स्कूल से लौटते वक्त रोज की तरह लोहिया चौक सुपौल पर ढाला गिरा हुआ था मतलब ट्रेन गुजरने वाली थी तो बेरियर लगा हुआ था…
सीएनजी पर बैठी मैं यूँही उन बच्चों के बारे में सोच रही थी जिसके मा-बाप ना जानें कितने मुश्किलों को झेलते हुए अपने नौनिहालों को एक अच्छा भविष्य देने की खातिर जी-तोड़ मेहनत करते हैं पर बच्चे हैं कि मोबाइल गेम, दोस्तों की मंडली,हुल्लड़ बाजी साथ ही सूखा नशा में खुद को डुबाये रहते हैं.. तभी मेरी नजर एक वृद्ध पर पड़ी.. जब दोपहर की तेज़ धूप सिर पर आग बरसा रही है। सड़क के किनारे खड़ा वह वृद्ध, अपनी छोटी-सी खीरे की टोकरी के सहारे जीवन चलाने की कोशिश कर रहा था….उसके पास कोई दुकान नहीं, कोई छत नहीं, बस एक छाता दिखा जो पूरी तरह धूप नहीं रोक पाता, और एक वृद्ध शरीर जो उम्र के साथ कमजोर हो चुका है, फिर भी रोज़ी-रोटी के लिए डटा हुआ था ।
उसकी टोकरी में रखे खीरे केवल सब्ज़ी नहीं, बल्कि उसके संघर्ष की गवाही थें। हर खीरा जैसे उसके पसीने, उसकी मेहनत और उसकी मजबूरी की कहानी कह रहा हो। सामने से गुजरते लोग कभी रुकते हैं, कभी बिना देखे निकल जाते हैं, और वह वृद्ध चुपचाप उम्मीद करता रहता है कि शायद आज कुछ बिक्री हो जाए, शायद आज शाम का चूल्हा जल सके।
धूप से बचने की उसकी जद्दोजहद भी कम दर्दनाक नहीं। उम्र के इस पड़ाव पर जहाँ शरीर को आराम चाहिए, वहीं उसे धूप, धूल और थकान से लड़ना पड़ रहा है। छाता उसके सिर पर छाया नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी का प्रतीक बन गया है। वह हर बार उसे थोड़ा ठीक करता है, थोड़ा झुकता है, और फिर से अपने हिस्से की लड़ाई शुरू कर देता है।
यह दृश्य केवल एक वृद्ध का नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों का है जो जीवन की कठिनाइयों के बीच भी आत्मसम्मान के साथ खड़े हैं। समाज की चमक-दमक के पीछे ऐसे चेहरे हैं, जिनकी मुस्कान मेहनत से बनी है और जिनकी पीड़ा अक्सर अनदेखी रह जाती है।
उस वृद्ध की खीरे की टोकरी हमें यह याद दिलाती है कि गरीबी केवल अभाव नहीं, एक निरंतर संघर्ष है। और धूप से बचने के लिए उसका संघर्ष बताता है कि जीवन ने उससे बहुत कुछ लिया है, फिर भी उसने हार नहीं मानी। वह शायद शब्दों में अपनी कहानी न कहे, पर उसकी चुप्पी, उसका पसीना और उसकी टोकरी सब कुछ कह जाते हैं।
एक समाज के रूप में हमें ऐसे चेहरों को केवल देखकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। उनके लिए थोड़ी-सी सहानुभूति, थोड़ा-सा सम्मान और थोड़ी-सी मदद भी उनके दिन की बड़ी राहत बन सकती है। क्योंकि कभी-कभी किसी वृद्ध की टोकरी से खीरा खरीद लेना केवल खरीदारी नहीं, किसी इंसान की मेहनत को सलाम करना होता है।
और अंत मे उन बच्चों को ये कहना है कि ऐसे लोगो,ऐसी घटनाओं से सीख लेते हुए अभी से अपने भविष्य को लेकर सतर्क हो जाये और खूब मेहनत करे….

कहिन:- स्मिता ठाकुर
उच्च माध्यमिक विद्यालय कर्णपुर, सुपौल