अतर्मन का कुरुक्षेत्र: जब विचार बनते हैं चक्रव्यूह और जीवन ‘धर्मसंकट’
मानव जीवन कोई साधारण यात्रा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का सबसे जटिल और भीषण संग्राम है। हर व्यक्ति के भीतर एक अदृश्य, मगर महा-विनाशकारी युद्ध निरंतर चलता रहता है। जब कोई मनुष्य अपने जीवन के चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है कि “क्या करूँ और क्या न करूँ”, तो वह केवल एक साधारण असमंजस में नहीं होता, बल्कि वह स्वयं को कालजयी चक्रव्यूह के उस केंद्र में पाता है, जहाँ से बाहर निकलने का मार्ग साक्षात यमराज के द्वार जैसा दुर्गम प्रतीत होता है।
• यह असमंजस केवल दो रास्तों का चुनाव नहीं, बल्कि अस्तित्व की नींव को हिला देने वाला एक ऐसा वैचारिक भूकंप है, जो आत्मा की गहराइयों तक को झकझोर कर रख देता है।
विचारों का तांडव और मानसिक महाभारत
यह असमंजस कोई सामान्य सोच नहीं है, यह अंतर्मन में छिड़ा हुआ एक महा-महाभारत है! एक तरफ हमारी आकांक्षाओं और सात्विक इच्छाओं की न्यायप्रिय ‘पांडव सेना’ खड़ी है, तो दूसरी तरफ संशयों, भयों और सांसारिक विकारों की अनंत अक्षौहिणी ‘कौरव सेना’ शंखनाद कर रही है।
• महा-संग्राम की गूंज: मस्तिष्क का हर एक कोना कुरुक्षेत्र के मैदान में बदल चुका है। विचारों के रथ आपस में टकरा रहे हैं, तर्कों के बाणों से अंतरात्मा छलनी हो रही है, और अनिर्णय का गांडीव हाथ से बार-बार छूट रहा है।
• प्रलयंकारी अंतर्द्वंद्व: जब सही और गलत के बीच का भेद धुंधला होने लगता है, तब दिल और दिमाग के बीच जो वैचारिक प्रलय आती है, उसकी तीव्रता के सामने समूचे ब्रह्मांड का भूकंप भी फीका पड़ जाता है। एक-एक पल में लाखों विचारों का सृजन और लाखों का विनाश हो रहा है।
• अनादि शंखनाद: इस आंतरिक युद्ध की विभीषिका इतनी भयानक है कि शांत बैठे हुए मनुष्य के भीतर भी सहस्रों शंखों का सिंहनाद एक साथ गूंजता रहता है, जिससे नींद और चैन तिनके की तरह उड़ जाते हैं।
चक्रव्यूह में फंसी नियति
आगे बढ़ने की चाह में जब मनुष्य जतन तलाशता है, तो नीतियां और योजनाएं भूलभुलैया जैसी लगने लगती हैं। यह चक्रव्यूह द्रोणाचार्य के रचे उस चक्रव्यूह से भी हजार गुना अधिक भयानक है, क्योंकि वहां केवल सात द्वार थे, परंतु इस मानसिक चक्रव्यूह के अनंत द्वार हैं। हर एक द्वार पर ‘मोह’, ‘संदेह’ और ‘असफलता का भय’ जैसे महारथी तलवार ताने खड़े हैं।
• मनुष्य इस वैचारिक चक्रवात में इस तरह फंस जाता है मानो किसी ब्लैक होल (कृष्ण विवर) की असीम गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे भीतर खींच रही हो।
• समय का चक्र मानो थम जाता है, और हर एक पल एक पूरे युग की भांति भारी लगने लगता है। व्यक्ति आगे बढ़ने के लिए एक पैर उठाता है, तो संशय की जंजीरें उसे पीछे की ओर धकेल देती हैं।
निष्कर्षण: गीता के ज्ञान की प्रतीक्षा
इस महा-विनाशकारी अंतर्द्वंद्व का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति शारीरिक रूप से शांत दिखने पर भी भीतर से पूरी तरह से आंदोलित रहता है। उसके भीतर की इस कुरुक्षेत्र-रूपी चेतना को शांत करने के लिए, संशयों के इस भीषण ‘धर्मसंकट’ को नष्ट करने के लिए, अब किसी साधारण सूझबूझ की नहीं, बल्कि साक्षात श्रीमद्भगवद्गीता के उस दिव्य और विराट कृष्ण-संदेश की आवश्यकता है।
वह संदेश जो गांडीवधारी अर्जुन की तरह इस अशांत मन को भी मोह और असमंजस के बंधनों को काटकर कर्म के पथ पर विजयी बना सके। यह युद्ध तब तक थमेगा नहीं, जब तक कि विवेक रूपी कृष्ण इस अंतर्मन के रथ की कमान अपने हाथों में नहीं ले लेते और आत्मविश्वास का सुदर्शन चक्र इन समस्त दुविधाओं का समूल नाश नहीं कर देता!
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
जीवन धर्मसंकट …धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
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