मेरी पहली माहवारी-चाँदनी झा - गद्य गुँजन

मेरी पहली माहवारी-चाँदनी झा

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महावारी, जिसे महीना, मासिक, mains, एमसी, इत्यादि नामों से जानते हैं।
यह जब किसी लड़की को पहली बार आता है यदि उसे उसकी जानकारी होती है, तो बहुत आसान हो जाता है उसके लिए स्वीकारना। पर जब मैं पहली बार मासिक हुई थी, कुछ भी ज्यादा नहीं जानती थी, ना ही तैयार थी। मेरी उम्र 12 वर्ष थी बस हमउम्र सहेलियों के साथ कभी कभी कुछ बात– जैसे–‐मासिक होने से लड़कियां बड़ी हो जाती है, (कर्मा धर्मा एक क्षेत्रीय पर्व है)जो लड़कियां मासिक होने लगती है, वह या पर्व नहीं करती है। लंबाई नहीं बढ़ती।
पर मासिक कब आता? क्यों आता? इसकी अनियमितता, इसे कैसे साफ रखना है? या यह किस उम्र में आता है? इससे जुड़े मिथ्या, सच्चाई, सब कुछ से अनजान थी मैं। और मुझे लगता उस समय सभी लड़कियों का हाल ऐसा ही था। माँ सभी भी, कभी हम लोग के सामने इस बात का जिक्र नहीं करती थी। टीवी भी गांव में सभी के पास नहीं था। तो एडवर्टाइज वगैरह से भी जानकारी नहीं थी। ना ही अपनों से बड़ों से सब बातें करने की हिम्मत।
तो मैं बताती हूं अपने पहले मासिक चक्र के बारे में। जब मैं नहा रही थी तो पानी के साथ कुछ लाल बहते हुए जा रहा था,(मम्मी भी वहीँ दांत में मंजन कर रही थी।)
तो मम्मी ने पूछा यह क्या है? लाल मंजन था तो मुझे लगा, मंजन बह रहा है मैंने कहा मंजन है। मम्मी को भी लगा,,,। मंजन ही होगा।
पर मुझे कुछ पता नहीं चला, शाम को जब मैं खेत गई, क्योंकि (उस समय मेरे घर में शौचालय नहीं था।) तो मैंने खून देखा, और पूरी तरह उदास हो गई, घबरा गई, क्या करूं? किस से बात करूं? आगे क्या होगा? इत्यादि सवाल,एकदम अकेली महसूस करने लगी। जब मुझे कुछ समझ ना आया तो अपनी एक खास सहेली के पास, दबे-छुपे शब्दों में मैंने इसका जिक्र किया। और उसने कहा, तुम अब बड़ी हो गई, किसी से बताना मत। कपड़ा वगैरह उसी ने दिया अपने घर से, कैसे लेना है? यह भी बताया। जैसे तैसे मेरा पांच-छह दिन गुजरा, रो-रो कर डर-डर कर।अगले महीने फिर आ गया। अब क्या करूं? मैंने बहुत हिम्मत जुटाई, अपनी मम्मी को बताने का, और मम्मी से बात करने के लिए एक माहौल तैयार किया,,,,,,,,,,,, कहा जानती हो, मैं जब खेत गई थी ना,,,,,,,,, हां तो क्या हुआ? बोलो ना? कोई था वहां? क्या हुआ? मम्मी बोलने लगी। इस तरह मेरे मुंह से निकल ही नहीं पा रहा था। और तब मैंने किसी तरह कहा, पेशाब में से खून निकल रहा था। मम्मी ने कहा कब से? मैंने कहा-आज से ।
पहले महीने का जिक्र नहीं कर पाई। बोली कोई बात नहीं, कपड़ा आदि सब दी। कपड़ा बोली छुपा कर रखना, इत्यादि। अब मुझे डर लगने लगा मेरी हाइट नहीं बढ़ेगी। और मेरी बुआ जो मुझ से डेढ़ साल बड़ी थी, अभी तक मासिक उसको नहीं आया था। इसलिए भी मुझे हीनता महसूस होने लगी। सबके सामने मुझे शर्म महसूस होती। चाची, दादी आदि को पता चला, तो कहती अब नहीं बढ़ेगी यह। और (कर्मा-धर्मा पर्व)न कर पाने से, सबको पता चल गया- कि मेरा माहवारी आरंभ हो गया है। और मैं तो उस दिन लग रहा था, दुनिया की सबसे बुरी लड़की हूं। क्योंकि मासिक की सच्चाई, जरूरत lऔर महत्ता से अनजान थी।
और जब कभी दो-तीन महीने नहीं आता था। (क्योंकि प्रारंभ में अनियमित रहता है)
तो घबराहट होती थी, दोस्त सब कहती ऐसे में ही बच्चा होता है, कहीं तुम मां बनने वाली तो नहीं हो? मेरा मेरा डर से हालत खराब, अवसाद में रहती थी। क्योंकि इतनी जानकारी नहीं थी, कि (सेक्स) के बिना मां नहीं बना जा सकता है।
अब बताइए इतनी कुंठा, डर, घबराहट में क्या किसी का पूर्ण विकास हो सकता है?
क्योंकि इन सब पर खुलकर बातें ही नहीं होती थी। किसी भी तरह की स्पष्ठ जानकारी नहीं थी। इन 5 दिनों में पूजा करने का प्रचलन नहीं है।
मैं भी जब मासिक होती थी तो पूजा नहीं करती थी। मम्मी कहती नहाई तो पूजा क्यों नहीं करी? तो नहीं कह पाती थी, कि क्यों नहीं पूजा कर रही हूं? और पूजा रो-रो कर भगवान से माफी मांग कर कर लेती थी। दर्द से भी परेशान रहती थी। दर्द इतना दो-तीन दिन रहता की, डर लगने लगा था, mens से। फिर धीरे-धीरे एक-दो साल बाद, मम्मी से दबे छुपे बात करने लगी। दर्द को लेकर महिला डॉक्टर से दिखाई भी। पर मासिक में दर्द निवारक दवाई लेना ही पड़ता था। और पैड का इस्तेमाल नहीं करती थी। कपड़ा जो इस्तेमाल करती घरवालों से छुपा कर रखना होता था। मेरा तो बस डरते हुए, झिझकते हुए, जैसे तैसे गुजरा। पर मेरी लंबाई बढ़ी। तो इस तरह के भ्रम से बचने के लिए, हमें चाहिए कि, अपने बच्चों को सारे सही, उचित जानकारी जरूर दें। ताकि वो स्वच्छ और स्वस्थ रह सकें।
जब मेरी शादी हुई, बच्चे हुए, पति के साथ रहने लगी,तो पति ने इस्तेमाल के लिए पैड लाकर दिया।
पर मुझे पैड इस्तेमाल करना नहीं आता था, बिना प्लास्टिक हटाए ही पेंटिं में रख लेती थी, जिससे और गीला महसूस करती थी। और कोसती थी पैड को, कि इससे अच्छा कपड़ा है। जब एक दिन मेरी ननद, पैड यूज कर रही थी, तो मैंने देखा और सीखा पैड यूज़ कैसे करना है? तब लगा की पैड यूज करने के बाद, हम बहुत कंफर्टेबल रहते हैं।
और आगे जब मेरे पास मेरी 15 साल की चचेरी बहन रहने आई थी और उसे मासिक आया। (पहली बार नहीं था) तो skirt में खून लग गया। पर शर्म के मारे मुझसे जिक्र ना कर पाई। मैंने देखा जब, तो पैड यूज करना बताया, और पैड दिया। इस तरह मैंने देखा कि- जो हमें एक औरत बनाती है, जिसके कारण हम सृष्टि की रचना कर पाते हैं, उस मुद्दे पर बात करने की बिल्कुल मना ही है। यहां तक कि मुझे भी झिझक ही थी। मुझे लगता झिझक, गोपनीयता, दर्द, बीमारी मानसिक आघात, डर, गलत सूचना, भ्रम फैलता है ,इसलिए जरूरी है कि सारी बातें खुलकर हो। जिस पर सभी अपना विचार रख सकें, और कोई डर या भ्रम ना हो, धीरे धीरे मेरे में परिपक्वता आई। मैंने जो परेशान महसूस किया अपनी अगली पीढ़ी को इस से बचाने का प्रण लिया।टीवी मोबाइल आदि की दुनिया से जुड़ने के बाद बहुत जागरूकता आई।
और पति से, भाई से, बेटे से, इस पर सारी बातें होती है। जब मेरा बेटा लगभग 7, 8 साल का था, जब पैड का प्रचार टीवी पर आता था। तो, पूछता मम्मा यह क्या है? मैं बताती बेटा लड़कियां जब 10-11 साल की होती है ना, तो उसे ब्लडिंग आता है, और ब्लड कपड़े में ना लग जाए, इसलिए इसे यूज करते हैं। और अभी वह सिक्स क्लास में है, और अच्छी तरह से समझता है। और मेरे मासिक होने पर मदद भी करता है। घर के वॉशरूम में पैड रखती हूं। ज्यादा छुपा कर नहीं। और मेरे पर्स में हमेशा 4 पैड जरूर होता है। और अब तो विद्यालय में 6-7-8 कक्षा से ही ,जब किशोरियों के लिए महावारी स्वच्छता (स्वच्छ माहवारी) का ज्ञान दिया जाता है। तो बच्चियों खुलकर विचार रखती हैं। कम उम्र में आना पहले आना, छिपाना है, लंबी ना होगी, प्रेग्नेंट हो जाएगी, बड़ी हो गई, या रोने की जरूरत है, इन सब बातें अभी के बच्चों के लिए बिल्कुल क्लियर है। और बस शिक्षकों के साथ-साथ घर में भी माता-पिता को आगे आकर, अपनी बढ़ती बच्चियों और बच्चे को स्वच्छ महामारी का ज्ञान दें। खुलकर बातें करें, पैड आदि खरीद कर दें, पैड या माहवारी से जुड़े पिक्चर जरूर दिखाये। जिससे बच्चियों के मन में ना कोई आधा-अधूरा ज्ञान हो, ना कोई डर, न कोई बीमारी, न घबराहट, न बेचैनी, सम्पूर्ण विकास हो पायेगा। माहवारी का उचित और सही ज्ञान हमें शारीरिक और मानसिक दोनों स्वस्थ्य रखती है। यहां तक कि लोग डॉक्टर के पास बात करने में भी जी झिझकते हैं।
जबकि अब मैं, अपने पति, बेटे, भाई, सहकर्मी, स्कूल के बच्चे, मां भाभी, सभी से इसके बारे में, या यूं कहें,,,,,, सेक्सुअल, महावारी,गुड-टच, बैड-टच ,बढ़ती उम्र, हार्मोनल परिवर्तन, आदि के बारे में बिल्कुल स्पष्ट बात करती हूं।
और करनी भी चाहिए, और बेटी से तो हर मामले में बिल्कुल opens, ताकि वह बिना डरे, हर बात मुझे बता सके। ऐसा करके हम अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं।
ऐसी बातें कर, सुन लोग हसेंगे, मजाक उड़ाएंगे, लेकिन हम लोग स्वच्छ महावारी, इसकी महत्ता, इसकी जरूरत, इसकी हकीकत पर सही और उचित ज्ञान देकर, अपने बच्चियों को, शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रख सकते हैं। और हमारी किशोरिया पंख लगाकर उड़ने के लिए तैयार होगी। ना कोई झिझक, ना कोई डर, और ना ही किसी तरह की शर्म की बात है यह।।
तो आइए सभी प्रण लें,,,,,
स्वच्छ माहवारी का लेंगे ज्ञान।
बिटिया ना रहेगी अनजान।
डर, भ्रम, घबराहट से दूर,
भोजन पोषण से भरपूर।
भ्रम मिटायेंगे ,स्वच्छ बनाएंगे।
हम ने मिल कर लिया है ठान।।

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