आज की नारी जीवन और समाज के हर क्षेत्र में कुछ करिश्मा कर दिखाने की चाह रखती है । उसमें छटपटाहट है आगे बढ़ने की। भारतीय समाज में स्त्रियों को सम्मान पूर्ण स्थिति प्राप्त कर रही है । स्त्री को शक्ति की साकार प्रतिमा के रूप में जाना जाता है । यहाँ स्त्री को देवी की संज्ञा दी जाती है एवं लक्ष्मी, दुर्गा , शक्ति के रूप में पूजा जाता है । भारतीय इतिहास का प्रारंभ वैदिक युग से होता है । ऋगवैदिक काल में स्त्रियों को ऊँचा स्थान प्राप्त था। उस युग में नारी का समाज में आदर था। वह जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर कार्य करती थी । उसे पुरुष के समान ही सभी अधिकार प्राप्त थे । गार्गी, मैत्रेयी उस युग की ऐसी नारियाँ है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर ऋषियों का पद प्राप्त किया था । किंतु कालान्तर में पुरुष महिलाओं के अधिकारों को छीनता गया और महिलाओं की स्थिति में लगातार गिरावट आती गई।
नारी को पुरुष बनकर पुरुष के समकक्ष खड़ा नही होना है बल्कि पूरक शक्ति के रूप में उभरना है । नारी व पुरुष एक – दूसरे के पूरक हैं । नारी के बिना पुरुष का कोई अस्तित्व नहीं । ठीक इसी तरह पुरुष के अभाव में नारी का कोई मूल्य नहीं । इसलिए पुरुषों को अपना प्रतिद्वन्दी मान लेना, उनसे घृणा करना सशक्त कहलाना नहीं है बल्कि दोनों के आपसी सहयोग से ही एक विकसित समाज की नींव रखी जा सकती है । हमारे देश में पिछले चार दशकों में महिला साक्षरता दर में काफी वृद्धि भी हुई है । जहाँ 1971 में महिला साक्षरता दर 22% थी वहीं यह 201 में बढ़कर 64 . 6% हो गई है । यह बदलाव इसलिए भी हो सका क्योंकि लड़कियों , विशेषकर ग्रामीण एवं निर्धन परिवार की लड़कियों को हाशिये से निकालने के लिए विभिन्न सरकारों ने मुफ्त किताबें, मुफ्त पोशाकें , छात्रवृतियाँ, छात्रावास एवं मिड – डे – मील जैसे प्रोत्साहन कारी कदम उठाए हैं । भारत सरकार द्वारा कई ऐसी योजनाएँ चलाई जा रही है, जिनमें ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है, जैसे – स्वर्ण जयंति ग्राम स्वरोजगार योजना, बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ योजना, स्वास्थ्य स्त्री योजना , सैनेट्री मार्ट योजना , कामधेनु योजना , किशोरी बालिका योजना आदि योजनाएँ राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं ।
कहने का तात्पर्य यह है कि नारी ने धीरे – धीरे खुद को जाना है, अपनी शक्ति और गुणों को पहचाना है । फिर भी वह अपने अनुसार खुद को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्ष शील रही है । इसलिए विरोध – अवरोध , तिरस्कार – बहिष्कार को नकारते हुए उसे आगे आना होगा । तभी वह समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है और साथ ही अपनी सार्थकता भी सिद्ध कर सकती है । इस तरह समाज व अपनी संस्कृति से जुड़ी वर्तमान परिवेश की चुनौतियां स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है और होगा । आज की उभरती हुई नारी के लिए यह कहना उचित होगा कि –
” कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है ।
जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुमसे हारी है।”
प्रेषक –
आशीष अम्बर
( शिक्षक)
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
जिला – दरभंगा
बिहार
