सत्य और अहिंसा हमारे भारतीय सनातन परम्परा की पुरातन अवधारणा है। वेद कहता है – एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।(सत्य या सत्ता एक है, लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।) ईश्वर को सत्यं शिवं सुन्दरम् कहा गया है। ईश्वर ही सत्य हैं, ईश्वर ही शिव यानि कल्याणकारी हैं और ईश्वर का स्वरूप ही सुन्दर है। ईश्वर का सनातन अंश हमारी आत्मा है, जिसमें सत्य, शिव और सुन्दर का समावेश है।- ईस्वर अंस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ।।(श्रीरामचरितमानस)
हमारा सबसे पुराना ग्रंथ वेद हमें सत्य पर चलने की प्रेरणा देता है। धर्म का पालन करने की प्रेरणा देता है। धर्म के अन्तर्गत अहिंसा आदि सारे सद्गुण आ जाते हैं।- सत्यं वद । धर्मं चर । (सत्य बोलो। धर्म का पालन करो ।) भारतीय मनीषियों ने सत्य की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी है, “सत्य वही है, जिससे सबका कल्याण हो।”
सुभाषित है – सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: । सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।। (सत्य से ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य के प्रताप से ही सूर्य तपता है। सत्य से ही वायु बहती है, सबकुछ सत्य में ही प्रतिष्ठित है।)
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्रते ।। (महाभारत, उद्योगपर्व) अर्थात् सत्य से धर्म की, योग यानि निरन्तर अभ्यास से विद्या की, साफ-सफाई से रूप की तथा सदाचार से कुल की रक्षा होती है।
सत्य के अन्तर्गत सत्य बोलना, सत्य पर चलना, कर्त्तव्यपरायणता, ईमानदारी, परोपकार, सदाचार आदि आते हैं। सत्य पर चलने से बाहरी कष्ट अवश्य होता है, किन्तु मन शांत और प्रफुल्लित रहता है। सत्य से ही धर्म की रक्षा होती है और सत्यनिष्ठापूर्वक उद्योग व परिश्रम करने से ही शाश्वत प्रगति होती है।
अहिंसा की अवधारणा वेद से ही आयी है। महाभारत में कई जगह अहिंसा परमो धर्म: (अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है) आया है ।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तप: ।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्म: प्रवर्तते ।। (अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है, अहिंसा ही सबसे बड़ा तप और परम सत्य है, जिससे धर्म की प्रवृत्ति होती है।)- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११५, श्लोक २३
सत्य पर चलने से ही अहिंसात्मक प्रवृत्ति और संस्कार का विकास होता है। अहिंसा है क्या? हिंसा न करना । दूसरों के प्रति राग-द्वेष न रखना ।
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकाराय पुण्याय च पापाय परपीडनम्।।(परोपकार ही पुण्य है और परपीड़ा ही पाप है ।)
जैसा कि श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है – परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीडा सम नहिं अधमाई।।
हमारा व्यक्तित्व भी इसी प्रकार का होना चाहिए, जैसे किसी देवालय या संतों के निकट जाते ही उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण हमारी पवित्रता बढ़ने लगती है। हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होने लगता है। मन शांत और प्रफुल्ल होने लगता है। षड्विकार और हिंसात्मक प्रवृत्ति का नाश होने लगता है। दूसरों के कल्याण की भावना जागृत होने लगती है। यह सबकुछ सत्य, ईश्वर-उपासना और सदाचार व साधना से ही होता है।
सनातन परंपरा के दो शब्द सत्य और अहिंसा को महात्मा बुद्ध ने आत्मसात् कर उसका कार्यान्वयन और प्रचार-प्रसार किया, जिससे लोगों का कल्याण हुआ और हो रहा है।
कालान्तर में, महात्मा गांधी ने भी सत्य और अहिंसा को अपनाया। महात्मा गांधी में धैर्य और सहिष्णुता थी । उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपनाया और उनका प्रचार-प्रसार किया। जिससे लोगों के जीवन में शांति और कल्याण का प्रसार हुआ और जहां कहीं भी गांधीवाद है, वहां सत्य और अहिंसा के कारण ही शांति और कल्याण का वातावरण बना हुआ है । उन्होंने मुण्डकोपनिषद के सत्यमेव जयते नानृतम्(सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं) और महाभारत के अहिंसा परमो धर्म: को आत्मसात् किया, फिर लोगों में फैलाया । गांधीजी में सद्गुण था कि वे अपनी भूल को स्वीकार कर सुधार भी कर लेते थे । गांधीवाद के रास्ते पर चलकर कई नेता महान बन गये हैं। मुण्डकोपनिषद के वाक्य सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय वाक्य बनाया गया । गांधीजी ने आत्मकथा My Experiment with Truth(सत्य के साथ मेरा प्रयोग) में बहुत कुछ उल्लेख किया है, आदि ।
-गिरीन्द्र मोहन झा
विद्यालय अध्यापक, +२ भागीरथ उ० वि०, चैनपुर-पड़री, सहरसा