गद्य गुँजन आलेख विश्व स्वास्थ्य दिवस : गिरीन्द्र मोहन झा

विश्व स्वास्थ्य दिवस : गिरीन्द्र मोहन झा



आज विश्व स्वास्थ्य दिवस (World health day) है । 7 अप्रैल 1948 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) की स्थापना की गयी थी । वर्ष 2026 का थीम Together for health. Stand with Science(स्वास्थ्य के लिए एकजुट । विज्ञान के साथ खड़े रहें ।
….. यूनिसेफ के अनुसार, Health is the state of physical, mental, social and spiritual healthy.(स्वास्थ्य एक अवस्था है, जिसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वस्थता और संतुलन को शामिल किया गया है।
….. भारतीय दर्शनों में स्वास्थ्य का बड़ा महत्त्व दिया गया है । स्वास्थ्य संबंधी कई नियम दिये गये हैं। मानव शरीर का बहुत ही महत्व है। आरोग्य या स्वास्थ्य का देवता सूर्य को और मन का देवता चन्द्र को कहा गया है।
नमस्कारप्रियो भानु: जलधारा प्रिय: शिव: – सूर्य को नमस्कार और शिव को जलधारा प्रिय होती है। स्वास्थ्य के नियम:

  1. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जागना, फिर ऊषा पान करना, नित्य क्रिया से निवृत होकर कुछ समय योगाभ्यास, व्यायाम, हरे दूब पर खाली पैर चलना। योगाभ्यास से पूर्व एक गिलास पानी पीना। योगाभ्यास के बाद पेशाब करने से शरीर से सारे कीटाणु बाहर आ जाते हैं। पैर के पंजे के सहारे दोनों एड़ी पर सीधा बैठकर मूत्र त्याग करना मूत्र त्याग की आदर्श अवस्था कही गयी है। अमीर खुसरो के शब्दों में, “सुबह की हवा सौ रोगों की दवा।”
  2. कुछ समय प्रकृति के सान्निध्य में बिताना ।
  3. संतुलित आहार लेना ।- सुबह का जल, दोपहर की छांछ और रात का दूध अमृत समान होता है। आदि ।
    ……. भगवान श्रीहरि विष्णु ने आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि के रूप में अवतार लिया था । धन्वंतरि का नाम लेने से भी रोगों का क्षय होता है।
    भगवान धन्वंतरि और महर्षि वेदव्यास ने कहा है –
    अच्युतानंत गोविन्द नामोच्चारण भेषजात् ।
    नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।।
    (भगवान के तीन नाम अच्युत, अनंत, गोविंद लेने से भी आरोग्य की प्राप्ति होती है।)
    ….. भगवान धन्वंतरि के आदेश और प्रेरणा से वागभट्ट ने सरल भाषा में अष्टांगसंग्रहम् और अष्टांगहृदयम् नामक पुस्तक की रचना की, जिसमें स्वास्थ्य के नियम और आयुर्वेद सिद्धांत सरल भाषा में दिया गया है।
    ….. श्रीमद्भगवद्गीता में भी स्वस्थ शब्द आया है। स्वस्थ का अर्थ है – स्वयं में स्थित, आत्मभाव में स्थित।
    ….. श्रीमद्भगवद्गीता में शरीर को क्षेत्र (खेत) और आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहा गया है। इस शरीर में जैसा बोओगे, वैसा ही पाओगे। कहा गया है, आत्मा अमर है, शरीर नाशवान है। नाशवान होते हुए यह शरीर अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
    ….. अपने शरीर को फिट रखना परम आवश्यक है। धर्म-कर्म का क्षेत्र देखें तो कहा गया है – शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् (शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है।)
    …… कुछ समय अध्ययन करना, स्वाध्याय करना मस्तिष्क के लिए व्यायाम सदृश है।
    …..अपने शरीर को फिट रखना और प्रसन्नचित्त रहना हमारा प्रथम दायित्व है । जब शरीर स्वस्थ और फिट रहेगा तो ही हम कोई कार्य सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। तभी हमारा शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास हम कर सकते हैं। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से जब हम स्वस्थ और फिट होंगे तभी हम लोगों की भलाई भी कर सकते हैं। लोक-हित, राष्ट्र-हित के कार्यों में योगदान दे सकते हैं।
    …..शरीर ही वह स्थान है, जहां हम अंतिम तक रहते हैं। अतः इसे हर तरह से स्वस्थ और फिट रखना हमारा कर्त्तव्य है।
    ……गिरीन्द्र मोहन झा
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