वो बचपन की दोस्ती को जबरदस्ती ढोते चले जा रहे थे । जब भी उन्हें मौक़ा मिलता ,वह मनोहर से मिलने शहर चला जाता था । मनोहर उसके मैले-कुचैले कपड़े देखकर नाक भौं सिकोड़ने लगते थे। उनकी पत्नी लक्ष्मी भी उसे देखकर चिढ़ने लगती थी , मगर पुरानी दोस्ती का वास्ता था , इसलिए मज़बूरी बस उसे ऊपर मन से रिश्ता निभाना पड़ता था । महतो की एक और आदत थी जब वो मनोहर से भेंट कर वापस घर आने लगते , तो मनोहर के बेटे और बेटी को बीस रूपैया का नोट देना नहीं भूलते थे । कभी-कभी तो उनका नोट इतना पूराना और गंदा होता था की लक्ष्मी उस नोट को देखते ही अन्दर से भड़क उठती और अपने बेटे के हाथ से छिनकर उसे चुपचाप खिड़की पर रख देती थी ।
मानव का शरीर और मशीनरी चीज़ का क्या भरोसा, ये कभी भी दगा दे सकता है । दो महीने बाद अगस्त की अठाईस तारीख़ थी लक्ष्मी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। महीने का अंतिम समय चल रहा था , मनोहर के हाथ भी खाली थे । उन्होंने अपने रिश्तेदारों को फोन किया , सबने पैसे भेजे मगर लक्ष्मी से मिलने सिर्फ उसकी बहन देवयंती आई , वो भी घर परिवार में अकेली होने का बहाना बनाकर दो बजे वापस अस्पताल से रुखसत हो गई। मनोहर के पास पैसा तो था मगर आदमी का अभाव था ।
फिर डाक्टर ने कल के आपरेशन के लिए 3 युनिट ब्लड की भी मांग की थी । दो छोटे बच्चें का टेंशन और उधर पत्नी की आपरेशन की समस्या , मनोहर गंभीर सोच में पड़ गया।
तभी उसकी नज़र बाहर आटो पर पड़ी। महतो अपनी पत्नी और एक बेटे के साथ आटो से बाहर निकल रहे थे । मनोहर को ऐसा लगा जैसे बुझते दीपक के जड़ में किसी ने तेल डाल दिया हो । मनोहर अस्पताल के कुर्सी पर सर झुकाए बैठा हुआ था । महतो ने उसके पीठ पर हाथ रखते हुए कहा–” “कल साइकिल से…बीज लाने..बाजार.जा .रहे.थे , .तुम्हारे. पड़ोस के शंकर. भैया .मिले.थे। .उन्होंने .ही .मुझे .सब. बात .बताया।
मैले-कुचैले कपड़े में लिपटीं महतो की पत्नी रामगंज वाली ने भी मनोहर से कहा — ” चिंता ने करूं भाय जी कुछो ने हेते दीदी के, हमरा सब येते रहबे भर रात यहां के साथ में”।
” हां मनोहर ” चिंता मत करो , किसका क्या बिगाड़े हो तुम जो तुम्हारा बुरा होगा, भगवान सब ठीक कर देगें , ये पांच हजार रूपैये है , इसे रख लो ।” महतो ने कहा
मनोहर की आंखों डबडबा आईं थीं , वह पैर की मोटी अंगुली से फर्श के टाइल्स को कुरेद रहा था।
अगले रोज आपरेशन हुआ, दो युनिट ब्लड खरीदे गये , एक युनिट महतो की पत्नी ने भी डोनेट किया। आपरेशन सफल रहा महीनों बाद स्वस्थ होकर मनोहर और उसकी पत्नी भरगामा आये थे । मगर अपने यहां नहीं बल्कि अपने बाल सखा महतो के यहां ।
मनोहर को अपने टुटली मरैया में आते देख महतो को लगा जैसे सबरी की कुटिया में श्री राम जी आ गये हो। महतो की पत्नी और बच्चे की खूशी का ठिकाना न था । महतो अपने दोस्त के लिए मैले-कुचैले गमछे से कुर्सी पोंछ रहे थे । मनोहर उसके हाथ से गमछा छिनकर अलग रख दिया । और फिर अगले ही क्षण दोनों दोस्त एक दूसरे की बाहों में थे । एक क्षण के लिए बचपन की सारी यादें दोनों के मानस पटल पर बिजली की तरह कौंध गई ।
अरविंद कुमार, भरगामा