गद्य गुँजन आलेख शिक्षक और विद्यार्थी : गिरीन्द्र मोहन झा

शिक्षक और विद्यार्थी : गिरीन्द्र मोहन झा



शिक्षक के तीन प्रमुख गुण:

  1. विषय का गंभीर ज्ञान(content knowledge)
  2. सम्प्रेषण कौशल (communication skill)
  3. शिक्षण-शास्त्र(Pedagogy)
    गुरुजनों का सम्मान, जिज्ञासा(curiosity), पढ़ने-लिखने-सीखने की ललक, तार्किक सोच एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण(scientific temperament) ये विद्यार्थी के पांच गुण हैं।
    शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन का पाठ पढ़ाना भी है।
    कबीरदास के शब्दों में,
    गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट ।
    अन्तर हाथ सहारा दै, बाहर बाहै चोट ।।
    यदि शिक्षक अच्छे ढंग से विषय का ज्ञान देते हैं, content deliver करते हैं, तो कक्षा में अनुशासन बना रहता है।
    शिक्षक का महान दायित्व है कि विद्यार्थियों को उनकी रूचि के अनुरूप उन्हें दृष्टि (vision) प्रदान करे, जिसके सहारे वह अपना लक्ष्य तय कर सके तथा अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति की दिशा में दृढ़संकल्प प्रयास कर सके । शिक्षक का कर्त्तव्य है कि वह अपने ज्ञान-विज्ञान में नये-नये शोध, शिक्षा में नवाचार करता रहे, विद्यार्थियों को सीखने के लिए, प्रश्न पूछने- किताब पढ़कर प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता रहे । शिक्षक का कर्त्तव्य है कि वह अपने शिक्षण-कौशल में निरंतर विकास करता रहे ।
    शिक्षक और विद्यार्थी में बहुत सारे गुण समान होते हैं, किन्तु एक सद्गुण प्रमुख रूप से समान रहना चाहिए कि दोनों को निरंतर अध्ययनशील रहना चाहिए। पढ़े गये विषय-वस्तुओं का कार्यान्वयन(implementation) होना चाहिए। विद्यार्थियों के सार्थक प्रश्नों से शिक्षकों को भी सीखने का अवसर मिलता है। विद्यार्थियों का सार्थक प्रश्न शिक्षकों को पढ़ने, सोचने, खोजने, नया सीखने के लिए प्रेरित करता है। विद्यार्थियों का कर्त्तव्य है कि शिक्षकों के सद्गुणों को सीखे और दुर्गुणों को वहीं छोड़ दे । विद्यार्थियों का कर्त्तव्य है कि वह विनयशील बने, गुरुजनों का सम्मान करे, गुरुजनों की सीख को आत्मसात् कर वहां तक ही स्वयं को न रोके, बल्कि उसे आधार मानकर निरंतर अभ्यास द्वारा बहुत आगे निकले, समय का सदुपयोग करे, समय को देखते हुए कभी सिंहावलोकन करे, कभी विहंगमावलोकन करे, उज्ज्वल चरित्र के साथ-साथ जिज्ञासु प्रवृत्ति, श्रेष्ठ दृष्टि(vision), तार्किक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण(scientific temperament) हो आदि।
    निरंतर अभ्यास और अभीष्ट लक्ष्य की दिशा में दृढ़संकल्प प्रयास सफलता का अमोघ मंत्र है।
    “Learning starts from womb to tomb.”(अधिगम/सीखने की प्रक्रिया गर्भ से लेकर चिता तक चलती है।)
    –गिरीन्द्र मोहन झा, विद्यालय अध्यापक, +२ भागीरथ उ० वि०, चैनपुर-पड़री, सहरसा
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