हृदय परिवर्तन -सुरेश कुमार गौरव - गद्य गुँजन

हृदय परिवर्तन -सुरेश कुमार गौरव

Suresh

कुंदन का परीक्षाफल आज निकलने वाला है। इसीलिए वह सुबह से ही दैनिक कार्यों से निवृत्त होने लगा। स्कूल जाने के समय तैयार हो स्कूल की ओर चल पड़ा।

स्कूल पहुंचने पर जब कुंदन को परीक्षाफल मिला,तो अच्छे अंक नहीं मिल पाने के कारण वह सातवीं क्लास में अच्छे ग्रेड नहीं ला पाया। ऐसा भी नहीं था कि वह अच्छे ग्रेड नहीं ला पाए। ऐसा परिणाम मिलने की मुख्य वजह खेल और मित्रों में ही जुटे रहना था। उसने परीक्षाफल बैग में रखा और बिना किसी से कुछ कहे स्कूल परिसर से बाहर आ गया। सामने चाय की दुकान पर लोगों की भीड़ लगी थी जहां उसके कई सहपाठी भी थे। लेकिन उसने उधर ध्यान नहीं दिया। स्कूल से फाटक के बाहर आकर कुंदन एक क्षण भी नहीं रुका। उसका दिल बेचैन था। बचपन से लेकर अब तक अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वाला कुंदन इस साल की सफलता में गिरावट से बहुत ही हतोत्साहित हो गया था। उसे सब कुछ सूना सूना लग रहा था। वह अपना कदम घर से विपरीत दिशा की ओर बढ़ाता चला जा रहा था। सड़क के दोनों ओर किनारे हरियाली लिए खेतों में पिछले दो वर्षों के बाद बहार आई थी। पिछले दो सालों से इस गांव में अकाल पड़ने के कारण मेहनती किसानों की फसलें नष्ट होकर सूख गई थीं। दो सालों के बाद अपने गांव की खेतों में हरियाली देखकर सभी किसानों के दिल खुश थे। इस अकाल के चंगुल से इस साल सबको सहारा मिल जाएगा। लेकिन कुंदन के बालमन पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा था। खेतों के अन्न हरियाली लिए अपनी जगह हंस रहे थे और उसका मन अपनी जगह हंस रहे थे और उसका मन अपनी जगह एक गहरे बोझ से दबा जा रहा था। कहते हैं प्रकृति द्वारा बनाई गई सारी सुंदरता हम मनुष्यों के मन की विषाद को दूर कर देती है। कुंदन का दुःख इतना भारी था कि उसके लिए प्रकृति की सारी सुंदरता फीकी थी। वह पैदल चलते-चलते बहुत दूर निकल आया। गांव के छोर पर कुंदन जब पहुंचा,तो एक कुएं से दो औरतें पानी भर रही थीं। वह चुपचाप कुएं के पास पहुंचा। पानी भरते हुए दोनों बातचीत भी करती जा रहीं थीं।

पहली औरत बोल रही थी,’बहन,अगर इस साल की भी फसल मारी जाती ,तो क्या हम अपने भाग्य को कोसते हुए चुपचाप बैठे रह जाते। हम फिर से कठिन परिश्रम कर अन्न पैदा करते। ‘हां बहन! हमारे इसी विश्वास का यह फल है कि इस साल हमारे खेतों में हरियाली फैली है.किसानों को फसल बर्बाद होने से निराश नहीं होने चाहिए। उसे फिर से परिश्रम कर फसल उगानी चाहिए। दोनो औरतों की बातें सुन कर कुंदन की प्यास जाती रही। उसे लगने लगा कि किसी ने उसकी आत्मा को झकझोर दिया है और वह अपनी अपेक्षित सफलता के कारण दुबारा मेहनत की डर से भागा जा रहा है। उसका मन उसे बार-बार कोस रहा था। दोनो औरतों की बातों ने कुंदन के मन में विश्वास ला दिया। वह मन में संकल्प लेकर वापस लौट कर सड़क पर आ गया और तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर चल पड़ा। श्रद्धा से उन दो औरतों को मन ही मन प्रणाम कर उसने संकल्प कर लिया कि मैं इस साल खूब जी जान से पढ़ू़ंगा और मेहनत से नहीं भागूंगा। कुंदन का हृदय परिवर्तन हो चुका था।

सुरेश कुमार गौरव,स्नातक कला शिक्षक,
उमवि रसलपुर फतुहा बिहार,पटना (बिहार)
स्वरचित और मौलिक
@ सर्वाधिकार सुरक्षित

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