मज़ा आता है जब बच्चे कल्पना की दुनियां में जाते हैं, आसमान में पंछियों की तरह विचरण करते हैं; समुद्र में गोता लगाते हैं और विभिन्न जलीय जीवों से प्रतियोगिता करते हैं। उसकी कल्पना की उड़ान प्रकाश की गति से भी तेज होती है। बच्चे तो पहले ठोस संदर्भों से ही सीखते हैं, फिर कल्पना की उड़ान भरते हैं; फिर वे कुछ ढूंढते हैं। फिर कुछ करने की सोचते हैं। यही तो उनका सीखना है क्योंकि ढूंढते-ढूंढते वे समस्या का समाधान भी निकालते हैं। खोजबीन के दौरान बच्चे गलतियां करते हैं, फिर वे आत्मविश्लेषण करते हैं और अंतत: समाधान निकाल लेते हैं। अतिक्रियाशील बच्चे घर की प्यालियों को तोड़ते हैं तो हम समझते हैं कि वे बहुत शरारती हैं। फिर उसे डांट पिलाते हैं और कहते हैं कि कीमती प्रीमियम कप तोड़ दिया। लेकिन समझें इस बात को, उसकी क्रियाशीलता कुछ तलाश करती है, जो मन में उठ रहे प्रश्नों का उत्तर मांगती है। बच्चों की कल्पनाशीलता रचनाशीलता में बदल जाए, इन्हीं सब बातों को बाल पुस्तकों के लेखक को ध्यान में रखना चाहिए। पुस्तक का आवरण पृष्ठ इतना बाललुभावन हो कि वह अनायास उसके तरफ़ खींचा चला आए।। वह पुस्तक बच्चों को हिमालय की ऊंचाइयों पर ले जाए या फिर कश्मीर की वादियों में घुमाए। बच्चा ‘क्योंजीमल कैसे कैसलिया’ देख कर पहले तो हंसता है फिर प्रतिक्रिया देता है: देखो, मोटू क्या कर रहा है? बच्चे ठोस संदर्भों के द्वारा ही भाषा को रचते हैं। बच्चे दुनियां को समझना चाहते हैं और इसी क्रम में वे भाषा रचने का काम करते हैं (कृष्ण कुमार द्वारा रचित ‘बच्चों की भाषा और अध्यापक’)। क्योंजीमल और कैसे-कैसलिया" के लेखक शिक्षाविद सुबीर शुक्ला हैं। क्योंजीमल पात्र है जो बात-बात पर "क्यों-क्यों-क्यों?" पूछते रहते हैं, भले ही सामने वाले के पास जवाब हो या न हो। कैसे-कैसलिया क्योंजीमल का दोस्त है, जो मौका मिलते ही हमेशा "कैसे-कैसे-कैसे?" का सवाल दाग देते हैं। कहानी का सारांश इस तरह है। एक दिन इन दोनों दोस्तों की मुलाकात अपने गुरुजी से होती है, जो साइकिल पर गेहूं पिसवाने के लिए बाजार जा रहे होते हैं। गुरुजी को देखते ही दोनों उन पर सवालों की बौछार कर देते हैं। क्योंजीमल: बाजार क्यों जा रहे हो? गेहूं क्यों पिसवाना है? आटा क्यों चाहिए? रोटी क्यों बनानी है? कैसे-कैसलिया: बाजार कैसे जाओगे? गेहूं कैसे पिसवाओगे? आटा कैसे सानोगे? रोटी कैसे बेलोगे? बेचारे गुरुजी उनके "क्यों" और "कैसे" के चक्रव्यूह में ऐसा फंसते हैं कि दोनों को रोटी बनाने की पूरी विधि (आटा सानना, बेलना, तवे पर पकाना और आग पर फुलाना) समझाते-समझाते थक जाते हैं। आखिर में जब उन्हें समझ आता है कि इन दोनों के सवाल कभी खत्म नहीं होंगे, तो गुरुजी अपनी साइकिल पर सवार होकर वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो जाते हैं।
बच्चे प्रश्नों की बौछार करते हैं, इस बीच उसका ज्ञान एवं भाषा समृद्ध होते हैं। बच्चों की शब्द रचना अलग होती है। पुस्तक की भाषा ठोस वस्तुओं से संदर्भित हो, सरल हो; सरस एवं ग्राह्य हो। सचित्र वर्णन बच्चों के लिए अर्थपूर्ण बन जाते हैं क्योंकि वे उनके लिए रुचिकर होते हैं। कहानी एवं कविता कहें और उसके सामने फिल्म की तरह चित्र भी चलते रहे तो बच्चे जिन शब्दों को पढ़ नहीं पाते हैं, उसे भी समझ लेते हैं, वे किसी भी वाक्य को इंटरप्रेट कर लेते हैं। बच्चे शब्दार्थ नहीं जानते, फिर भी संदर्भ से अर्थ समझ जाते हैं। बच्चों का इंटरप्रिटेशन और बढ़ जाता है, जब कहानी पढ़ने या कविता बोलने के साथ-साथ संपूर्ण शारीरिक अनुक्रिया (Total Physical Response) होता है। जैसे ‘सीट डाउन’ बोलकर बैठते हैं और ‘स्टैंड अप’ बोलकर उठते हैं। ‘क्लैप योर हैंड’ कह कर ताली बजाते हैं। ‘स्नैप योर फिंगर्स’ कहकर चुटकियां बजाते हैं। बच्चे बिना शब्दार्थ बताए समझ जाते हैं कि ‘सीट’, ‘स्टैंड’, ‘क्लैप: और ‘स्नैप’ का मतलब क्या हुआ। शिक्षक को चाहिए कि ऐसी गतिविधियां सीखने-सिखाने हेतु करें ताकि वे यह जानने को आतुर हो जाएं कि आखिर पुस्तक में क्या है। बच्चे सहज ढंग से पुस्तकों का चयन करें, इसके लिए टेबल पर पुस्तकों को फैलाकर रखा जाता है या वर्ग-कक्ष में दीवारों के साथ रस्सी में लटका कर किताबों को रखा जाता है ताकि बच्चे अपने रुचि की पुस्तक चुन सकें। तभी तो बच्चा ‘अब्बू खाँ की बकरी’ को देखेगा तो चुनेगा। ‘अब्बू खाँ की बकरी’ डॉ. जाकिर हुसैन द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कहानी है। यह अल्मोड़ा के एक बूढ़े आदमी 'अब्बू खाँ' और उनकी प्यारी सफेद बकरी 'चाँदनी' की कहानी है। यह कहानी बच्चों के लिए दिलचस्प है।
मुझे याद आ रहा है 2004 में मैंने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, शेखपुरा, पटना में एक पुस्तकालय कार्यशाला में स्पीड के तरफ से भाग लिया। चार दिन की कार्यशाला में बच्चों की पुस्तकों पर विस्तृत चर्चा हुई। विद्यालयों में भेजने के लिए पुस्तकों का चयन करना था। बहुत सारे प्रकाशक आए थे: एकलव्य, एनबीटी, गीता प्रेस आदि। लखनऊ से दो पुस्तकालय विशेषज्ञ भी आए थे, जिन्होंने बाल पुस्तकालय की अवधारणा के बारे में हम लोगों को प्रशिक्षित किया। उसमें शिक्षाविद एवं भाषाविद् शैलेश्वर प्रसाद सती, समाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश एवं शिक्षा मंत्री रामचंद्रपुर पूर्वे तथा विभाग के तरफ से स्पीड के कार्यकारी कार्यक्रम पदाधिकारी झा सर एवं राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी सिंह साहब मौजुद थे। यूनिसेफ के लोग भी थे। ज्ञान से समृद्ध करने वाला एक सेमिनार हुआ। उस कार्यशाला में हम लोगों को टास्क दिया गया कि आप लोग बच्चों की पुस्तकों को अध्ययन कर चयन करें। दिन भर कार्यशाला के बाद शाम में तीन-चार पुस्तकों को लेते और उन पुस्तकों को उलट-पुलट कर, पढ़कर देखते। किताबों का आवरण पृष्ठ कैसा है? उसकी छपाई स्पष्ट है या नहीं। सचित्र है कि नहीं। छोटे बच्चों की किताबों में चित्रों का होना सबसे जरूरी है क्योंकि बच्चे शब्दों से पहले तस्वीरों से सीखते हैं। उसका साइज क्या है? उसकी भाषा बच्चों को समझ में आएगी या नहीं। अक्षर मोटे हैं या छोटे हैं। बच्चों की किताबों का फॉन्ट यानी अक्षरों का आकार बड़ा और साफ होना चाहिए। उसकी भाषा कलिष्ठ है या सरल है? भाषा स्तरीय है या नहीं? उसकी अवधारणा ठोस संदर्भ (Concrete Reference) पर आधारित है या एब्स्ट्रेक्ट (Abstract Reference) पर? शुरुआती पाठकों के लिए वाक्यों में कम शब्द और लयबद्ध (rhyming) भाषा होनी चाहिए। किताबें सीधे तौर पर ज्ञान या उपदेश देने वाली नहीं होनी चाहिए, बल्कि मनोरंजक और कल्पनाशीलता को बढ़ाने वाली होनी चाहिए। छोटे बच्चों के लिए गत्ते (board books) या ऐसी मजबूत किताबें होनी चाहिए जिन्हें वे आसानी से उलट-पलट सकें और जो फटे नहीं। पुस्तकों में प्रेमचंद का ‘ईदगाह’ मीर नजावत अली का ‘विज्ञान के उपहार’ निलेश कुमार का ‘ऐसे बनता है बादल ऐसे बरसता है पानी’ रवींद्रनाथ टैगोर का ‘काबुलीवाला’ किलकारी से प्रकाशित ‘बच्चों की दुनिया’ निशांत जैन की पुस्तक ‘शादी बंदर मामा की’ राजेश गुप्ता का ‘तेनालीराम की कथाएं’ राज आर्यन का ‘रसगुल्ला का पेड़’ दीपक कुमार कलिता का ‘प्यारा दोस्त: योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण का ‘धैर्य की जीत’,गिजुभाई बधेका की ‘चबर चबर’,मलयश्री हाश्मी की ’हाथ मिलाओ’,आदि बालोपयोगी हैं। कुछ किताबें ऐसी हैं जिसमें कहानी हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में हैं।‘मक्खीचूस (The Miserly Father), गधे ने ओढ़ी बाघ की खाल (The Donkey in a Tiger Skin), पेड़ क्या है (What is a tree); ये सभी दो ही तीन पृष्ठ में हैं लेकिन पिक्टोरियल है और जबरदस्त है।
मुझे याद आ रहा है कि मैंने गीता प्रेस की एक पुस्तक को बच्चों के लायक नहीं समझा क्योंकि उसमें ऐसी बातें लिखी थीं जो बड़े लोगों के लिए थीं। बच्चों के लिए वह पुस्तक अर्थपूर्ण नहीं थी। उसमें लिखा था ‘गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं।’ भला बच्चों को पाप-पुण्य से क्या मतलब? यह आस्था का विषय है जो एक्सट्रैक्ट है और बच्चों के समझ से परे है। ऐसी धारणा कि ‘गंगा में स्नान से पाप धुल जाते हैं’, बच्चे इससे क्या समझेंगे। हां, यह समझ सकते हैं कि गंगा में स्नान करने से शरीर साफ हो जाता है। गाइडलाइन में भी ऐसी पुस्तकों को चुनने से मना किया गया था जिसे बच्चों के सामने लाना उचित नहीं हो। हां, बड़ा होकर ऐसी बातों को भी समझेंगे। उसकी ‘भावना’ अच्छी है। उसमें ‘भूत-प्रेत’ का वास है। ऐसे शब्दों को शायद बच्चों को समझाना भी मुश्किल है हालांकि शैलेश्वर प्रसाद सती कहते हैं कि हर तरह की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए लेकिन शिक्षकों के मार्गदर्शन में, जहां न समझ में आए तो वहां शिक्षकों को चाहिए कि उसे बच्चों की ही भाषा में या स्थानीय भाषा में उसी के अंदाज में समझा दें। कुछ नामचीन लेखकों की पुस्तकें बच्चों को बहुत ही आनंद देती हैं। बच्चों को समझदार बनाती हैं, रचनाशील बनाती हैं, मुखर करती हैं। ये भाषा कौशल को विकसित करती है, दिन-दुनिया एवं प्रकृति से रूबरू कराती हैं। बच्चों के ज्ञान का मान रखती हैं। ये बच्चों में स्वयं सीखने की ललक पैदा करती है। ऐसी पुस्तकें बच्चों को सृजनवाद की तरफ जाने में सहज मार्ग प्रदान करती हैं। वाकई ऐसी पुस्तकें बच्चों में कौतूहल पैदा करती हैं और वही कौतूहल, मौलिक रचना की तरफ ले जाती है जो बच्चों की खुद की होती है; नहीं कि उधार की। सृजनवाद के अनुसार यही सब तो हमें करना है। बच्चों की पुस्तक ऐसी होनी चाहिए जो उन्हें आकर्षित करे, रोचक हो और उनकी उम्र के अनुकूल हो। शिक्षक ऐसा वातावरण का निर्माण करें कि बच्चे को स्वयं सीखने में आसानी हो। वे अपने अनुभव को प्रदर्शित करें और इस तरह उनमें अभिव्यक्ति की क्षमता का भी विकास हो। बच्चे यदि पुस्तकालय एवं विद्यालय में एक दूसरे से चर्चा करते नज़र आए या प्रश्न पूछे तो समझ लें कि उनमें सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी है। यदि सीखी गई बातों को स्पष्टता के साथ प्रदर्शित करें या अवधारणा के अनुरूप कुछ करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि उन्होंने जो भी अध्ययन किया, उसे समझ में आ गया है। यदि कोई बच्चा यह पढ़े कि पानी को बचाना चाहिए। यह बहुमूल्य चीज है लेकिन रास्ता चलते यदि वह नल खुला देखता है और आगे बढ़ जाता है तो समझिए कि उसने नहीं सीखा; लेकिन यदि वही बच्चा खुले नल को बंद कर देता है कि पानी बेकार में वह रहा है तो समझिए कि वह सीख गया है। किसी ऋषि मुनि ने अपने शिष्यों को कहा कि ‘सदा सच बोलो’, झूठ मत बोलो’। इस सबक को अच्छी तरह से स्मरण करके आना। कल होकर सभी शिष्यों ने कहा कि गुरु जी मुझे यह स्मरण हो गया है कि सदा सच बोलना चाहिए और झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसमें एक बच्चा ने कहा कि गुरु जी मुझे यह सबक अभी तक स्मरण नहीं हुआ है। करीब 10 दिन लग गए, तब उसने गुरु जी को बताया कि मुझे यह स्मरण हो गया है कि सदा सच बोलना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए। दरअसल, वह बच्चा सच बोलना दसवां दिन सीखा। उसके पहले वह झूठ से नहीं बच पा रहा था। अब वह निश्चय कर लिया है कि वह झूठ नहीं बोलूंगा, चाहे जो भी हो जाए। सीखना वही है जिसे कोई अपने जीवन में आत्मसात कर ले। शिक्षा का मतलब भी यही है कि इंसान जो कुछ भी सीखे उसका सही स्थान एवं सही समय पर उपयोग करे। शिक्षा से व्यवहार परिवर्तन लाजमी है।
– मो. ज़ाहिद हुसैन
प्रधानाध्यापक
उत्क्रमित मध्य विद्यालय मलह
विगहा,चंडी,नालंदा
1 Likes