अंग्रेज़ी शासन काल में भारत की शिक्षा व्यवस्था को जिस उद्देश्य के साथ गढ़ा गया था, उसमें शिक्षा को व्यापक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने के बजाय प्रशासनिक आवश्यकताओं से जोड़ा गया। उस समय शिक्षकों की भूमिका केवल ज्ञान के प्रसार तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे शासन की विभिन्न प्रक्रियाओं से भी संबद्ध किए गए। यह व्यवस्था उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और शासन की जरूरतों के अनुरूप थी। किंतु आज, स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी, शिक्षा व्यवस्था में कुछ ऐसे ढाँचागत तत्व दिखाई देते हैं, जिनकी जड़ें उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मिलती हैं।
स्वतंत्र भारत में सरकारों ने शिक्षा के विस्तार, विद्यालयों की संख्या बढ़ाने और नामांकन सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि समय-समय पर राष्ट्रीय आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्वों के कारण शिक्षकों की सेवाएँ विभिन्न गैर-शैक्षणिक कार्यों में भी ली जाती रही हैं। यह व्यवस्था किसी एक सरकार या विभाग की नीयत पर प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि इसे प्रशासनिक संसाधनों की सीमाओं और आपात आवश्यकताओं के संदर्भ में समझा जाना अधिक उचित होगा। यह अनुभव किया जा रहा है कि जब ऐसे कार्य अस्थायी व्यवस्था के बजाय नियमित दायित्व का रूप लेने लगते हैं, तो शिक्षण कार्य के लिए उपलब्ध समय और ऊर्जा प्रभावित होती है। दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह है कि अंग्रेज़ तो चले गए, पर उनकी यह नीति स्वतंत्र भारत में आज तक पूरी तरह बदली नहीं जा सकी। सत्ता बदली, संविधान बदला, लोकतंत्र आया, पर शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका को लेकर सोच में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो पाया। आज़ादी के बाद यह अपेक्षा थी कि शिक्षक को पूर्णतः शैक्षणिक कार्यों के लिए समर्पित किया जाएगा, ताकि वह बच्चों के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास पर केंद्रित रह सके। किंतु व्यवहार में इसके विपरीत हुआ। समय के साथ शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव कम होने के बजाय और अधिक बढ़ता चला गया। शिक्षक, जो मूलतः कक्षा में बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास के लिए नियुक्त होते हैं, कई बार स्वयं को अनेक समानांतर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाते हुए पाते हैं। इसका प्रभाव न केवल शिक्षण प्रक्रिया पर, बल्कि शिक्षक की रचनात्मकता और नवाचार की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है।
यहाँ यह कहना आवश्यक है कि वर्तमान शिक्षा नीतियाँ शिक्षक की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करती हैं और उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास भी कर रही हैं। इसी क्रम में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि नीतिगत स्तर पर यह विचार लगातार मजबूत होता रहे कि शिक्षक का अधिकतम समय और क्षमता शैक्षणिक कार्यों में ही लगे। यदि प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित की जाएँ, तो शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था, दोनों को इसका लाभ मिलेगा।
अंततः यह विषय आलोचना का नहीं, बल्कि सामूहिक चिंतन और सतत सुधार का है। सरकार, विभाग और शिक्षक, तीनों का उद्देश्य एक ही है: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और राष्ट्र का सुदृढ़ भविष्य। यदि ऐतिहासिक अनुभवों और वर्तमान वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षक को उसके मूल दायित्वों पर और अधिक केंद्रित करने के अवसर दिए जाएँ, तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा, बल्कि नीति-निर्माताओं के दीर्घकालिक लक्ष्यों को भी और अधिक प्रभावी ढंग से साकार करने में सहायक होगा।