(श्री हनुमानजी की जयंती पर)
श्रीहनुमानजी अंजना और केसरी के पुत्र हैं। ग्यारहवां रुद्रावतार हैं। वे आठ चिरजीवियों में एक हैं । कलियुग के जीवित देवता हैं, जो आज भी पृथ्वी पर सशरीर उपस्थित हैं।
……वे सर्वत्र अपना परिचय भगवान श्रीरामचन्द्र जी के दास या दूत के रूप में देते हैं। जैसा कि श्रीमद्वाल्मीकिय रामायण के सुन्दरकाण्ड के 42वें सर्ग के 34वें श्लोक में रावण को वे अपना परिचय देते हुए कहते हैं।-
दासोऽहं कौशलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मण: ।
हनुमान्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मज: ।।
(मैं पवनपुत्र हनुमान, शत्रुओं की सेना का संहार करने वाला और कोसलराज श्रीराम का दास हूं, जो अत्यंत कठिन कार्यों को भी सुगमता से कर लेते हैं।)
…..लंका के अशोक वाटिका में माता सीताजी के समक्ष वे अपना परिचय देते हैं।-
रामदूत मैं मातु जानकी।
सत्य शपथ करुणानिधान की ।।(सुन्दरकाण्ड, श्रीरामचरितमानस)
…..वे सद्गुणों के भंडार हैं। वे एकनिष्ठ हैं। अपने आराध्य भगवान श्रीरामचन्द्र जी के प्रति उनकी भक्ति, सेवा और निष्ठा अद्भुत और अलौकिक है।
….वे एक ओर अति विनम्र, सेवा आदर्श के महान प्रतीक तो दूसरी ओर सिंहविक्रम के समान महान बलशाली है।
….स्वामी विवेकानंद के कथनानुसार, “महावीर हनुमान जी के चरित्र को ही तुम्हें इस समय आदर्श मानना पड़ेगा। देखो न, वे श्रीराम की आज्ञा से समुद्र लाँघ गये !- जीवन-मृत्यु की परवाह कहाँ? महाजितेन्द्रिय, महाबुद्धिमान, दास्य भाव के उस आदर्श से तुम्हें अपना जीवन गठित करना होगा । वैसा करने पर दूसरे भावों का विकास स्वयं ही हो जाएगा । दुविधा छोड़कर गुरु की आज्ञा का पालन और ब्रह्मचर्य की रक्षा- यही है सफलता का रहस्य ! नान्य पन्था: विद्यतेऽनाय अर्थात् अवलम्बन करने योग्य और दूसरा पथ नहीं। एक ओर श्रीहनुमानजी के जैसा सेवाभाव और दूसरी ओर उसी प्रकार त्रैलोक्य को भयभीत कर देनेवाला सिंह जैसा विक्रम !”
….. बजरंगबली हनुमान जी का नाम स्मरण भयों को हरने वाला तथा शांति व सुखप्रदायक होता है। श्रीहनुमद्द्वादशनामस्तोत्र तथा श्रीहनुमानचालीसा का पाठ अत्यंत लाभप्रद होता है।
…..जय जय सीताराम ! जय बजरंगबली हनुमान !
…..गिरीन्द्र मोहन झा
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