भगजोगनी : अरविंद



​जब अंधेरी रात जवान होती, तब जंगलों की खामोशियाँ गहरी हो जातीं, आसमान में बादलों का पहरा होता और ज़मीन पर सन्नाटे की चादर।

​तब पत्तों की हल्की सरसराहट के बीच हवा में तैरती भगजोगनी के प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत नज़ारा किसी परिकथा से कम नहीं था।

​बचपन में टिमटिमाती भगजोगनी को जब गोल हथेलियों के बीच रखकर उसकी ठंडक भरी रोशनी का अहसास करते, तो मन रोमांचित हो उठता था।

​प्रकृति का यह जादुई जीव ग्रामीण परिवेश का अहम हिस्सा रहा है। इसका प्राकृतिक नज़ारा मन को मोहने के साथ-साथ हमें विज्ञान के चमत्कार से भी रूबरू करवाता है।

​भगजोगनी के चमकने के पीछे एक दिलचस्प रासायनिक प्रक्रिया होती है, जिसे विज्ञान की भाषा में जैव-संदीप्ति कहा जाता है।

​भगजोगनी के पेट के निचले हिस्से में लुसिफेरिन नामक रासायनिक पदार्थ होता है। जब यह ऑक्सीजन के संपर्क में आता है, तो रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, और इससे शीतल प्रकाश निकलता है।

​भगजोगनी का चमकना उसकी सुंदरता के साथ उसकी ज़रूरत भी है।

​नर भगजोगनी अपनी खास चमक से मादा भगजोगनी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

​दरअसल बरसात का यह समय उनके प्रजनन काल का होता है। बरसात के मौसम में हवा में नमी बढ़ जाती है, जो इसके लार्वा के पनपने के लिए अनुकूल समय होता है।

​कई बार भगजोगनी अपनी तेज़ रोशनी से अपनी जान की हिफाजत भी करते हैं। वे पक्षियों और मेंढकों को यह संदेश देते हैं कि उनका स्वाद खराब है और वे जहरीले हैं।

​आज के आधुनिक दौर में, कंक्रीट के जंगल, अत्यधिक कृत्रिम रोशनी और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण भगजोगनी का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है।

​यही वजह है कि अब शहरों में तो दूर, गांवों में भी भगजोगनी कम ही दिखाई देते हैं।

​यह इस बात का संकेत है कि हमारा पर्यावरण असंतुलित हो रहा है।
​
भगजोगनी केवल एक साधारण कीड़ा नहीं, बल्कि प्रकृति की अनमोल कारीगरी का एक जीवंत उदाहरण है।

​यह हमें यह सिखाता है कि छोटी सी रोशनी भी अंधेरे को चुनौती दे सकती है।

​मनमोहक जीव भगजोगनी की लगातार घटती संख्या हमारे लिए चिंता का विषय है।

​ज़रूरत है हमें अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने की, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राकृतिक जादू यानी भगजोगनी या जुगनूओं की टिमटिमाहट का आनंद ले सकें।

अरविंद कुमार
म.वि.रघुनाथपुर गोठ ,भरगामा ,अररिया

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