गद्य गुँजन आलेख अतीत की भूल भविष्य की चुनौती : धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

अतीत की भूल भविष्य की चुनौती : धर्मेंद्र कुमार ठाकुर



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अतीत की भूलें और भविष्य की चुनौती: क्या हम अगली महामारी के लिए तैयार हैं?

विश्व महामारी दिवस हमें मानव इतिहास के उन काले अध्यायों की याद दिलाता है, जब अदृश्य रोगाणुओं ने पूरी दुनिया को अपने घुटनों पर ला दिया था। आदिम काल से लेकर आधुनिक युग तक, महामारियों ने न केवल करोड़ों जिंदगियां ली हैं, बल्कि सभ्यताओं को नष्ट किया है और भूगोल को बदलकर रख दिया है। यह एक ऐसा इतिहास है जहाँ इंसानी बेबसी और प्रकृति के प्रकोप का सबसे भयावह रूप देखने को मिलता है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो प्लेग ऑफ जस्टिनियन और ब्लैक डेथ जैसी महामारियों ने चौदहवीं शताब्दी में यूरोप और एशिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी को साफ कर दिया था। उस दौर में लाशों को दफनाने तक की जगह नहीं बची थी और हंसते-खेलते शहर रातों-रात श्मशान में बदल गए थे। इसके बाद, बीसवीं सदी की शुरुआत में आए स्पैनिश फ्लू ने विनाश का ऐसा तांडव मचाया कि प्रथम विश्व युद्ध से भी ज्यादा मौतें अकेले इस वायरस की वजह से हुईं। दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं बचा था, जहाँ मातम न पसरा हो।
भारत के संदर्भ में, विशेषकर 1950 और 1960 के दशक की स्थिति को याद कर आज भी रूह कांप उठती है। वह एक ऐसा दौर था जब चेचक (स्मॉलपॉक्स), हैजा और प्लेग जैसी महामारियों का कहर इस कदर हावी था कि पूरे के पूरे गांव के गांव जमींदोज हो जाते थे। उस समय चिकित्सा सुविधाएं आज जैसी आधुनिक नहीं थीं। गांवों में जब कोई महामारी फैलती, तो एक ही ढर्रे पर पूरा परिवार और देखते ही देखते पूरा मोहल्ला इसकी चपेट में आ जाता था। स्थिति इतनी विकराल होती थी कि बीमारों की तीमारदारी करने वाला या शवों को कंधा देने वाला भी कोई जीवित नहीं बचता था। लोग अपनों को तड़पता छोड़कर गांवों से पलायन करने को मजबूर हो जाते थे। सुदूर ग्रामीण इलाकों में महामारियों का यह रूप किसी प्रलय से कम नहीं था।
समय बदला, विज्ञान ने तरक्की की, और हमने कई महामारियों पर विजय पाई। चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों को जड़ से खत्म करने में सफलता मिली। लेकिन, जैसे ही इंसानों को लगा कि उन्होंने प्रकृति पर फतह हासिल कर ली है, इक्कीसवीं सदी में कोरोना वायरस (कोविड-19) ने दस्तक दे दी। इस आधुनिक महामारी ने साबित कर दिया कि आज भी इंसान कितना बेबस है। पूरी दुनिया महीनों के लिए घरों में कैद हो गई, वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त हो गईं और स्वास्थ्य प्रणालियाँ चरमरा गईं। विकसित से विकसित देशों ने भी इस अदृश्य शत्रु के सामने घुटने टेक दिए।
शुरुआती दौर के ब्लैक डेथ से लेकर आधुनिक काल के कोविड-19 तक, महामारियों के जितने भी मामले और दौर सामने आए हैं, वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि सुरक्षा और सतर्कता में जरा सी चूक मानवता को विनाश के कगार पर धकेल सकती है। विश्व महामारी दिवस का यह विशेष अवसर हमें आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, प्रकृति का सम्मान करने और भविष्य के किसी भी संभावित संकट के लिए एकजुट होकर तैयार रहने की चेतावनी देता है।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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