नशा सेवन को भारत के युवा एक फैशन से समझते हैं।नशा सेवन के रूप में मादक द्रव्यों के इस्तेमाल का इतिहास काफी पुराना है।धर्मान्ध लोग भांग और उससे बने पेय पदार्थ को भगवान शिव का प्रसाद मानते हैं और शराब के लिये भगवान इन्द्र की उस सभा का उदाहरण देते हैं जिसमें सुरा और सुन्दरी की प्रमुखता होती थी।किन्तु ये सारी बातें तथ्यों पर मात्र पर्दा डालती है,जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में युवाओं के बीच मादक द्रव्यों और नशीली दवाओं ने जिस हद तक जड़ें जमा रखीं हैं, उसने न सिर्फ उन युवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है बल्कि आने वाली पीढ़ी पर भी आनुवंशिक कुप्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
कुछ मादक द्रव्य ऐसे हैं जिनका सेवन आम रूप से होता है जैसे-चाय,बीड़ी-सिगरेट और शराब।इनके अलावे कुछ ऐसे भी मादक द्रव्य हैं जिनका सेवन अपेक्षाकृत कम लोग या खास समुदाय के लोग ही करते हैं।साथ ही प्रतिबन्धित होने के कारण जिनका चोरी-छिपे सेवन किया जाता है जैसे-भांग, गांजा, चरस, अफीम,हशीश, हैरोइन, कोकीन, एल एस डी, स्मैक आदि।परन्तु आजकल खासकर युवा वर्ग जिन मादक द्रव्यों से बुरी तरह ग्रस्त है,वे हैं नशीली ऐलोपैथी दवायें, जैसे मेंड्रेक,पैथेडीन,मार्फिन आदि।इन दवाओं के सर्वाधिक शिकार हैं, स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी।आइये,देखें,कौन से मादक द्रव्य किस हद तक युवा वर्ग को जकड़े बैठे हैं और उनके अच्छे -बुरे परिणाम क्या हैं।
चाय-चाय पीना तो अब प्रायः सभी घरों में आम हो गया है।चाय में पायी जाने वाली कैफ़ीन की उचित मात्रा ताजगी और स्फूर्ति के लिए काफी अच्छी मानी गयी है।कैफ़ीन की यह मात्रा मानसिक एवं शारीरिक उत्तेजना के लिये यथेष्ठ होती है।यही कारण है कि चाय पीने से थकावट दूर होती है और शारीरिक स्फूर्ति भी बढ़ जाती है।किन्तु अधिक चाय पीना नुकसानदेह होता है। बार -बार चाय पीने से पाचन-क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
कभी -कभी बबासीर की संभावना भी बढ़ जाती है।रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती है जिससे निम्न रक्तचाप, हृदय रोग,दिलका दौरा आदि रोग हो सकते हैं।चाय की तरह कॉफी भी मादकता और स्फूर्ति के लिए पी जाती है।काफ़ी अधिक पीने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती जाती है जो दिल के दौरे का प्रमुख कारण बनती है।
धूम्रपान–मादक द्रव्यों के रूप में एक और आम लत है–धूम्रपान करना,जिसमें बीड़ी-सिगरेट आते हैं।धूम्रपान से शरीर में निकोटीन नामक जहरीला रसायन पहुँचता है जो कई रूपों में हानिकारी है।निकोटीन रंगहीन वाष्पशील एल्कलॉइड है जिसका प्रभाव नशीला होता है।
भांग,गांजा और चरस–नशीले द्रव्यों के रूप में भांग और गांजा अति प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है।इनका प्रभाव विशेषतः मस्तिष्क पर पड़ता है।थोड़ी मात्रा में गांजा या भांग का सेवन औषध के रूप में लाभकारी होता है,किन्तु लत पड़ जाने पर नशे के लिये इनका सेवन तम्बाकू के साथ चिलम में भरकर ध्रूमपान के रूप में किया जाता है।
गांजा और भांग की श्रेणी का ही एक अन्य मादक पदार्थ चरस है।भांग के पौधे कैनाबिस सैटाइवा की शाखाओं की सन्धियों,पत्तियों, डंठलों एवं फूलों से निकलने वाले लसदार रस को ही चरस कहते हैं।इसका मुख्य घटक केनाबिनोन होता है।यह भी नशे के लिये गांजे की तरह चिलम में भरकर पी जाती है।
भांग,गांजा और चरस तीनों के अत्यधिक सेवन से होने वाले प्रभाव लगभग समान होते हैं।इन तीनों में से किसी के भी सेवन का विषाक्त प्रभाव उत्तेजना के रूप में प्रगट होता है।इससे आँखें लाल हो जाती है,चेहरा फूल जाता है त्वचा संज्ञाशून्य हो जाती है।तीव्र उत्तेजना पर कभी कभी आत्महत्या करने की भावना भी उठने लगती है।
इनके गंभीर प्रभाव से गहरी लम्बी नींद या कभी-कभी बेहोशी आ जाती है और शारीरिक अंगों में काफी देर तक संज्ञाहीनता बनी रहती है। होश आने या नींद खुलने पर भी सिर में भारीपन और शरीर मे ऐंठन की अनुभूति होती है,भूख नहीं लगती है और शरीर दुर्बल हो जाता है।आँखों की पुतलियाँ अस्थाई रूप से फैल जाती है,जिनके फलस्वरूप श्वशावरोध या हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो सकती है।
अफीम——अफीम पोस्त से प्राप्त होती है।इसके मुख्य मादक अवयव नार्कोटिन, कोडीन और मार्फिन है। अफीम के सेवन से गांजे और भांग की तरह उत्तेजना तो आती ही है, साथ ही मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ने से आत्म हत्या की प्रवृति सामान्य रूप से उभरती है।इसकी लत पड़ जाने पर मानसिक विकृति के अतिरिक्त नपुंसकता की संभावना भी बढ़ जाती है।
तम्बाकू—पान और इसके साथ तम्बाकू खाना आम रूप में देखा जा सकता है।पान के साथ तम्बाकू खाने से मुँह का कैन्सर होने का खतरा बढ़ जाता है।
शराब——फलों के रस से बनी शराब का औषधि के रूप में सेवन करना स्वास्थ्य की दॄष्टि से लाभकारी है।किन्तु इनकी लत पड़ जाने पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है साथ ही यह पारिवारिक कलह का भी कारण होती है।शराब शरीर को खोखला करने में काफी सक्षम है।यह मुख्यतः आंतों को और यकृत को हानि पहुंचाती है,जिससे मनुष्य हड्डी का ढाँचा मात्र रह जाता है।
स्मैक——–अब अफीम से एक नए किस्म का मादक द्रव्य”स्मैक” तैयार करने का अवैध धंधा पनप चुका है जिसकी गिरफ्त में एक बार आ जाने का मतलब मौत को खुला निमन्त्रण देना है।स्मैक के आदी युवकों के अनुसार एक ग्राम स्मैक का नशा एक बोतल शराब के बराबर होता है।इसकी एक बार लत पड़ जाये तोखुराक बढ़ती जाती है और उचित खुराक प्रतिदिन न मिलने से मानसिक और शारीरिक बेचैनी पागल बना देती है।इसे प्राप्त करने के लिए कोई भी जघन्य अपराध करने के लिये तैयार हो जाते हैं।फिर भी अगर समय पर स्मैक न मिले तो सिरदर्द और पूरे बदन में ऐंठन होने लगती है,और छटपटाते हुए वे असमय ही मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं।
कारण चाहे जो भी हो,नशा एकबुरी लत है और इसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।किशोरावस्था में यदि इसकी लत पड़ जाये तो जीवन नरक बन जाता है और व्यक्ति यौन विकृति का शिकार हो जाता है। महिलाओं की जनन-शक्तिक्षीण हो सकती है।किशोरावस्था में सेवन करने से लड़कियों का कद छोटा हो जाता है,साथ ही यौन-ग्रंथियों के शीघ्र विकसित होने के कारण वे मानसिक विकृति की शिकार हो जाती है।गर्भवती स्त्रियों को इसकी लत लग जाने से उनके स्वास्थ्य के साथ – साथ गर्भस्थ शिशुओं पर भी असर पड़ता है।इससे उनमें समय पूर्व प्रसव, मानसिक या शारीरिक रूप से विकृत तथा कम उम्र की संतान होने की संभावना बढ़ जाती है।
प्रेषक-हर्ष नारायण दास
फारबिसगंज अररिया
बिहार-854318
नशा सेवन : युवा फैशन : हर्ष नारायण दास
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