राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के केन्द्रीय बिंदु और परिकल्पनाएँ : आशीष अम्बर

मानव जीवन में शिक्षा का महत्व इसी से पता चलता है कि मानव को जीवों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । मनुष्य अपने सोचने , सीखने तथा कल्पना करने की अद्भुत क्षमता रखता है । मानव जीवन की आधारभूता , परम प्रकाश पुञ्जात्मिका , सकल लोक कल्याज कारिका , जीवन के सर्वांगीण विकास में प्रमुख सहायिका , अज्ञान – सन्देह – धर्माडम्बर – कुरीति निवारिका , रचनात्मक – क्रियात्मक – कौशलात्मक अभिवृत्तियों की उत्पादिका , सत् – असत् की परिचायिका , ज्ञान – अज्ञान की विभेदिका , यश – सम्मान – स्वाभिमान की वर्धिका , निद्रा – तन्द्रा – भय – क्रोध – आलस्य – दीर्घसूत्रता आदि दुर्गुणों की नाशिका, मानवीय गुण – आचारों की संरक्षिका , ज्ञान – विज्ञान की पोषिका शिक्षा ( विद्या) मानव के समग्र कल्याण एवं सर्वविध प्रसन्नता का मूल स्त्रोत है । गांधीवादी विचारक , लब्ध प्रतिष्ठित नेल्सन मंडेला के अनुसार – Education is the most powerful weapon which you can use to change the world. मानवीय जीवन में नैतिकता , तार्किकता , करुण्यता , संवेदनशीलता को विकसित करने में शिक्षा ही परम सहायिका है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति :- जैसे एक छोटी – से – छोटी संस्था को संचालित करने के लिए कुछ लिखित नियमों की आवश्यकता होती है, देश को व्यवस्थित एवं सुचारु रूप से चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है उसी प्रकार से मानव जीवन की आधारभूत देश की शिक्षा प्रणाली को संचालित करने के लिए राष्ट्र में एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आवश्यकता होती है , ताकि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक शिक्षित होकर अपने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक उत्तरदायित्वों , कर्तव्यों और मानवीय मूल्यों को समझते हुए व्यक्तिगत उन्नति के साथ राष्ट्रीय उन्नति में योगदान दे सके तथा कालक्रम के अनुसार स्वयं को वैश्वीकृत व्यक्ति बना सके । किसी भी राष्ट्र के विकास में शिक्षा एक आधारभूत स्तंभ होती है । जिस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति होती है उसी नीति के अनुरूप भावी पीढ़ी का भी विकास हो पाता है । शिक्षा नीति जितनी व्यवहारिक, समसामायिक, राष्ट्रीय भावना से युक्त होगी उतनी ही वह राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकती है ।

यह संसार सदा परिवर्तनशील होती है इसी कारण बदलते वैश्विक परिदृश्य में अर्थव्यवस्था के द्वारा प्रत्येक नागरिक की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु, समयानुसार शैक्षिक अनुसंधान, नवाचार एवं शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाने , पिछली कमियों को दूर करने के लिए तथा शिक्षा के माध्यक से भावी पीढ़ी को वैश्विक जगत में प्रतिष्ठापित करने के लिए समय – समय पर राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों की आवश्यकता अनुभूत होती है । भारत वर्ष यद्धपि प्राचीन समय से ही शिक्षा का एक केन्द्र बिन्दु के रूप में प्रसिद्ध था , प्राचीनकाल में नालन्दा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे उच्च स्तरीय शैक्षिक संस्थान यहाँ पर प्रतिष्ठित थे तथापि अंग्रेजों के शासनकाल में उनकी नीति , भाषा, संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय शिक्षा आयोग ( हंटर कमीशन 1882) लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति का भारतीय विश्वविद्यालय आयोग , लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति सहित विभिन्न राष्ट्रीय शिक्षा आयोग तथा नीतियाँ बनती रही तदनुरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् सन् 1948 में महान शिक्षाविद् डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही भारत में शिक्षा प्रणाली को भारतीय बनाने एवं सुव्यवस्थित करने का कार्य प्रारंभ हो गया था ।

इसके उपरांत क्रमशः सन् 1952 में श्री लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग , श्री दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में 1964 में गठित राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की संस्तुतियों पर सन् 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रस्तावित की गई जिसमें सर्वसमावेशी, कार्यकुशल, चरित्रवान , राष्ट्र के प्रति वचनबद्ध युवा नागरिकों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया । ‘ ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड ‘ के नाम से प्रसिद्ध आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में मई 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के द्वारा देश की विशाल जनसंख्या को देखते हुए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया, प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण को स्वीकार करते हुए खुला या दूरस्थ विश्वविद्यालय , नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, आश्रम पद्धति विद्यालय , प्राथमिक शिक्षा अभियान , सर्व शिक्षा अभियान आदि योजनाएँ संचालित हुई है इसी में किञ्चित् संशोधन हेतु 1992 में एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एवं शिक्षक , लब्ध पद्मभूषण प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में समिति गठित की इस समिति ने बस्ते के बोझ को कम करने के साथ ही विभिन्न सुझाव दिए इसी समिति की अनुशंसा पर सन् 2005 शिक्षा बिना बोझ के शीर्षक पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का फ्रेमवर्क तैयार किया गया । भारतीय संविधान के भाग चतुर्थ में राज्य के नीति निदेशक सिद्धन्तों के अन्तर्गत अनुच्छेद 45 के तहत् उल्लिखित किया गया था कि प्राथमिक स्तर के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जाए इसी क्रम में प्राथमिक शिक्षा को सर्व – सुलभ एवं सार्वभौमिक बनाने के लिए 86 वाँ संविधान संशोधन करते हुए 2009 निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम बनाया जाना इस दौरान विशेष कार्य रहा ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 :-

देश की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मानवीय गुणों से युक्त लोगों का विकास करना होता है , जो व्यक्तिगत उन्नति के साथ राष्ट्रीय उन्नति में भी भागीदार बन सकें साथ ही जिनमें तर्क संगत विचारों के साथ दया, करुणा, सहानुभूति, साहस , वैज्ञानिक चिंतन , रचनात्मक कल्पना शक्ति और तार्किक शक्ति का प्रवाह विद्यमान हो ।

इन्हीं उद्देश्यों को सार्थक करने के लिए भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई , 2020 को अन्तरिक्ष वैज्ञानिक के . कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा प्रस्तावित नई शिक्षा नीति का लक्ष्य भारतीय मूल्यों से विकसित एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास करना है, जो प्राथमिक से उच्चतर शिक्षा पर्यन्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराके और भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाकर भारत को एक जीवन्त और न्यासंगत ज्ञान समाज में परिवर्तित करने के लिए योगदान करेगी । भारत द्वारा 2015 में अपनाए गए सतत् विकास एजेंडा 2030 लक्ष्य के अनुरूप सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने और जीवन पर्यन्त शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने का लक्ष्य है । इसी के अनुसार 2030 तक सकल नामांकन अनुपात Gross Enrollment Ratio — GER 100% का लक्ष्य रखा गया है और शिक्षा क्षेत्र पर सकल घरेलू उत्पाद के 6% हिस्से के सार्वजनिक व्यय का लक्ष्य रखा गया है ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के केंद्रीय बिंदु : –

किसी भी राष्ट्र के विकास में उस देश के नागरिकों की शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिस देश में शिक्षा का स्तर जितना मजबूत होगा वह राष्ट्र उतनी मजबूती एवं तेजी के साथ विकास करेगा । विकासशील देश से जल्दी ही भारत विकसित राष्ट्र के रूप में परिवर्तित हो इस उद्देश्य से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को प्रारम्भ कर दिया गया है, जो शिक्षा नीति पुराना शिक्षा नीतियों से राष्ट्रोपयोगी अनुकूल प्रतीत होती है । नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के केद्रीय बिंदुओं को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. विद्यालयीय शिक्षा (School Education) – उक्त नीति के द्वारा सन् 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विहित 10+2 के पिछले अकादमिक ढाँचे को परिवर्तित करके पाठ्यचर्या एवं शिक्षण शास्त्रीय आधार पर 3 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए 5+3+3+4 नई तार्किक व्यवस्था परिकल्पित की गई है ।
    फाउंडेशन स्टेज में 3 से 8 वर्ष तक भाषा – गणित , प्रीप्रेटरी स्टेज 8 से 11 वर्ष तक विज्ञान, गणित कला , मिडिल स्टेज 11 से 14 वर्ष तक कौशल विकास कोर्स, सेकेन्डरी स्टेज 14 से 18 वर्ष तक विषय चयन करने की आजादी उक्त नीति में रखी गई है । इस प्रकार उपर्युक्त रूप से स्कूल शिक्षा को चार भागों में बाँटा गया है –
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 के अनुरूप पांचवीं कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा / स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है । साथ ही कक्षा आठवीं और आगे की शिक्षा के लिए बहुभाषिकता , भाषा शक्ति को प्रोत्साहन , त्रिभाषा सूत्र को जारी रखने का सुझाव दिए गए हैं ।
  • भाषा के चुनाव के लिए छात्रों पर कोई बाध्यता नही रखी गई है उनके लिए संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं को पढ़ने के विकल्प मौजूद हैं ।
  • अंग्रेजी के साथ ही विदेशी भाषाएँ जैसे – कोरियाई, जापानी, थाई, फ्रेंच , जर्मन, स्पेनिश, पुर्तगाली और रूसी भी माध्यमिक स्तर पर व्यापक रूप से उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है ताकि विद्यार्थी विश्व के अन्य संस्कृतियों और विषय को जाने और अपनी रूचियों और आकांक्षाओं के अनुसार अपने आप को वैश्विक बन सके ।
  • कक्षा – 10वीं बोर्ड की अनिवार्यता खत्म करके सिर्फ बारहवीं की परीक्षा बोर्ड आधार पर आयोजित होगी ।
  • संगीत, खेल , योग को अतिरिक्त पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा ।
  • इस नीति में संगीत , खेल , योग को अतिरिक्त पाठ्यक्रम की बजाए मुख्य पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा ।
  • इस नीति में समग्र बहु – विषयक शिक्षा के साथ कला , विज्ञान , वाणिज्य विषयों में कोई अलगाव की स्थिति नहीं रहेगी । परस्पर कला विषय के साथ विज्ञान और विज्ञान – वाणिज्य आदि के साथ कला के सामाजिक विज्ञान , भूगोल , इतिहास, राजनीति शास्त्र , अर्थशास्त्र इत्यादि विषयों को पढ़ने की स्वतंत्रता रहेगी ।
  • अवधारणात्मक समझ पर जोर के साथ रटन्त विद्या को समाप्त करके खेल – खेल में शिक्षा को बढ़ावा देते हुए विद्यार्थियों की रचनात्मकता , मौलिकता, एवं जीवन कौशल का विकास करना ।
  • शिक्षण पेशे में योग्यतम विद्यार्थी आएं इसके लिए 4 वर्षीय एकीकृत बी . एड . पाठ्यकम में अध्ययन के लिए बढ़ी संख्या में मेरिट आधरित छात्रवृति को आयोजित किया जाएगा जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के योग्य युवाओं के लिए शिक्षा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे ।
  • आकांक्षी जिले ( Aspirational Districts) ऐसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में आर्थिक, सामाजिक, या जातिगत बाधाओं का सामना करने वाले छात्र पाए जाते हैं उन्हें ‘ विशेष शैक्षिक क्षेत्र ‘ (Special Educational Zones) के रूप में नामित किया जाएगा ।
  • कक्षा – 6 से कोडिंग और व्यवसायिक अध्ययन के साथ एक नया स्कूल पाठ्यकम शुरू किया जाएगा ।
  • द डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नालेज शेयरिंग ( दीक्षा – DIKSHA) पर बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान पर उच्चतर गुणवत्ता वाले संसाधनों का एक राष्ट्रीय भण्डार उपलब्ध कराया जाएगा ।
  1. उच्च शिक्षा (Higher Education) :- उच्च शिक्षा मनुष्य एवं सामाजिक कल्याण के विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । बढ़ते हुए वैश्वीकरण काल में उच्च शिक्षा की भूमिका और अधिक उच्च होते जा रही है ।
  • उच्चतर शिक्षा की नियामक प्रणाली में आमूल – चूल परिवर्तन प्रस्तावित है । उच्च शिक्षा में विनियमन , प्रत्यायन, वित्त – पोषण और शैक्षणिक मानकों के निर्धारण जैसे – विशिष्ट कार्य, विशिष्ट स्वतंत्र और सशक्त संस्थाओं / व्यवस्थाओं द्वारा संचालित किए जायेंगे ।
  • विषयों की ढील के साथ शिक्षा के प्रति एक समग्र और बहु – आयामी दृष्टिकोण अपनाया जाएगा । स्नातक की डिग्री 3 वर्ष और 4 वर्ष की होगी इसमें पहले वर्ष की शिक्षा पूर्ण करने पर प्रकाण – पत्र , दूसरे वर्ष में डिप्लोमा, तीसरे और चौथे वर्ष में उपाधि दी जाएगी । 3 वर्ष की उपाधि उनको दी जाएगी जो आगे की पढ़ाई नहीं करना चाहते हों चौथे वर्ष की उपाधि लेने पर एक वर्ष में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त हो सकेगी । 4 वर्षीय स्नातक (UG) सहित स्नातकोत्तर(PG) पाठ्यक्रमों में choice Based credit system ( सी बी सी एस) लागू किया जाएगा ।
  • सन् 2035 तक उच्च शिक्षा सहित व्यवहारिक शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 26.3% से बढ़ाकर 50% तय करना है ।
  • प्रत्येक उच्च शैक्षणिक संस्थान में छात्रों के तनाव, अवसाद, एवं सांवेगिकता संभालने हेतु परामर्श (Councelling) प्रणाली प्रारंभ की जाएगी ।
  • अनुसंधान और नवाचार को उत्प्रेरित और विस्तारित करने के लिए देशभर में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन नामक नई इकाई स्थापित की जाएगी ।
  • व्यवसायिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, मुक्त शिक्षा, भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति का संवर्धन , शिक्षा में प्रौद्योगिकी का उपयोग एवं एकीकरण , ऑनलाइन एवं डिजिटल शिक्षा आदि को सतत् सर्वजनोपयोगी बनाना तथा बढ़ावा देना नई शिक्षा नीति के द्वारा निर्दिष्ट किया गया है । इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सफल बनाने के लिए केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् के सशक्तीकरण पर भी जोर दिया गया है और इसी नीति की अनुशंसा पर केवल एक दृष्टि रखने के उद्देश्य से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम पुनः ‘ शिक्षा मंत्रालय’ कर दिया गया है ।

निष्कर्ष :- बदलते वैश्विक परिदृश्य के कारण भारतीय शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन हेतु केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने जिस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दी है शिक्षा समवर्ती सूची का विषय होने के कारण यदि राज्य सरकारें दृढ़ इच्छ से राजनैतिक निहितार्थों को अलग रखकर ‘. एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना से इस नीति के केन्द्रीय बिंदुओं को यथावत लागू करती है, तो निःसंदेह नीति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए भावी विकसित भारत के मार्ग में प्रवेश कर सकती है .

आशीष अम्बर
पदनाम – ( विशिष्ट शिक्षक)
संस्थान का नाम : उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
दरभंगा बिहार

पत्राचार का पता :-
आशीष अम्बर
clo – सुरेश कुमार प्रसाद
ग्राम + पो० – रमनी रामपुर छतवन
भाया – रैयाम
जिला – दरभंगा
बिहार
पिन -847337
Mob.no- 7903541035.
Email – ashishambar971@gmail.com

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