बदलते बचपन की तस्वीर – बिहार की परंपरा बनाम आधुनिकता :
बिहार की संस्कृति सदियों से लोकगीतों, परंपराओं और सामूहिक संवेदना से समृद्ध रही है। “घुघआ माना… उपजे धाना” जैसे लोकगीतों में ना सिर्फ बाल्यकाल की मासूमियत छिपी होती है, बल्कि यह गीत हमारी सामाजिक संरचना, भावनात्मक जुड़ाव और सांस्कृतिक विरासत का भी परिचायक हैं। किंतु आज का बाल जीवन कहीं खोता जा रहा है—वह मिट्टी की सोंधी गंध की जगह स्क्रीन की चमक में सिमटता जा रहा है।
पारंपरिक बचपन की झलक:
– गांव की गलियों में बच्चों की टोलियाँ “घुघआ माना” गाते हुए खेलती थीं।
– नानी-दादी के साथ बैठकर कहानियाँ सुनना, खेतों से जुड़े अनुभव लेना, त्योहारी गीतों में शामिल होना आम था।
– सामाजिक आचार-व्यवहार, रीति-रिवाज और मूल्यों की शिक्षा यथार्थ अनुभवों से होती थी।
“घुघुआ माना, उपजे घाना” एक लोकप्रिय भोजपुरी बाल लोकगीत है, जो पारंपरिक खेल और सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह गीत आमतौर पर बच्चों को झुलाते समय या पारिवारिक माहौल में गाया जाता है, खासकर जब माताएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर खेल-खेल में झुलाती है
गीत का सांस्कृतिक महत्व:
– बाल्यकाल की स्मृतियाँ: यह गीत बच्चों के साथ खेलते समय गाया जाता है, जिससे उनके मन में आनंद और सुरक्षा की भावना पैदा होती है।
– लोक परंपरा का हिस्सा: इसमें ग्रामीण जीवन, फसल की उपज, रिश्तों की मिठास और सामाजिक रीति-रिवाजों की झलक मिलती है।
– बोलों में छिपा संदेश: जैसे “घुघुआ माना, उपजे घाना” का अर्थ है—खेल-खेल में धान की उपज की कल्पना, जो समृद्धि और शुभ संकेत का प्रतीक है।
खेल का स्वरूप:
– माताएं अपने बच्चों को ठेहुने पर बैठाकर झुलाती हैं, और गीत के बोलों के साथ झूले की गति को मिलाकर आनंद देती हैं।
– गीत में मामा का आगमन, नाक-कान छेदना, लड्डू देना, और धान की फसल जैसी बातें आती हैं, जो बच्चों की कल्पना को रंगीन बनाती हैं ।
आधुनिक बचपन की चुनौती:
– यूट्यूब और ऑनलाइन गेम्स ने बच्चों को आभासी दुनिया में बाँध दिया है।
– “कोरा धरना”—यानि मिट्टी से खेलने, गाँव की गतिविधियों में हिस्सा लेने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।
– घर के आँगन से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन अब उनके जीवन का केंद्र बन चुके हैं।
प्रस्तुति – अवधेश कुमार
उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय रसुआर , मरौना , सुपौल