किस्सा है साल 1931 के कड़ाके की ठंड वाले लंदन का।
सेंट जेम्स पैलेस की भव्य इमारत के बाहर महंगी गाड़ियों की कतारें लगी थीं।
ब्रिटेन के बड़े-बड़े मंत्री, शाही नुमाइंदे और खुद को दुनिया का मालिक’ समझने वाले अंग्रेज़ अधिकारी कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए तीन-पीस के वूलेन सूट, लंबी टाई, ओवरकोट और सिर पर हैट लगाए शान से अंदर जा रहे थे।
सब तरफ अंग्रेजी ठाठ-बाठ और रौब का माहौल था।
तभी एक गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक ऐसा शख्स बाहर आया जिसे देखते ही वहाँ खड़े विदेशी पत्रकारों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
लंदन की इस बर्फ़ीली ठंड में उस शख्स के तन पर न तो कोई कोट था, न सूट और न ही टाई। वे सिर्फ एक साधारण सी सूती धोती और कंधों पर एक चादर लपेटे हुए थे।
यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि भारत के सबसे बड़े जननायक महात्मा गांधी थे, जो अंग्रेजों के साथ देश के भविष्य पर चर्चा करने गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुँचे थे।
यह महज़ कपड़ों का फ़र्क़ नहीं था, बल्कि यह दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा और खामोश राजनीतिक संदेश था।
इस संदेश में राजनीतिक सादगी, जन-प्रतिनिधित्व, भारतीय मिट्टी की खुशबू, किसी भी परिस्थिति के आगे न झुकने की जिद्द, एक जननायक के रूप में अदम्य नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र के प्रति अगाध आत्मसम्मान की भावना छिपी थी।
साथ ही, यह पूरी दुनिया के लिए एक खुली चुनौती भी थी कि देखो— एक ‘गुलाम’ देश का अर्ध-नग्न फ़क़ीर अंग्रेजों के घर में घुसकर, उनके सूट-बूट वाले बाबुओं के सामने अपनी शर्तों पर अडिग है।
उस वक्त एक अकेले गांधी जी ने सूट-बूट पहने अंग्रेज़ों के मन में हीन भावना भर दी थी, जो उन्हें राजनीतिक और मानसिक रूप से गहरी चोट दे गया।
गांधी बनना आसान नहीं है। देश के लोगों ने उन्हें राष्ट्रपिता ,बापू महात्मा कहकर पुकारा । ये लोगों का उनके प्रति प्रेम है ।
आज उनके जन्मदिवस पर कागज पर उकेरी इन पंक्तियों के जरिए उनके चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित कर उन्हें शत-शत नमन करता हूँ।
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जय हिंद
अरविंद कुमार
म.वि.रघुनाथपुर गोठ ,भरगामा ,अररिया