दुर्लभ-जल- श्री विमल कुमार"विनोद" - गद्य गुँजन

दुर्लभ-जल- श्री विमल कुमार”विनोद”

Bimal Kumar

ओपनिंग दृश्य-बहुत सारी महिलायें माथे पर घड़ा लेकर पानी लाने गाँव के बाहर पानी लाने जा रही है,लेकिन कुआँ के सूख जाने के चलते महिलाओं को पानी नहीं मिल पा रही है।
झमियां-(चिंतित मुद्रा में) अरी बहन झालो देखते हैं कि कुआँ में पानी सूखते जा रहा है,पीने का पानी नहीं मिल पा रही है।
झालो-हाँ बहन,तुम ठीक ही बोल रही हो,कुआँ सूख रही है तथा तालाब भी खेल का मैदान बनती जा रही है।
पारो-बहन सबसे दुःख की बात है कि पानी की स्थिति दयनीय होती जा रही है।आदमी के साथ-साथ जानवरों को भी पीने को पानी नहीं मिल पा रही है,आगे क्या होगा,यह समझ में नहीं आ रही है।
चरवाहा लोग-(आसमान की ओर देखकर)हे इन्द्र देवता जरा बरसो न,पानी के लिये हम सभी गाय-बैल,भैंस तथा अन्य जीव जंतु पानी के बिना प्यासे हैं,जिसके चलते जीना दुर्लभ हो रहा है।पानी,पानी,पानी दो भगवान,बचा लो भगवान।आह!आह!देखो भगवान संपूर्ण पृथ्वी में पानी के बिना जीना मुश्किल हो गया।
राजेश-(घमंड के साथ,अपने मुंशी से)जाओ बोतल वाला पानी ले आओ,नदी सूखा तो क्या हुआ
हम अमीर लोग पानी खरीद कर पी लेगे।
चरवाहा-(परेशानी की मुद्रा में) पानी,पानी सारे जानवर पानी के बिना मर रहे हैं।पानी के लिये त्राहिमाम मचा हुआ है।(नदियाँ सुख रही है,तबाही मची हुई है) बचाओ,सभी जीवों को बचाओ।नदी,कुआँ,तालाब को बचाओ, बचाओ,बचाओ।(पर्दा
गिरता है)।

“प्रथम अंक,प्रथम दृश्य”

गाँव का दृश्य-समय-चार बजे सुबह।(कुछ महिलायें,घड़ा लेकर पानी लाने गयी है)
झमियां-(दुःखी मन से)अरी बहन झालो देखो न,चापाकल से पानी नहीं निकल रही है,लगता है कि सुख गया है,बहुत परेशानी सी
महसूस हो रही है।
झालो-तुमने सही ही कहा,भू-जल का स्तर धीरे-धीरे नीचे की ओर तेजी से जा रहा है।अधिकांश चापाकल तथा बोरिंग सूखते जा रहे हैं।पानी के लिये त्राहिमाम मची हुई है।
झमियां-(चिंतित मुद्रा में)तब बहन इस संसार का क्या होगा?पानी के बिना तो तबाही मची हुई है,लगता है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिये ही होने वाला है।
झालो-और तो और बहन जानवरों को भी पानी नहीं मिल पा रही है,लगता है कि गाय-बैल,
भैंस,बकरी तथा अन्य जानवर भी
तालाब के पास जाकर बिना पानी पीये ही लौट जाते हैं,लगता है मनुष्य के साथ-साथ पशुधन का भी विनाश निकट भविष्य में होने जा रहा है।
झमियां-(आश्चर्य पूर्वक)तब क्या होगा बहन पानी के लिये तो तबाही ही फैली हुई है।लगता है कि आदमी के साथ-साथ जानवर
भी मर जायेगा।
झालो-(बीच में बात काटते हुये) ठीक ही कहती हो दीदी,पानी की तबाही के चलते विश्व की भी बर्बाद हो जायेगी।
पहला किसान-(चिंतित मुद्रा में) अब क्या होगा,पानी की कमी के कारण फसल भी नहीं हो पायेगी।
दूसरा किसान-फिर क्या होगा।
पहला किसान-(चिंतित मुद्रा में) नदी के जल से पानी लाकर फसल उपजा लेंगे।
पहला किसान-लगता है तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।जब नदी में पानी ही नहीं है तो फिर क्या होगा?
दूसरा किसान-जैसी करनी,वैसी भरनी,नदियों से बालू उठाते रहो,
खूब रूपया कमाते रहो,पानी का दुःख-दर्द झेलते रहो और अंत में
पानी के बिना मरते रहो।
(पर्दा गिरता है।)

” द्वितीय-दृश्य”

नदी के तट का दृश्य-(खेतों में लगी गेहूँ की फसल मर रही है)
किसान-(माथा में हाथ रख कर) अरे बाप-रे-बाप,लगता है कि लोग
पागल तो नहीं हो गया है,नदी में तो बालू ही नहीं रहेगा तो फिर नदी में पानी कहाँ से आयेगी।
अरे फसल भी मरता जा रहा है
और लोग नदी से बालू निकालते ही जा रहा है।(नदी से प्रार्थना करते हुये)अरे भाई नदी तुम्हीं तो कुछ उपाय बताओ।
नदी-(रोते हुये)क्या करूँ किसान लोग,मैं तो एक निर्जीव चीज हूँ, जिसको जितनी इच्छा होती है,
उसने उतना बालू उठाकर मेरा अस्तित्व ही नष्ट कर दिया है।मैं

अवैध बालू का उठाव करने वालों से परेशान हूँ,जो किमुझे भी समझ में नहीं आ रही है जो कि लगातार मेरा अधिक-से-अधिक गड्डा करके बालू उठाता जा रहा है।मेरा क्या कसूर मैं तो चुपचाप अपने साथ- साथ लोगों के बदनसीबी को देखकर रो रहा हूँ।मेरे वक्ष स्थल पर विराजमान बालू भी धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जा रही है।
कुछ जानवर-(नदी से)अरे भाई नदी,हम सभी तो तुम्हारे पानी को
पीकर अपनी प्यास बुझाते थे,अब तो तुम सूख गई हो,बालू भी खत्म होता जा रहा है,नदी में बालू के जगह पर मिट्टी के गाद जमते जा रहे हैं,घास उग आये हैं,अब क्या होगा।पानी दो नदी दीदी,पानी दो।
नदी-मेरा क्या होगा,अब मानव जाति के विनाश की तांडव लीला प्रारंभ होने जा रही है।इसके साथ और भी जितने जीव जंतु हैं सारे के सारे मनुष्यों के हित के लिये हैं।(दुःख से ठहाका मारते हुये)
हा,हा,हा,अरे मूर्ख मानव अब भी तो संभलो,तुम्हारे जीवन का सुखमय दिन तबाही के गाल में फँसा हुआ है।तुम यदि नहीं सुधरा तो तुम्हारा विनाश अवश्यमभावी
है,अब भी तो हमारी जैसी नदियों की तबाही पर अफसोस करो, क्योंकि मैं तुम्हारे लिये ही हूँ।
कुछ महिलाएं-(घड़ा लेकर नदी में बालू को हटाती हुई)अरे बहिन पहले थो बालू हटाने से पानी निकलता था,अब क्या हो गया, पानी ही समाप्त हो गया,क्या होगा नदी बहन,हमलोग क्या पीयेंगे ,पानी,पानी मेरी जीवन दायिनी पानी।
जानवर-नदी दीदी पानी दो, हमलोग पानी के बिना नहीं जी
पायेंगे,पानी दो दीदी,पानी दो,बचा लो दीदी बचा लो।

“द्वितीय अंक प्रथम दृश्य”

नदी का दृश्य-(बालू का ठीकादार,
तथा उसके गुर्गे नदी के पर उपस्थित हैं)
ठीकादार -(अपने गुर्गे से)
मेरे गुर्गों आप जितनी चाहें बालू उठा सकते हैं,जिला या सरकार के पास जो कुछ भी होगा हम देख लेंगे,हमें तो बस रूपया चाहिये। बालू तो फिर आ ही जायेगा,आगे ठीकादार साहब आपको हम सब घाट टेंडर दे देंगे।
(इसी बीच कुछ ग्रामीण का प्रवेश)
ग्रामीण-( ठीकादार अपने गुर्गे से)अब तो बालू खनन बंद कर दीजिये सर,हमलोगों का डांड़ सूख गया,फसल मरने लगा,
पशुओं को पानी नहीं मिल पा रही है,अब तो बालू उठाना बंद करवाइये।
ठीकादार-(चिल्लाते हुये)नहीं,बालू उठने से कोई रोक नहीं सकता है, हमने सरकार को रूपया दिया है, बालू उठता ही रहेगा,इसे कोई बंद नहीं करवा सकता है।(ग्रामीण लोग विरोध करने लगते हैं,तभी ठीकादार के लोग ग्रामीणों को मारपीट कर उसे नदी से भगा देते हैं)
नदी-अब तो मेरे बालू को उठाना बंद करो,यदि तुमलोग इस प्रकार से मेरे बालू को उठाते जाओगे तो लोगों को पानी नहीं मिल पायेगी, पशुधन मर जायेंगे,फसल मरकर नष्ट हो जायेंगे।इसलिये मुझ पर कुछ तो रहम करो,बचाओ, बचाओ,अब तो मुझे बचाओ,मेरे
अस्तित्व को मिटने से तो बचा लो।
ठीकादार-(नदी को डाँटते हुये) चुप रहो,चिल्लाओ नहीं तुम सूख भी गई तो कोई अंतर नहीं पड़ता है।हम तो रूपया वाला हैं,मेरे पास धन,संपत्ति की कमी नहीं है,हम तो बोतल और जार वाला पानी पी कर जी लेंगे।
जानवर-ठीकादार साहब जरा मेरे उपर भी तो रहम कीजिये,हम नहीं रहेंगे तो आपका हल कंन जोतेगा,गाय नहीं रहेगी तो दूध कहाँ से मिलेगी।
ठीकादार-(बीच में ही बात काटते हुये)छोड़ो,छोड़ो इन सभी ढकोसला पूर्ण बातों को,मैं ट्रैक्टर से खेत जोतवा लूँगा साथ ही पैकेट वाला सूखा दूध से काम चला लेंगे,लेकिन नदी से अवैध बालू का उठाव जारी रहेगा।तुम्हें पीने को जल मिले या न मिले इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है।

“दृश्य-परिवर्तन”

जंगल का दृश्य-(जंगलों की कटाई जारी है,जंगली जीव-जंतुओं में
त्राहिमाम)
हाथी-अरे मूर्ख मानव मेरे निवास स्थल को क्यों काट रहे हो,जंगलों को नष्ट मत करो।
शेर-(गरजते हुये)मेरे घरों को क्यों उजाड़ रहे हो,(दहाड़ता है,इतने में
लकड़ी काटने वाले के गुर्गे कः द्वारा बंदूक की गोली से शेर को मारकर ढेर कर दिया जाता है)
आह!आह!मुझे मत मारो,मैं तो तुम्हारे जंगल का रक्षक हूँ।
लकड़ी काटने वाला-(धोंस जमाते हुये)बेबकूफ शेर चिल्लाओ नहीं, ज्यादा ताकत दिखाओगे तो मेरी गोली एक-एक जानवर के सीने को छलनी कर देगी।
वृक्ष-रे मूर्ख दुष्ट मानव मुझे मत काटो,मुझे छोड़ दो,नहीं तो तुम्हारी दुर्गति हो जायेगी।सारे के सारे लोग पानी के लिये तरस कर रह जाओगे।
लकड़ी काटने वाला-वह कैसे?
वृक्ष-मैं हूँ तो जल है,मैं हूँ तो छाया है,जलवाष्प है,सुन्दर-सुन्दर फल-फूल है।मैं ही वह चीज हूँ जो कि बादल को न पृथ्वी की ओर आकर्षित करता हूँ।साथ ही मैं ही हूँ जो कि भू-जल को अपनी ओर खींचता हूँ।मेरे बिना जल का मिलना असंभव है।इसलिये वनों को मत उजाड़ो नहीं तो तेरा विनाश नजदीक है।
(पर्दा गिरता है)
“द्वितीय दृश्य” —————————————
गाँव का दृश्य-(लोग लगातार कंक्रीट का जंगल बनाते जा रहे हैं)
धरती माता-अरे भाई साहब थोड़ी सी जमीन तो बिना पक्कीकरणके छोड़ दो।
घर वाला-क्यों कीचड़ जमने के लिये छोड़ दूँ।(सिर हिलाते हुये) नहीं यह कदापि संभव नहीं है।मैं पूरी की पूरी जमीन में कंक्रीट का जंगल बनाकर ही दम लूँगा।मैं अपने घर का एक ईंच जमीन भी
मिट्टी का नहीं छोड़ूगा।
धरती माता-अरे भाई कुछ तो घर में जमीन मिट्टी का छोड़ो ताकि बरसात का पानी तुम्हारे घर के जमीन के अंदर जा सके।
घर वाला-बेकार की बातों को मत समझाओ धरती माता,सरकार ने रूपया दिया पक्का का मकान बनाने के लिये,इसलिये बना रहा हूँ।
धरती माता- कम-से-थोड़ी सी जमीन पर तो पनसोखा बना लो भाई साहब नहीं तो जिन्दगी में पानी के लिये तरस जाओगे।इसलिये यदि जल चाहिये तो जल को बचाने का प्रयास कीजिये।
घर वाला-चाहे दुनियां में जो कुछ भी हो जाय मैं अपने घर के संपूर्ण भाग को कंक्रीट का जंगल बनाकर ही दम लूँगा।

“तृतीय अंक-प्रथम दृश्य”

गाँव के चौपाल का दृश्य-(नल का पानी बह रहा है)।
एक शिक्षक-(लोगों से)भाई साहब
आप लोग पानी पीने के बाद नल की टोटी को बंद कर देंगे।
महेश-(बात काटते हुये)क्यों,क्या
हुआ?
शिक्षक-बेकार का जल को बर्बाद नहीं करना चाहिये।
सुरेश-काहे मास्टर साहब,जल की कमी थोड़े ही है।संसार में तो 74 से 77% जल है,फिर आप कह रहे हैं कि जल की कमी है।
शिक्षक-भाई साहब जल को बर्बाद मत कीजिये,क्योंकि जल है तो कल है,जल नहीं तो कल नहीं।
हम बूँद-बूँद करके जल को बचाकर इस धरती को बचायेंगे।जल को बचाकर हमें धरती माता
नहीं बल्कि अपने आने वाली पीढ़ी का कल्याण करने की बात
सोचनी चाहिये।इसलिये जल का दुरूपयोग करने से बचिये।
(पटाक्षेप)

“अंतिम दृश्य”

गाँव का दृश्य-(चारों ओर पानी की तबाही,पानी के नल पर एक किलोमीटर तक लंबी लाइन लगी हुई है,लोग अपनी बारी के इंतजार में तीन बजे सुबह से ही बाल्टी, घड़ा लेकर खड़े हैं।)
झमियां-(दूसरे का बाल्टी हटाते हुये)पहले मैं आयी हूँ,मुझे सबसे पहले पानी लेना है।इसके बाद कोई दूसरा लेना।
रामू- नहीं पहले हम पानी भरेंगे, मेरे घर में पीने का पानी जरा सी भी नहीं है,हमको पानी लेने दीजिये।(इसी बीच कुछ जानवर जो कि कई दिनों से प्यासी थी पानी भरे बाल्टी की लंबी कतार को देखकर उस ओर दौड़ी आती है तथा उन लोगों के बाल्टी के पानी को पी जाती है।फिर जानवर सब आपस में लड़ने लगते हैं तथा मिट्टी के घड़ा को
तोड़ देता है।लोगों को पानी नहीं मिल पाती है)(नेपथ्य से एक आवाज सी आती है”जैसी करनी वैसी भरनी वाली बात है।”जल बचाओ तो जीवन बचेगा,जल बिना जीवन दुर्लभ है”।इसलिये इस दुर्लभ जल को बचाने का प्रयास करें,तभी पृथ्वी से जल संकट दूर हो पायेगा।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार”विनोद” प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा,बांका(बिहार)

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