बिहार की साक्षरता दर भारत के औसत दर से कम है उसपर बिहार के पिछड़े इलाके इस अल्पसंख्यक इलाके का मेरा मध्य विद्यालय विभिन्न प्रकार के सामाजिक, अर्थिक और परम्परागत रुढियों, धर्मिक कुप्रथाओं के कारण लगभग असाध्य है। ऐेसे में छात्राओं को साथ स्कुल ले आना और निरंतरता बनाए रखना एक बहुत ही बड़ी चुनौती थीं, लेकिन मैं हार माननेवालों में नही थी।वैसे मेरे साथ एक विशेष चुनौती यह थी कि मैं एक प्रगतिशील हिन्दू शिक्षक और बुर्का व्यवहार _ विचार संस्कार से पोषित मुहल्ले और समाज!लेकिन मैंने बच्चियों का शोषण, लानत की जिंदगी उन्हें बेचने.. तलाक, जिल्लत को लाड़ली जैसी अन्य बच्चीयों से जुड़कर महसूस किया था। मेरे लिए शैक्षिक कार्य से अधिक अंतरात्मा की आवाज़ पर कार्य करने जैसा था।इस प्रकार मैंने बीड़ा उठाया उन उपेक्षित बच्चियों को विद्यालय लाने और निरंतरता बनाए रखने के प्रयास करने का।
कार्य कठिन था। वैसे तो मैं शिक्षक थी मुहल्ले के विद्यालय की, तो समाज में पकड़ और पहुँच दोनों थी। शिक्षा समिति के अध्यक्ष, सचिव एवं अन्य भी जानते थे और पूर्ववर्ती छात्र औऱ उनके कुछ अभिभावक भी।तो ये लोग मेरी ताकत थे, लेकिन शायद ये सब अपने -अपने कार्य में लगे हुए और अपनी दुनिया में व्यस्त.. उनका साथ लेना सामुहिक रूप से कठिन था और उनकी आपसी रंजिश के कारण खतरनाक भी। परंतु मैंनें अपने विधालय की कुछ बच्चियों का सहारा लिया और सर्वप्रथम पता किया कि शरीफगंज में समान्य स्थिति क्या है और कितनी बच्चियां या बच्चे विद्यालय नही आते? बातचीत में मुझे कुछ अंदाज मिल गया, अब काम करने की बारी थी।
विद्यालय समाप्त होने के बाद मैंने रुखसाना को साथ लिए।रुखसाना आगे और मैं पीछे पीछे। पहले दिन हमलोग गांव के मुहल्ले में गए। रजिया के यहाँ गए तो माहौल बिल्कुल विचित्र था, उसके पिता नशे में धुत और.. खैर मैंनें पड़ोस के रहमान जी को सम्पर्क किया और उनकी पत्नी सुल्ताना बेगम से चर्चा शुरू की.. क्रमशः कुछ और लोग आ गए। मैंने मुहल्ले के लोगों से आग्रह किया कि अपने बच्चों को विद्यालय भेजें।पहले दिन के प्रयास से पाँच बच्चे बढ़े। मुझे बहुत अच्छा लगा।
मैने यह काम जारी रखा. मुहल्ला दर मुहल्ला.. .एक बार तो मेरी स्थिति बहुत बुरी हो गई जब एक महिला ने तड़के से सवाल पूछ लिया.. इन्ही स्कुल जैतन त तू हमारा खिलाईवन की? अर्थात् उसका बच्चा यदि विद्यालय जाता है तो क्या मैं उसकी माँ ( उसे) को खिलाउँगी ? .. भरण-पोषण करुँगी? वास्तव में उसका बेटा आमिर मछली की दुकान पर काम करना था।
इसके घर में कमाने वाला कोई नहीं था.. दो बहने और एक आमिर..उनकी स्थिति गंभीर थी, मेरी स्थिति किंकर्तव्यविमूढ़! फिर मैंने मोर्चा संभाला और आमिर की i माँ को कई प्रकार से समझाया.. और लगातर तीन दिनों के बाद तय हुआ कि आमिर विद्यालय आएगा और उस महिला को कपड़े की एक दुकान में मैंने काम पर लगवाया
मेरा प्रयास स्वांतः सुखाय था और समाज के साथ -साथ मेरे सहयोगियों और छात्रों ने भी मदद किया। कोविद – 19 की त्रासदी के बाद के उस काल खंड में मेरा यह प्रयास आज भी मुझे आह्लादित कर्ता है और जब वो बच्चे कही दिखते हैं, अभिवादन करते हैँ मुस्लिम होकर भी चरण स्पर्श करते हैं तो शिक्षक होने पर गर्व की अनुभूति होती हैं।
डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या
उत्क्रमित कन्या मध्य विद्यालय शरीफगंज कटिहार