कालचक्र- श्री विमल कुमार विनोद - गद्य गुँजन

कालचक्र- श्री विमल कुमार विनोद

Vimal

।मोहन बाबू जो कि एक दफ्तर में काम करते थे।कामकाज करते-करते इनको यह महसूस होने लगता है कि अब जीवन के ग्राहस्थ आश्रम मेें प्रवेश किया जाय।इनके माता-पिता जी को भी यह महसूस होने लगा कि अब मोहन की शादी कर दी जाय।इसके शादी के लिये लड़की वाले भी आना शुरू कर देते हैं।सुयोग्य वधू देखकर मोहन की शादी रोशनी नामक लड़की से तय कर दी जाती है।शादी में रोशनी के परिवार वालों की ओर से बहुत धूमधाम से शादी की तैयारी की जा रही है,बड़े-बड़े पंडाल बनाये जा रहे हैं।शादी की जोरदार तैयारी के बीच में,मोहन बाबू घोड़े पर सवार होकर बारात ले के रोशनी के घर में शादी के लिये पधार जाते हैं। बहुत धूमधाम से वरमाला,अग्नि के सात फेरे लेना,विदाई,सुहागरात आदि रस्म निभाये जाते हैं।पारिवारिक संबंध भी सौहार्दपूर्ण वातावरण में व्यतीत हो रहा है।इसके बाद एक दिन मोहन बाबू टहलते हुये श्मशान के पास से गुजर रहे हैं तो वहाँ वह देखते हैं कि एक ऐसा शव जिसको किसी ने टुकड़े- टुकड़े करके फेंक दिया है,जिसे देखकर मोहन बाबू को इस संसार तथा सांसारिक दुनियाँ से मोहभंग होने लगता है।इसके बाद इनको अपने जीवन से विरक्ति होने लगती है। इसके कुछ ही दिनों बाद एक योगी निर्गुण गाते हुये मोहन के घर की ओर से गुजर रहे थे,वहाँ वह थोड़ी देर के लिये इनके दरवाज़े पर बैठ कर निर्गुण सुनाने लगते हैं।यह सुनकर इनके मन में इस संसार और सांसारिक मोह माया से विरक्ति हो जाती है और गृह त्याग कर उनके साथ निकलकर”बाबा गोरक्षनाथ”में पहुँच जाते हैं।”बाबा गोरक्षनाथ”पहुँचने के बाद इनको स्वेच्छा पूर्वक संकल्प लेने के बाद कि हम अब पारिवारिक या किसी भी प्रकार के सांसारिक मोह-माया में नहीं फसेंगे,के बाद इनको अपनी पत्नी से गुदड़ी की भिक्षा लेने के लिये योगी के वेश में अपने घर भेजा जाता है।मोहन जो कि अब योगी बन चुके हैं,सबसे पहले अपने घर पर जाते हैं, जहाँ पर बरामदे में” बाबा गोरक्षनाथ” की प्रतिमा लगी हुई है।इसी बीच मोहन जो कि योगी बन चुके हैं वहाँ पहुँचते हैं,उसी समय एक इनके गाँव समाज के चाचा जी इनको पहचान कर कहते हैं कि आप तो मोहन बाबू हैं न,बैठिये।इसके बाद वह इनको कहते हैं कि आपके बड़े भाई और भाभी तो दिल्ली में रहने लगे हैं जबकि आपकी पत्नी अपने पाँच वर्ष के बेटे के साथ अपने मायके में रहने लगी है।इसके बाद वह योगी उल्टे पाँव वहाँ से उस जगह के लिये प्रस्थान कर जाते हैं,जिस घर से इनकी शादी हुई थी।वहाँ पर जाने पर एक व्यक्ति जिनके साथ एक बालक भी है,उस योगी को बैठने के लिये कहते हैं।इसी बीच वहाँ उस बच्चे की माता जी आ जाती है जो कि उस योगी को देखकर पहचान जाती है कि आप कहीं “मोहन बाबू”तो नहीं है।इस पर वह योगी कुछ भी नहीं कह पाते हैं और स्तब्ध सी रह जाते हैं।इनकी पत्नी को पता था कि इनके हाथ में इनका नाम”मोहन” लिखा हुआ है।इसके बाद उस योगी की पत्नी विलाप करते हुये वह हाथ दिखाने को कहती है जिसमें उनका नाम लिखा हुआ था।इस पर योगी कहता है कि पहले आपको अपने हाथ से” गुदड़ी” दान करना होगा, तभी मैं अपना हाथ दिखाऊँगा।इस बीच दोनों में बहुत विलाप होता है,फिर वह योगी इसको अपनी भाग्य की बात कहकर वहाँ से अपने जीवन की मायूसी को साथ लेकर चला जाता है।इसके बाद एक दिन मोहन की बाबू की पत्नी अपने किस्मत पर विलाप कर रही है तभी एक संत से उसकी भेंट हो जाती है। रोशनी विलाप करते हुये उस संत के पाँव पर गिरकर अपनी जीवन की स्थिति के बारे में तथा उनके पति के योगी बनने की दर्दनाक कहानी को सुनाती है।इतनी सी बात सुनते ही वह साधु इस ब्रह्मांड के विकरल रूप दिखाते हुये कहते हैं कि “मैं हूँ समय जो कि अनवरत गति से चलता ही रहता हूँ”।जो भी इस “कालचक्र”की चपेट में आता है,उसका उसको प्राश्चित भोगना ही पड़ता है।बेटी उठो,जागो और अपने पूर्व जन्म के समय को देखो जब तुमने किसी योगी को जो “भिक्षाटन” के लिये आया था,उसके साथ तुमने जिस प्रकार की “घिनौनी हरकत की”उसकी प्राश्चित तुमको इस जन्म में भोगना पड़ रहा है।जाओ अब तुम्हें अगले किसी भी जन्म में इन समस्याओं से मुक्त कर देता हूँ।जय हो”बाबा गोरक्षनाथ की” कहकर विलुप्त हो जाते हैं।श्री विमल कुमार”विनोद” शिक्षाविद,भलसुंधिया,गोड्डा(झारखंड)।

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