एक ‘ आदर्श भारतीय ‘ एवं ‘ भावी पीढ़ी के प्रेरणापुंज ‘ के रूप में पहचाने जाने वाले राष्ट्रपति डा . ए . पी . जे . अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर , 1931 ई० को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक साधारण तमिल परिवार में हुआ था । इनका पूरा नाम अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था । इनके पिता का नाम जैनुलाबदीन और माता का नाम आशियम्मा था । दोनों ही बड़े सरल स्वभाव के धर्मपरायण दंपती थे।
समाज में डॉ. कलाम के माता – पिता का बड़ा सम्मान था और उन्हें एक आदर्श दंपती के रूप में देखा जाता था । उनका संयुक्त परिवार था और उसमें कई सदस्य थे।
डा. कलाम के पिता जैनुलाबदीन का व्यक्तित्व आडंबर से परे था । वे अनावश्यक सुख – सुविधावाली चीजों से दूर रहते थे एवं विचारों की श्रेष्ठता व मानवीय मूल्यों को अधिक महत्व देते थे । रामेश्वरम् मंदिर के सबसे बड़े पुजारी पक्षी लक्ष्मण शास्त्री उनके अभिन्न मित्र थे ।
डा . कलाम के बाल – जीवन पर उनके चचेरे भाई शम्सुद्दीन का गहरा प्रभाव पड़ा । शम्सुद्दीन रामेश्वरम् में अखबारों के एकमात्र वितरक थे। उन दिनों तमिलनाडु में ‘ दिनमणि ‘ अखबार की माँग सबसे ज्यादा थी । अखबार में जो कुछ भी छपा होता था, उसे समझने में कलाम उस समय समर्थ नहीं थे, लेकिन बालसुलभ उत्सुकता के कारण जब शम्सुद्दीन अखबार लेकर घर आते थे तो बालक अखबार में छपी तस्वीरों पर नजर डालकर ही संतोष कर लेते थे ।
सन् 1939 ई० में जब दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ा तब कलाम की आयु मात्र आठ वर्ष थी । उस समय विश्वयुद्ध के कारण भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी । उसका एक परिणाम यह हुआ कि रामेश्वरम् स्टेशन पर गाड़ी का ठहरना बंद कर दिया गया । ऐसी स्थिति में शम्सुद्दीन के अखबारों के बंडल रामेश्वरम् और धनुषकोडि के बीच रामेश्वरम् रोड पर चलती गाड़ी से गिरा दिए जाते थे । तब शम्सुद्दीन को एक ऐसे मददगार की जरूरत पड़ी , जो अखबार के गिरे हुए बंडलों को उठाने में उनकी मदद करता । बालक कलाम उनका हाथ बटाने के लिए तैयार हो गए । इस प्रकार कलाम को पहली तनख्वाह अपने भाई शम्सुद्दीन के हाथों मिली ।
बचपन में कलाम की प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् में ही हुई । उन्हीं दिनों की बात है, एक दिन गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर किसी कक्षा में पढ़ा रहे थे । अनजाने में बालक कलाम उस कक्षा से होकर निकल गए । शिक्षक रामकृष्ण अय्यर ने तुरंत इनकी गरदन पकड़ी और भरी कक्षा के सामने बेंत से मारने लगे । कुछ समय बाद जब बालक कलाम को गणित में पूरे नंबर आए तब शिक्षक रामकृष्ण अय्यर ने स्कूल की सुबह की प्रार्थना के समय सबके सामने यह घटना सुनाई । उन्होंने कहा , ” मैं जिसकी पिटाई बेंत से करता हूं , वह एक महान व्यक्ति बनता है । मेरे शब्द याद रखिए , यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है ।
बचपन से ही बालक कलाम आकाश और पक्षियों के उड़ने के रहस्यों के प्रति आकर्षित थे । सारस को समुद्र के ऊपर मंडराते और दूसरे पक्षियों को ऊँची उड़ानें भरते देख इनका मन मचल उठता था । इन्होंने निश्चय किया कि एक दिन मैं भी आकाश में ऐसी ही उड़ानें भरूँगा ।
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान अनुशासन का पालन करते हुए इन्होंने पढ़ाई में कड़ी मेहनत की । कॉलेज में जब कलाम अंतिम वर्ष में पढ़ रहे थे, उसी समय इनमें अंग्रेजी साहित्य के प्रति रुचि जागृत हुई । इन्होंने टॉल्स्टॉय, स्कॉट, हार्डी, आदि महान लेखकों की सभी उपलब्ध पुस्तके पढ़ डाली ।
सन् 1960 ई० के दशक में डा. कलाम ने विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र , थुम्बा ( केरल ) में काम किया । वहाँ इन्होंने प्रथम स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । उसके बाद सन् 1982 ई० में डॉ . कलाम ने भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन में निदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं । वहाँ इन्होंने ‘ संयुक्त नियंत्रित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम’ का संचालन किया । बाद में डॉ. कलाम ने रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार , प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार के रूप में भी काम किया । सन् 1998 ई० में पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षणों में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी । डॉ . कलाम प्रत्येक कार्य में अपने सहयोगियों को साथ लेकर चलते । ये उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुनते – समझते । इन्होंने कभी भी अपनी इच्छा को अपने साथियों पर थोपने का प्रयास नहीं किया । ये अपनी टीम में प्रतिबद्धता, विश्वास और आपसी समझ हर हाल में बनाए रखते थे । इनका सभी के साथ मित्रवत् व्यवहार रहता था । अपने इन्हीं गुणों के कारण कलाम हमेशा अपने सहयोगियों के प्रिय पात्र बने रहे । इनका पूरा जीवन ही इनके कार्यो को समर्पित रहा । इनका कार्य ही इनकी रुचि थी और यही इनका मित्र भी था ।
इनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए इन्हें विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । इन्हे सन् 1981 ई० में ‘ पद्म भूषण, 1990 ई० में ‘ पद्म विभूषण’ और 1997 ई० में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘ भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया ।
अन्नामलाई विश्वविद्यालय में अध्यापन – कार्य के दौरान ही डॉ. कलाम को भारत का बारहवाँ राष्ट्रपति बनाने के लिए नामांकित किया गया । 25 जुलाई , 2002 ई० को ये भारत के बारहवें राष्ट्रपति के रूप में मनोनीत हुए ।
डाँ . कलाम जी के द्वारा लिखी गई कुछ प्रमुख पुस्तकों में ‘ विंग्स ऑफ फायर ‘, ‘ इग्नाइटेड माइंड्स’, ‘ भारत 2020 तथा टारगेट 3 बिलियन प्रमुख हैं । डॉ . कलाम 83 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह 27 जुलाई 2015 ई० अनंत में विलीन हो गए । आज भी देश उनको ” मिसाइल मैन ” के नाम से याद करता है ।
डॉ . कलाम का देश के युवाओं के लिए संदेश है –
‘ हे भारतीय युवक
ज्ञानी – विज्ञानी
मानवता के प्रेमी
संकीर्ण तुच्छ लक्ष्य
की लालसा पाप है ।
मेरे सपने बड़े
मैं मेहनत करूँगा
मेरा देश महान हो
धनवान् हो गुणवान् हो
यह प्रेरणा का भाव अमूल्य है,
कहीं भी धरती पर
उससे ऊपर या नीचे
दीप जलाए रखूँगा
जिससे मेरा देश महान हो ।’
आशीष अम्बर
( विशिष्ट शिक्षक )
उत्क्रमित मध्य विद्यालय धनुषी
प्रखंड – केवटी
जिला – दरभंगा
बिहार