सोनपुर का मेला अपनी रौनक और जलवे के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसी विश्वप्रसिद्ध मेले की छटा को अपनी आँखों में बसाने की चाह लिए, मैं अपने पति के साथ सोनपुर रेलवे स्टेशन उतरी। वहाँ से हम पैदल ही मेले की ओर चल पड़े। मन में उत्साह अपने चरम पर था, पर हमें क्या मालूम था कि मेले के शोर के बीच एक ऐसी घटना घटने वाली है, जो इस यात्रा को हमेशा के लिए मेरे जहन में दर्ज कर देगी।
जो लोग सोनपुर स्टेशन से दक्षिण की दिशा से मेले में पैदल प्रवेश करते हैं, वे उस संकरी पगडंडी से परिचित होंगे। उस रास्ते से अंदर आते ही सबसे पहले चिड़ियों और फिर जानवरों का बाजार सजता है। हम भी उन्हीं गलियों से गुजर रहे थे, जहाँ रंग-बिरंगे पक्षी चहक रहे थे। पक्षियों की एक दुकान पर हमारी नजर एक बेहद खूबसूरत तोते पर ठहरी। उसे देखकर मैंने उत्साह में अपने पति से कहा, “जरा इस तोते के साथ मेरी एक फोटो तो खींच दीजिए!” मेरे पति ने फोटो खींचकर आदतन मेरे फोन को अपने पैकेट में डाल दिया।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, दुकानों की सजावट और लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। अचानक, भीड़ के बीच मेरे पति को उनके कुछ पुराने दोस्त मिल गए। शिष्टाचार और थोड़ी झिझक के कारण उन्होंने मुझसे कहा, “तुम थोड़ा अलग होकर आगे बढ़ो, मैं बस पीछे-पीछे आता हूँ। मेरे दोस्त तुम्हें देखेंगे तो शायद असहज महसूस करें या परेशान करेंगे।”
मैंने भी सहज भाव से सिर हिलाया और आगे बढ़ गई। लेकिन मेले का समंदर ऐसा था कि देखते ही देखते हम दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह बिछड़ गए।
अजीब बात यह थी कि बिछड़ने के बाद भी मैं बिल्कुल शांत थी। मुझे पता था कि दोनों मोबाइल फोन मेरे पति के पास ही रह गए हैं, लेकिन मुझे उनके नंबर याद थे। मैंने सोचा कि मंदिर तक पहुँचकर किसी अजनबी से फोन माँगूँगी और उन्हें अपनी लोकेशन बता दूँगी।
परंतु, दूसरी ओर मेरे पति की स्थिति इसके उलट थी। जैसा कि उन्होंने बाद में बताया, वे बदहवासी के आलम में पागलों की तरह मुझे भीड़ में खोज रहे थे। वे इस बात से डरे हुए थे कि दोनों फोन उनके पास हैं, तो मैं उनसे संपर्क कैसे करूँगी? वे खुद को कोस रहे थे कि आखिर उन्होंने मुझे अकेले आगे जाने ही क्यों दिया।
जब काफी देर बाद हम दोबारा मिले, तो उनकी हालत देखने लायक थी। बिखरे हुए बाल, पसीने से तर-बतर चेहरा और आँखों में एक ऐसी घबराहट जैसे कि वे रो ही देंगे। उस डर और सुकून के मिलन के बाद, हम काफी देर तक एक बेंच पर खामोश बैठे रहे। फिर हमने मंदिर जाकर पूजा की।
पूजा के बाद हमने पूरा मेला घूमा, लेकिन इस बार एक बदलाव था—उन्होंने एक पल के लिए भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा। मैंने मजाक में उन्हें लाख समझाया कि “मैं इतनी जल्दी आपका साथ छोड़ने वाली नहीं हूँ,” लेकिन उस दिन के डर ने उनके हाथों की पकड़ को और भी मजबूत कर दिया था।
डॉ० पूनम कुमारी
उ० वि० सह इंटर कॉलेज
निखती कलां, रघुनाथपुर, सिवान