गुनगुनी धूप, मंद हवा, मौसम का नशा प्रेम की अगन को और भड़काता है। यौवन अंगड़ाई लेने लगती हैं। तापमान न अधिक ठंडा, न अधिक गर्म। सुहाना समय चारों ओर सुंदर दृश्य, सुगंधित पुष्प, जल से भरे सरोवर, आम के वृक्षों पर कोयल ..कूकू.. कु.. हुक.. कूकू.. कु. हुक.. कर गीत गाने लगती हैं तब प्रीत उत्साह से भर उठता हैं ।
सरसों,जौ, गेहूं,आलू,मटर की फसलें तैयार होने को होती है। भौंरे, मधुमक्खी फूलों का रस चूसकर जमा करने लगती है। आमों के पेड़ों पर मंजर आने लगते है। रंग बिरंगी तितलियां चारों तरफ मंडराने लगती हैं। तो समझो सिरपंचमी ने दस्तक दे दी है ।
एक समय था जब भरगामा हाट से सटे दक्षिण में बिन्दी लोहार की लुहसार हुआ करती थी । शनिवार और बुधवार को साप्ताहिक हटिया होने के कारण उसके लुहसार में भारी भीड़ जमा हो जाती थी । सुकैला ,रामपुर,पैकपार ,मानुल्लह पट्टी ,गोविन पुर , मौजहा के लोग कचिया कुटाने , दबिया में शान करवाने , खुरपी में बेंट लगवाने तथा हल के फाल में धार करवाने के लिए यहां आया करते थे।
बिन्दी जब एक हाथ से भाठी की रस्सी खिचता तो भाठी से अद्भुत आवाज निकलती ..सूउ..सांय..सूउ.. सांय.. सूउ… सांय.. दूसरे हाथ से वह कोयले की लाल लूत्ती में चिमटे से लोहे को पकड़कर लाल-टपेस कर देता फिर जमीन में गड़े लोहे की राड पर उसको रखकर हथौड़े से दे चोट .ठां-ठां-ठां-ठां-ठून । लोहे को आकार देने के बाद उसे लकड़ी के बर्तन में रखे पानी में डालता .छन्न..छन्न..छुं-छू-छू तब उससे एक अजीब गंध निकलती थी बिल्कुल लोहाइन गंध।
सिरपंचमी के दिन तो बिंदी को रत्ती भर भी फुर्सत नही होती थी चारों तरफ़ के किसान वहां फाल में धार करवाने आते थे । अगर पीटने में गलती से भी फाल टेढ़ी हो गई तो उसे अपशगुन माना जाता था।
यानी किसान का फाल टेढा तो उसकी तकदीर टेढी। साह टोली के भुटवा रामेसर साह फेकरा कहते – .”हर के नासा सबके आशा””….
पहले कई गांवों या टोलों का एक खास लोहार होता था जो काम के बदले नकद पैसे नहीं लेते थे बल्कि तैयार फसल में से खन्न के रूप में अनाज लेते थे । हालांकि इस डिजीटल युग में वो परंपरा लगभग विलुप्त हो गई है ।
जब कोई खन्न देने में बेईमानी करता तो बिंदी लोहार मन ही मन उसका फाल टेढा कर देता था । टेढा फाल, भारी अपशगुन, टेढ़े फाल से हल की पूजा नहीं होती थी ।
लोहार के यहां से फाल में धार करवाकर आने के बाद बैलों को नहलाया जाता था । फिर बैलों के सींगों में तेल लगाया जाता । हल पर पीसे चावल की छाप लगाई जाती थी । महिलाएं उसपर सिंदूर का श्रृंगार करती । उसके बाद फाल को धान से ढंककर उसके ऊपर गोबर का छोटा थुमहा बनाकर उसमें दुभ गाड़ दी जाती थी। फिर टोले के लोगों का गांव के बाहर परती जमीन पर जमावड़ा होता। किसान अपने हल-बैल और बाल-बच्चों के साथ वहां जमा होते थे। नई खुरपी से सवा हाथ ज़मीन छीलकर वहां केले का पत्ता बिछाया जाता फिर उसके ऊपर अक्षत-दूध ,केला , शक्कर *तिल , मिठाई का प्रसाद चढ़ाया जाता। हलवाहा के पीठ पर भी अक्षत और सिन्दूर की छाप लगाई जाती थी ।
फिर धूप -दीप देने के बाद हल में बैलों को जोड़कर पूजा के स्थान से जुताई का शुभारंभ होता । फाल की रेह पूजा वाले स्थान के बीच पड़े हलवाहा किसान इसका खास ख्याल रखते थे ।
उस वक्त मिथिलांचल और सीमांचल में सिरपंचमी का त्यौहार प्रकृति पूजन के साथ -साथ अपना कलेजा तोड़कर खेत से अनाज पैदा कर, हमारे परिवार का पेट भरने वाले हल -बैल के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने का भी त्योहार हुआ करता था ।
अरविंद कुमार, भरगामा, अररिया