गद्य गुँजन जीवनी,दिवस विशेष स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर – उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक ‘

स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर – उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक ‘




संगीत में गायक कलाकार के कण्ठ में ओ जादू सरस्वती देवी भर देती है कि उसके आवाज से पत्थर भी पिघल जाते है और नेत्रों से आंसू टपकने लगते है
है सुरों की इम्तहान की घड़ी तान सेन संग बैजू की बारी, बैजू ने जब राग साधा था, टूटी पाषाणों की बाधा l पत्थर पिघला पानी जैसा ठोस शीला भी मोम बनी थी,l l
सच में संगीत और म्यूजिक में ओ ताकत है कि मनुष्य का हृदय खुशी और भाव विभोर हो कर नाचने लगता है
आप सोचते होंगे मै ये सब बाते क्यों कर रहा हु जी हा तो आप जानते होगे कि आज 28 सितंबर है आज ही के दिन भारत रत्न और पद्मभूषण से विभूषित मशहूर गायिका सु श्री लता मंगेशकर जी का जन्म दिवस है

  • ये मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी *
    (स्वर कोकिला , स्वर सम्राज्ञी लता जी के इस देश भक्ति गीत के आवाज ने नेहरू जी के नेत्रों में आसू भर दिए)
    आज के दिन जिनके बारे में मै आपसे विचार ,बाते लिखने जा रहा हु आप समझ गए होंगे
    लेकिन इनकी जीवन यात्रा या यू कहे कि जीवन का सच्चा अभिनय की यात्रा इतना आसान नहीं थी
    पतली आवाज है तुम्हारी अब तुम कुछ कर नहीं पाओगी गा नहीं पाओगी ऐसा बोल दिया गया l
    लेकिन वही पे हैदर जी ने कहा तब देखना एक दिन ऐसा आयेगा कि लता जी से लोगों को रिक्वेस्ट करना पड़ेगा कि प्लीज़ मेरे फिल्म के लिए एक गाना गा दीजिए ,और हुआ ऐसा जिस किसी भी फिल्म में लता जी की आवाजे रहती थी वह फिल्म सुपर डूपर हिट होती थी
    लता जी को ऐसा आलोचना सुनने से ओ निराश नहीं हुई बल्कि अपने में और सुधार लाया , ,ईश्वर ने भी परीक्षा ली , जब ये मात्र तेरह वर्ष की थी तो इनके पिता जी को अपने पास बुला लिया
    तैंतीस वर्ष की थी तब इन्हें जहर देकर मरने की कोशिश की गई मगर तमाम चुनौतियों के पार कर ये भारत रत्न बनी लता मंगेशकर जिन्होंने इतनी बड़ी चुनौतियों को पर किया लेकिन हार नहीं मानी
    लता जी ने अपने जीवन यात्रा में तकरीबन पचास हजार गाने गाए
    संगीत के साथ क्रिकेट से भी लगाव
    लता मंगेशकर जी का व्यक्तित्व केवल संगीत तक सीमित नहीं था। उन्हें क्रिकेट से भी गहरा लगाव था। भारतीय क्रिकेट टीम के प्रति उनका स्नेह और खिलाड़ियों के प्रति आत्मीयता प्रसिद्ध थी।
    1983 में जब कपिल देव की कप्तानी में भारत ने पहली बार क्रिकेट विश्व कप जीता, तब भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा गया। उस समय खिलाड़ियों को सम्मानित करने के लिए पर्याप्त धन जुटाना चुनौती थी। लता जी ने भारतीय क्रिकेट के प्रति अपने प्रेम को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने दिल्ली में एक कार्यक्रम किया और उससे प्राप्त धनराशि से विश्व कप विजेता खिलाड़ियों को आर्थिक सम्मान देने में सहायता मिली। 1983 की टीम के सदस्य सुनील वाल्सन ने बाद में भी इस कार्यक्रम को याद करते हुए बताया कि इससे प्रत्येक सदस्य को ₹1 लाख का पुरस्कार देने में मदद मिली।
    यह प्रसंग लता जी के व्यक्तित्व का एक अलग पक्ष सामने लाता है। संगीत की दुनिया में सर्वोच्च सम्मान पाने वाली कलाकार ने देश के खिलाड़ियों के सम्मान के लिए भी अपना योगदान दिया। उनके लिए कला केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का माध्यम नहीं थी; वह देश और समाज से जुड़ने का माध्यम भी थी।
    क्रिकेट के प्रति उनके लगाव के कारण उनकी कई क्रिकेट खिलाड़ियों से आत्मीयता भी रही। सचिन तेंदुलकर के साथ उनका संबंध विशेष रूप से चर्चित रहा। क्रिकेट और संगीत—दो अलग क्षेत्रों के इन महान व्यक्तित्वों के बीच परस्पर सम्मान और स्नेह की भावना दिखाई देती थी l
    लता मंगेशकर : आठ दशकों की स्वर-साधना और अमर संगीत-यात्रा

भारतीय संगीत के इतिहास में लता मंगेशकर का नाम केवल एक गायिका के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी स्वर-साधिका के रूप में दर्ज है, जिसकी आवाज़ ने लगभग आठ दशकों तक भारतीय सिनेमा और संगीत की यात्रा को अपनी मधुरता दी।

उनका संगीत-सफर 1940 के दशक में आरंभ हुआ और 2010 के दशक तक उनकी आवाज़ रिकॉर्डिंग के रूप में सुनाई देती रही। उनके गाए गीतों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं, लेकिन लगभग 25,000 गीतों और 36 भारतीय भाषाओं का अनुमान प्रमुख स्रोतों में मिलता है।

पहला दशक : 1940 का दशक — संघर्ष और पहचान

1942 — पहली शुरुआत

तेरह वर्ष की आयु में पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके सामने आ गई। इसी कठिन समय में उन्होंने अभिनय और गायन के माध्यम से काम प्रारंभ किया।

मराठी फिल्म ‘पहिली मंगळागौर’ (1942) में उन्होंने अभिनय भी किया और गायन भी। यही वह दौर था जब बालिका लता के जीवन में संगीत धीरे-धीरे आजीविका और साधना दोनों का आधार बनने लगा।

1948 — ‘मजबूर’

फिल्म ‘मजबूर’ (1948) में गीत “दिल मेरा तोड़ा…” ने उन्हें बड़ी पहचान की ओर बढ़ाया। संगीतकार गुलाम हैदर ने उनकी प्रतिभा पर विश्वास किया।

1949 — ‘महल’ और निर्णायक सफलता

फिल्म ‘महल’ (1949) का प्रसिद्ध गीत “आएगा आनेवाला” लता जी के करियर का ऐतिहासिक मोड़ बना। मधुबाला पर फिल्माए गए इस गीत ने उनकी आवाज़ को देशभर में पहचान दिलाई।

जिस आवाज़ को कभी पतली कहकर आलोचना मिली थी, वही आवाज़ कुछ ही वर्षों में भारतीय फिल्म संगीत की सबसे विशिष्ट आवाज़ों में गिनी जाने लगी।

1950 का दशक — स्वर की प्रतिष्ठा

1950 के दशक में लता मंगेशकर ने भारतीय फिल्म संगीत में अपनी मजबूत पहचान बनाई। नौशाद, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, सलिल चौधरी जैसे संगीतकारों के साथ उनका सहयोग भारतीय फिल्म संगीत का महत्वपूर्ण अध्याय बना।

प्रमुख गीत

‘बरसात’ (1949/दशक के प्रभाव में) — “हवा में उड़ता जाए…”
‘आवारा’ (1951) — “घर आया मेरा परदेसी…”
‘श्री 420’ (1955) — “प्यार हुआ इकरार हुआ…”
‘चोरी चोरी’ (1956) — “रसिक बलमा…”
‘मधुमती’ (1958) — “आ जा रे परदेसी…”

1959 — पहला Filmfare Best Female Playback Award

“आ जा रे परदेसी” (मधुमती) के लिए उन्हें पहला Filmfare Best Female Playback Singer Award मिला। Filmfare की शुरुआत में गायकों के लिए अलग श्रेणी बाद में आई थी।

यह दशक लता जी के लिए केवल लोकप्रियता का नहीं, बल्कि अपनी गायकी की अलग पहचान स्थापित करने का दशक था।

1960 का दशक — अमर गीतों का स्वर्णिम युग

1960 का दशक लता मंगेशकर की गायकी के सबसे प्रसिद्ध कालखंडों में गिना जाता है। प्रेम, विरह, भक्ति, देशभक्ति और भावनात्मक गीत—हर रंग को उन्होंने अपनी आवाज़ दी।

1960 — ‘मुग़ल-ए-आज़म’

गीत — “प्यार किया तो डरना क्या…”

मधुबाला पर फिल्माया गया यह गीत भारतीय फिल्म संगीत के सबसे यादगार गीतों में गिना जाता है।

1961 — ‘हम दोनों’

“अल्लाह तेरो नाम…”

इस गीत में उनकी आवाज़ ने प्रार्थना और आध्यात्मिकता का भाव पैदा किया।

1962 — ‘बीस साल बाद’

“कहीं दीप जले कहीं दिल…”

इस गीत के लिए उन्हें Filmfare Award मिला।

1963 — ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’

भारत-चीन युद्ध के बाद देशभक्ति की भावना से जुड़ा यह गीत लता जी की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

1964 — ‘वो कौन थी?’

“लग जा गले…”

आज भी यह गीत उनकी आवाज़ के सबसे पहचाने जाने वाले गीतों में है।

1965 — ‘गाइड’

“पिया तोसे नैना लागे रे…”

शास्त्रीयता, भाव और नृत्यात्मकता के सुंदर मेल वाला यह गीत उनकी बहुआयामी गायकी का उदाहरण है।

1966 — ‘खानदान’

“तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा…”

इस गीत के लिए उन्हें Filmfare Award मिला।

1969 — पद्म भूषण

भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। इसी वर्ष उन्होंने नए गायकों को अवसर देने के उद्देश्य से नियमित Filmfare प्रतिस्पर्धा से हटने का निर्णय भी लिया।

1970 का दशक — राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा

यह दशक लता जी के लिए पुरस्कारों और अंतरराष्ट्रीय मंचों का महत्वपूर्ण काल रहा।

1970 — ‘जीने की राह’

“आप मुझे अच्छे लगने लगे…”

इस गीत के लिए उन्हें Filmfare Best Female Playback Singer Award मिला।

1972 — ‘परिचय’

फिल्म परिचय के गीतों के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

1974 — ‘कोरा कागज़’

इस फिल्म के गीतों के लिए उन्हें दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

1974 — Royal Albert Hall

लंदन के प्रसिद्ध Royal Albert Hall में उनका कार्यक्रम हुआ। यह उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

प्रमुख गीतों का दौर

‘अमर प्रेम’ — “रैना बीती जाए…”
‘परिचय’ — “बीती ना बिताई रैना…”
‘आंधी’ — “तेरे बिना जिंदगी से…”
‘सत्यम शिवम सुंदरम’ — शीर्षक गीत

इस दशक में उनकी आवाज़ केवल फिल्मी गायकी तक सीमित नहीं रही; वह भारतीय संगीत की अंतरराष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बनने लगी।

1980 का दशक — बदलते संगीत में भी वही स्वर

1980 के दशक में फिल्म संगीत की शैली बदल रही थी। नए संगीतकार, नई तकनीक और नई पीढ़ी के कलाकार आ रहे थे। इसके बावजूद लता जी ने अपनी विशिष्टता बनाए रखी।

उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, बप्पी लाहिड़ी सहित अनेक संगीतकारों के साथ काम किया।

उल्लेखनीय गीत

‘एक दूजे के लिए’ (1981) — “हम बने तुम बने…”
‘प्रेम रोग’ (1982) — “ये गलियाँ ये चौबारा…”
‘राम तेरी गंगा मैली’ (1985) — “एक राधा एक मीरा…”
‘चाँदनी’ (1989) — “मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियाँ हैं…”

1989 — दादासाहेब फाल्के पुरस्कार

भारतीय सिनेमा में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


1990 का दशक — नई पीढ़ी के साथ स्वर की निरंतरता

नई अभिनेत्रियाँ और नए संगीतकार आए, लेकिन लता जी की आवाज़ की लोकप्रियता बनी रही।

1990 — ‘लेकिन…’

“यारा सीली सीली…”

इस फिल्म के गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह उनका तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार था।

1994 — ‘हम आपके हैं कौन..!’

“दीदी तेरा देवर दीवाना…”

इस दौर के गीतों ने उनकी आवाज़ को नई पीढ़ी तक पहुँचाया।

1999 — पद्म विभूषण

भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

इसी दशक में उन्हें Filmfare Lifetime Achievement Award सहित कई सम्मान प्राप्त हुए।


2000 का दशक — भारत रत्न और नई पीढ़ी से संवाद

2001 — भारत रत्न

लता मंगेशकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। यह उनके जीवन और भारतीय संगीत में उनके व्यापक योगदान की सर्वोच्च राष्ट्रीय मान्यताओं में से एक है।

2004 — ‘वीर-ज़ारा’

मदन मोहन की पुरानी धुनों पर आधारित गीतों में लता जी की आवाज़ सुनाई दी। यह उनकी दीर्घ संगीत-यात्रा का महत्वपूर्ण बाद का पड़ाव था।

2006 — ‘रंग दे बसंती’

“लुका छुपी बहुत हुई…”

ए.आर. रहमान के संगीत में यह गीत माँ और बच्चे के भावनात्मक संबंध को स्वर देता है। नई पीढ़ी के श्रोताओं के बीच भी यह गीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

इस दौर में उनकी आवाज़ यह प्रमाणित कर रही थी कि महान कला उम्र और समय की सीमाओं से आगे जा सकती है।


2010 का दशक — अंतिम चरण, लेकिन साधना जारी

इस समय तक लता जी ने सक्रिय फिल्मी गायन काफी कम कर दिया था, लेकिन विशेष अवसरों पर उनकी आवाज़ सुनाई देती रही।

2019 — ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की’

यह गीत देश के सैनिकों को समर्पित था और इसे उनके अंतिम रिकॉर्ड किए गए गीतों में माना जाता है।

लगभग आठ दशकों की यात्रा के बाद भी उनका अंतिम चरण उसी भावना से जुड़ा रहा जिससे उनकी शुरुआत हुई थी—संगीत और देश के प्रति समर्पण।

सम्मानों की स्वरमाला

लता मंगेशकर को प्राप्त प्रमुख राष्ट्रीय सम्मान इस प्रकार हैं—

वर्ष| सम्मान
1969| पद्म भूषण
1972| राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1974| राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1989| दादासाहेब फाल्के पुरस्कार
1990| राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1993| Filmfare Lifetime Achievement Award
1997| महाराष्ट्र भूषण
1999| पद्म विभूषण
2001| भारत रत्न
2007| फ्रांस का Legion of Honour
2009| ANR National Award

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के तीन प्रमुख गायन सम्मान 1972, 1974 और 1990 में मिले।

गीतों की संख्या : एक महत्वपूर्ण तथ्य

लता जी के गीतों की संख्या को लेकर लंबे समय से अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं। Guinness के पुराने रिकॉर्ड में 1948–1974 के बीच 25,000 रिकॉर्डिंग का दावा और बाद के संस्करणों में 30,000 का उल्लेख हुआ था, लेकिन इन आँकड़ों पर विवाद भी रहा। स्वयं लता जी ने कहा था कि उन्होंने अपने गाए गीतों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं रखा था। इसलिए किसी लेख में निश्चित रूप से “30,000 से अधिक” लिखने के बजाय यह कहना अधिक सावधान होगा कि उन्होंने हजारों गीत गाए, लगभग 36 भारतीय भाषाओं में उनकी आवाज़ दर्ज हुई और उनके गीतों की संख्या के अलग-अलग अनुमान प्रचलित हैं।
आठ दशकों की यात्रा का सार
1940 का दशक — संघर्ष और शुरुआत
1950 का दशक — पहचान और प्रतिष्ठा
1960 का दशक — अमर गीतों का स्वर्णिम दौर
1970 का दशक — राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान
1980 का दशक — बदलते संगीत में निरंतरता
1990 का दशक — नई पीढ़ी तक पहुँच
2000 का दशक — भारत रत्न और नई पीढ़ी से संवाद
2010 का दशक — अंतिम चरण और अमर विरासत

सबसे महत्वपूर्ण — जीवन से शिक्षा
लता जी की कहानी का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि अस्वीकृति को उन्होंने अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उनकी आवाज को लेकर शुरुआती आलोचनाएँ हुईं, लेकिन उन्होंने अभ्यास और साधना से अपनी गायकी को निखारा। �

उनका जीवन हमें सिखाता है—
असफलता मंजिल नहीं, सुधार का संकेत हो सकती है।
कम उम्र में आई जिम्मेदारी से भागने के बजाय उसका सामना किया जा सकता है।
प्रतिभा को निरंतर रियाज़ और अनुशासन से निखारना पड़ता है।
सफलता मिलने के बाद भी सीखने और साधना की भावना बनी रहनी चाहिए।
अपनी कला के प्रति ईमानदारी व्यक्ति को लंबे समय तक यादगार बना सकती है।

“जिस आवाज़ को कभी कमजोर समझा गया, वही निरंतर साधना के बल पर ऐसी आवाज़ बनी जिसे कई पीढ़ियों ने भारत की पहचान के रूप में सुना।”

लता मंगेशकर की यात्रा को केवल वर्षों और गीतों में बाँधना कठिन है। उन्होंने जिस समय से गाना शुरू किया, उस समय से लेकर अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक भारतीय संगीत का स्वरूप कई बार बदला; लेकिन उनकी आवाज़ ने हर दौर में अपना स्थान बनाया।

एक बाल कलाकार से परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाली किशोरी, संघर्षशील गायिका से महान पार्श्वगायिका और अंततः भारत रत्न से सम्मानित कलाकार बनने तक की यह यात्रा हमें बताती है कि महानता केवल प्रतिभा से नहीं आती—उसके पीछे वर्षों की साधना, अनुशासन, धैर्य और निरंतर आत्म-सुधार छिपा होता है।

6 फरवरी 2022 को लता मंगेशकर का निधन हुआ, लेकिन उनकी आवाज़ उनके साथ समाप्त नहीं हुई। उनके गीत आज भी भारतीय जनमानस की स्मृतियों में जीवित हैं।

लता जी का जीवन मानो संगीत की वह यात्रा है, जिसमें संघर्ष ने सुर दिया, साधना ने लय दी, सफलता ने ताल दी और भारत ने उसे अमर स्वर बना दिया।

स्वरचित, रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर अंचल- ब्रह्मपुर, जिला बक्सर

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