गद्य गुँजन आलेख पितृपक्ष विशेष : गिरीन्द्र मोहन झा

पितृपक्ष विशेष : गिरीन्द्र मोहन झा




पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीरामचन्द्र जी के पूर्वज राजर्षि भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार एवं कल्याण के लिए माता गंगा को घोर तपस्या द्वारा धरती पर लाया । भगीरथ के नाम पर माता गंगा का नाम भागीरथी पड़ा । माता गंगा से केवल उनके पूर्वजों का उद्धार व कल्याण ही नहीं हुआ, समस्त संसार का कल्याण हुआ और हो रहा है।
अतः पितरों/पूर्वजों के उद्धार व कल्याण हेतु किये जाने वाले कृत्यों से, उनका तर्पण व उन्हें तृप्त करने से केवल वे ही तृप्त नहीं होते हैं, स्वयं तथा परिवार का भी कल्याण होता है। ऐसा कृत्य लोक कल्याणकारी होते हैं।
शास्त्र कहते हैं, देवता सद्बुद्धि, बल, ओज, तेज आदि देते हैं, ऋषि उद्धार व कल्याण का मार्ग बतलाते हैं, ज्ञान-विज्ञान देते हैं और श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को संतति, धन, विद्या, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं।
विज्ञान भी इस बात को मानता है कि पूर्वजों का एक अंश हमारे शरीर में DNA, जीन व जीनोम के रूप में पारिवारिक संस्कार बनकर रहता है, जिसके बल पर हम सबकुछ अर्जित करते हैं।
मनुष्य शरीर और संस्कारों के निर्माण में ईश्वर की कृपा, अपने सद्विचार और सत्कर्म की भूमिका होती है।-
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रय: ।। (आदि शंकराचार्य, विवेकचूडामणि, ३)
ईश्वर की कृपा से ही तीन वस्तुएं मिलती हैं – मनुष्यत्व(मनुष्य शरीर), मुमुक्षुत्व(मोक्ष या भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा) और महापुरुषों का संग- ये तीनों ही दुर्लभ हैं।
किन्तु, पारिवारिक संस्कार के निर्माण में, परिवार की शुद्ध परम्पराओं के निर्माण में, श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों के निर्माण में, धन-धान्य, भूमि-संपदा को अर्जित करने में, पारिवारिक प्रतिष्ठा अर्जित करने में, आदि में माता-पिता के साथ हमारे परिजनों, पूर्वजों के त्याग, संघर्ष, सत्कर्म और तपस्या की महती भूमिका होती है। कुल के सदाचार, सुसंस्कार आदि का निर्माण पूर्वजों के संघर्ष, धर्म, सत्कर्म तथा तपस्या का फल है । विज्ञान भी इस बात को मानता है।
पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण करने से वे प्रसन्न व तृप्त होते हैं। उनकी प्रसन्नता से हमारे पारिवारिक संस्कार पुष्ट होते हैं, हमारे कुल में वृद्धि होती है। उन्हीं संस्कारों के बल पर हम अपने और अपने परिवार की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हैं, साथ ही परोपकार करते हैं, कार्यक्षेत्र, देश और समाज को कुछ श्रेष्ठ दे पाते हैं। निरंतर श्रेष्ठता का वरण कर पाते हैं। साथ ही, यश-प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, “पूर्वजों के बनाये गये शुद्ध परम्पराओं के अनुसार ही बरतना चाहिए अर्थात् आचरण करना चाहिए, अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए।” निज कुलाचार का त्याग नहीं करना चाहिए। वही मूल है, उसे पकड़कर रहना चाहिए।
अतः देवताओं के पूजन के साथ-साथ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा निवेदित करना, श्रद्धापूर्वक श्राद्ध-तर्पण करना भी हमारा परम कर्त्तव्य है। इससे हमारे संस्कार भी पुष्ट होते हैं। मन शांत और प्रफुल्लित हो जाता है । आदि ।

-गिरीन्द्र मोहन झा

विद्यालय अध्यापक, +२ भागीरथ उ० वि०, चैनपुर-पड़री, सहरसा

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