जब भक्त के प्रेम के आगे झुक गए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
अयोध्या में राजतिलक की तैयारियाँ चल रही थीं, लेकिन नियति को कुछ और ही स्वीकार था। माता कैकेयी के वरदानों के कारण प्रभु श्रीराम को चौदह वर्षों का वनवास मिला। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए श्रीराम ने राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया। उनके साथ माता सीता और अनुज लक्ष्मण भी वन की ओर चल पड़े।
वन की राह में चलते हुए वे गंगा के पावन तट पर पहुँचे। सामने कल-कल करती गंगा की धारा बह रही थी। उस पार जाने के लिए नाव की आवश्यकता थी।
वहीं एक साधारण-सा केवट अपनी नाव लेकर खड़ा था। वह गंगा में लोगों को नाव से पार उतारकर अपनी आजीविका चलाता था।
प्रभु श्रीराम ने उसे पुकारा और गंगा पार कराने का अनुरोध किया।
केवट ने जब श्रीराम के मनमोहक स्वरूप को देखा, तो उसका हृदय श्रद्धा और प्रेम से भर उठा। वह जान गया कि ये कोई साधारण राजकुमार नहीं, साक्षात् प्रभु हैं। उसके मन में एक अनोखा विचार आया।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
“प्रभु! आपकी चरण-धूलि का बड़ा महात्म्य सुना है। उसी धूलि के स्पर्श से पत्थर भी नारी बन गया था। मेरी नाव तो लकड़ी की है। यदि आपके चरणों की धूलि इसे भी किसी दूसरे रूप में बदल देगी, तो मेरी रोजी-रोटी का क्या होगा? मैं गरीब नाविक हूँ, दूसरी नाव कहाँ से लाऊँगा?”
केवट की बात सुनकर प्रभु श्रीराम मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में प्रेम था, करुणा थी और अपने भक्त के भोलेपन के प्रति अपनापन था।
केवट ने आगे कहा,
“प्रभु! मेरी एक विनती है। पहले मुझे आपके चरण धो लेने दीजिए, फिर मैं आपको गंगा पार उतार दूँगा।”
श्रीराम ने प्रेमपूर्वक उसकी विनती स्वीकार कर ली।
केवट दौड़कर अपने घर से एक पात्र ले आया। उसने बड़े प्रेम और श्रद्धा से प्रभु के चरणों को अपने हाथों में लिया। गंगा के निर्मल जल से उनके चरण पखारे। उसके लिए वह केवल चरण धोने का कार्य नहीं था, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूजा थी।
उसकी आँखों में प्रेम के आँसू छलक आए। वह उन चरणों को निहारता जाता और मन ही मन धन्य होता जाता, जिनकी महिमा का गुणगान ऋषि-मुनि करते हैं।
जिस प्रभु के दर्शन के लिए देवता तरसते हैं, आज वही प्रभु एक साधारण नाविक के प्रेम के आगे सहज भाव से बैठे थे।
न केवट के पास महल था, न सोने-चाँदी का वैभव; उसके पास केवल निर्मल हृदय था। और प्रभु को तो वही हृदय सबसे प्रिय है, जिसमें छल नहीं, केवल प्रेम हो।
चरण धोने के बाद केवट ने श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाया। वह सावधानी से नाव खेता हुआ गंगा की लहरों के बीच आगे बढ़ने लगा।
उसके लिए यह गंगा पार कराने का काम नहीं, बल्कि अपने जीवन को सफल बनाने का अवसर था। नाव की प्रत्येक हलचल के साथ उसके हृदय में भक्ति का सागर उमड़ रहा था।
जब नाव दूसरे तट पर पहुँची, तो श्रीराम ने केवट को उतराई देनी चाही। लेकिन केवट ने हाथ जोड़कर विनम्रता से मना कर दिया।
उसने कहा, “प्रभु! आज मैंने आपको गंगा पार कराया है। जब कभी मेरा अंतिम समय आए और मुझे भवसागर से पार उतरने की आवश्यकता हो, तब आप मुझे भी पार उतार दीजिएगा। हम दोनों एक ही काम करते हैं। मैं लोगों को नदी पार कराता हूँ और आप संसार के भवसागर से पार उतारते हैं। आज नाविक ने नाविक से मजदूरी नहीं माँगी।”
केवट की बात सुनकर प्रभु श्रीराम का हृदय प्रेम से भर उठा। उन्होंने उसे अपने स्नेह और कृपा से निहाल कर दिया।
माता सीता ने केवट की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे कुछ देने की इच्छा व्यक्त की। रामकथा की प्रचलित लोकपरंपराओं में इस प्रसंग का वर्णन अलग-अलग रूपों में मिलता है, पर इसका मूल भाव एक ही है—केवट को धन से अधिक प्रभु का प्रेम प्रिय था।
केवट ने उस दिन संसार को बता दिया कि प्रभु तक पहुँचने के लिए ऊँचा पद, अपार धन या बड़ा कुल आवश्यक नहीं है। आवश्यक है तो बस एक निष्कपट हृदय, जिसमें श्रद्धा हो, सेवा हो और समर्पण हो।
जिसके चरणों में संसार झुकता है, वे श्रीराम अपने भक्त के प्रेम के आगे सहज भाव से झुक जाते हैं। यही भक्ति की महिमा है, यही राम के चरित्र की सुंदरता है।
स्वरचित रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
गोस्वामी तुलसी दास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर