जितने भी महापुरुष हुए हैं, पुस्तकें पढ़ना, कुछ लेखन कार्य करना, नये-नये चीजों से अद्यतन रहना उनका शौक रहा है।
….. महापुरुषों का नियम बनाना, अपने नियम का दृढ़ता से पालन करना, स्वतंत्र और श्रेष्ठ विचार(Open minded), जिज्ञासा रखना(curiosity), वैज्ञानिक व तार्किक सोच(Scientific temperament), परोपकारी स्वभाव उनकी आदत रही है। उनका जीवन दिनचर्याबद्ध होता है।
….. महापुरुष अज्ञात (श्रेय के पीछे नहीं भागने वाले), निर्वाक(मौन) और शांत होते हैं। उनका चरित्र, व्यक्तित्व और कृतित्व श्रेष्ठ होता है।
….. महापुरुष स्वस्थ(स्वयं में स्थित या आत्मभाव में स्थित) तथा स्थितप्रज्ञ होकर कर्त्तव्य कर्म करते हैं।
…..वे भगवान और उनकी सत्ता में विश्वास रखते हुए या ईश्वर में आस्था रखते हुए कर्त्तव्य-मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं।
….. महापुरुषों का दृष्टांत लेकर हर स्थिति-परिस्थिति का सामना करते हैं। धैर्य, धर्म और साहस कभी नहीं छोड़ते, विषम परिस्थितियों में भी अवसर निकाल लेते हैं। सर्वोत्तम के लिए प्रयास, विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार(Try for best, ready for worst) रहते हैं।
…..वे सोचते हैं, What can I give?( मैं क्या दे सकता हूं?)
…..वे स्वयं को निमित्त मात्र मानकर कर्तापन के अभिमान से मुक्त होकर बड़े बड़े कार्यों में निष्ठा और समर्पण के साथ भाग लेते हैं और यश को प्राप्त करते हैं।
…..वे प्रतिदिन आत्म-आकलन(Self-assessment) और डायरी लेखन करते हैं।
…..वे स्वयं की प्रगति के साथ-साथ कार्य-क्षेत्र, पर्यावरण, परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व के बेहतर भविष्य के लिए भी सोचते हैं और यथाशक्ति कार्य भी करते हैं।
….वे उच्च ध्येय को लक्ष्य बनाते हैं और बड़ा लक्ष्य रखकर उस दिशा में दृढ़संकल्प प्रयास भी करते हैं। अपनी दृष्टि को दूरदर्शिता से युक्त बनाते हैं।
….. वे अपने और दूसरों के अनुभवों से भी सीखते हैं।
…… महापुरुषों के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि आप क्या लेकर आये थे, इसका कोई महत्व नहीं, आप क्या देकर जा रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है।
…..गिरीन्द्र मोहन झा
महापुरुष : गिरीन्द्र मोहन झा
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