“सुरों से संस्कार तक : नई शिक्षा नीति 2020 के आलोक में विद्यालय की सांगीतिक चेतना की यात्रा”
“सा विद्या या विमुक्तये” — सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को मुक्त करे। नई शिक्षा नीति 2020 भी इसी भावना को आत्मसात करती है। यह नीति केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के समग्र विकास, रचनात्मकता, सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और जीवन कौशलों के विकास पर विशेष बल देती है। इस दृष्टि से संगीत शिक्षा का महत्व पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गया है।
नई शिक्षा नीति 2020 का एक महत्वपूर्ण विचार यह है कि कला, संगीत, साहित्य, नाटक, खेल और अन्य सृजनात्मक गतिविधियाँ शिक्षा की मुख्यधारा का हिस्सा हों। नीति मानती है कि प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और उचित दिशा देने की होती है। संगीत इसी दिशा में एक प्रभावशाली माध्यम है।
संगीत : केवल विषय नहीं, संस्कारों का माध्यम:
“शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण तथा समग्र व्यक्तित्व का विकास भी है।”
मैं एक संगीत शिक्षक के रूप में सबसे पहले बच्चों के मन में संगीत के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आत्मीयता का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करता हूँ। मैं उन्हें बताता हूँ कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह ईश्वरीय अनुभूति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का माध्यम है। संगीत हमारी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता का द्योतक है।
भारतीय संगीत की मूल परंपरा गुरुमुखी रही है। इसलिए विद्यार्थियों को यह समझाना आवश्यक होता है कि संगीत केवल पुस्तकों से नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए गुरु का सान्निध्य, निरंतर अभ्यास और समर्पण आवश्यक है। इसी संदर्भ में कबीर का प्रसिद्ध वचन स्मरणीय है— “गुरु बिन होत न ज्ञान।”
जब बच्चे इस भावना को समझने लगते हैं, तब उनके भीतर संगीत के प्रति गंभीरता और सम्मान का भाव स्वतः विकसित होने लगता है।
साहित्य और संगीत का सुंदर समन्वय
नई शिक्षा नीति कला-समेकित शिक्षा (Arts Integrated Learning) पर विशेष बल देती है। इसी भावना के अनुरूप मैं संगीत को साहित्य से जोड़ने का प्रयास करता हूँ। विद्यालय में कविताओं को गाकर सुनाया जाता है, कहानियों को नाटकीय शैली में प्रस्तुत किया जाता है तथा विभिन्न पात्रों की आवाज़ों के माध्यम से उन्हें जीवंत बनाया जाता है।
इस प्रकार बच्चे केवल पाठ को पढ़ते नहीं, बल्कि उसे अनुभव भी करते हैं। उनकी भाषा, उच्चारण, कल्पनाशक्ति और अभिव्यक्ति क्षमता का विकास होता है। संगीत और साहित्य का यह समन्वय शिक्षण को रोचक, प्रभावी और आनंदमय बना देता है।
विद्यालय की शुरुआत सांगीतिक चेतना से
पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर कहते हैं कि “संगीत मनुष्य को ईश्वर के समीप ले जाने वाला सर्वोत्तम साधन है।”
हमारे विद्यालय की दैनिक गतिविधियों की शुरुआत सांगीतिक चेतना सत्र से होती है। यह केवल प्रार्थना सभा नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास का एक सशक्त मंच है। इस सत्र में अधिकाधिक बच्चों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। सभी बच्चों की कार्यानुसार सूची तैयार रहती है। कोई हारमोनियम वादन करता है, कोई ड्रम बजाता है, कोई झाल बजाता है, कोई सुविचार प्रस्तुत करता है, कोई सामान्य ज्ञान के प्रश्न पूछता है, तो कोई महत्वपूर्ण तथ्यों का वाचन करता है।
इस सामूहिक सहभागिता से बच्चों में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन और सहयोग की भावना विकसित होती है। धीरे-धीरे वे मंच से भयमुक्त होकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगते हैं।
संगीत कक्षा : रुचि और साधना का केंद्र
विद्यालय में संगीत का विशेष कक्ष उन विद्यार्थियों के लिए संचालित किया जाता है जिनके भीतर संगीत सीखने की वास्तविक जिज्ञासा और लगन होती है।
इन विद्यार्थियों को नियमित रूप से— स्वराभ्यास, अलंकार अभ्यास, थाट परिचय, रागों का प्रारंभिक अध्ययन, बंदिशों का अभ्यास, ताल और लय का प्रशिक्षण दिया जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधारभूत सिद्धांत सिखाए जाते हैं। साथ ही लोकगीतों का अभ्यास भी कराया जाता है ताकि बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें। चर्चा-परिचर्चा के माध्यम से संगीत के इतिहास, परंपरा और सौंदर्य पक्ष को समझने का अवसर मिलता है।
पं. विष्णु नारायण भातखंडे कहते हैं कि “संगीत केवल कला नहीं, एक अनुशासित ज्ञान प्रणाली है।”
तकनीक और संगीत का समन्वय
नई शिक्षा नीति तकनीक के सकारात्मक उपयोग पर बल देती है। इसी क्रम में विद्यालय में बच्चों के माध्यम से यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल संसाधनों का उपयोग करते हुए कत्थक नृत्य, भाव नृत्य और विभिन्न सांगीतिक प्रस्तुतियों का अभ्यास कराया जाता है। आज के बच्चे डिजिटल संसार से जुड़े हुए हैं। यदि तकनीक का उपयोग सही दिशा में किया जाए तो वह सीखने का अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकती है। इससे बच्चों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति भी विकसित होती है।
प्रतियोगिताएँ : प्रतिभा निखारने का मंच
विद्यालय स्तर से लेकर प्रखंड और जिला स्तर तक आयोजित चित्रकला, भाषण, संगीत तथा नृत्य प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। इन प्रतियोगिताओं से बच्चों के भीतर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। वे स्वयं को पहचानते हैं, अपनी कमियों को सुधारते हैं और बड़े मंचों पर प्रस्तुति देने का आत्मविश्वास अर्जित करते हैं।
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ साहब का कहना है कि “रियाज़ ही कलाकार का सबसे बड़ा धर्म है।”
विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों की बदलती मानसिकता
महान सितारवादक पंडित रविशंकर जी का कहना है कि “संगीत वह भाषा है जिसे दुनिया का हर इंसान समझ सकता है।”
नई शिक्षा नीति का सबसे सकारात्मक प्रभाव मानसिकता में आए परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है। एक समय था जब अभिभावक कला और संगीत को केवल मनोरंजन समझते थे। आज वे समझने लगे हैं कि संगीत बच्चों के व्यक्तित्व विकास, भावनात्मक संतुलन और बौद्धिक क्षमता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विद्यार्थियों में भी यह धारणा बदल रही है कि संगीत केवल गाने-बजाने तक सीमित है। अब वे इसे एक गंभीर विषय, एक अनुशासन और एक संभावित करियर के रूप में देखने लगे हैं। शिक्षकों के दृष्टिकोण में भी सकारात्मक परिवर्तन आया है। अब विषयों के बीच कृत्रिम दीवारें टूट रही हैं और सहयोगात्मक शिक्षण का वातावरण विकसित हो रहा है।
बिहार की माटी और संगीत की प्रेरणादायी परंपरा
बिहार की धरती संगीत और कला की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है। यहाँ की लोकधुनों में जीवन की सहजता और संवेदना बसती है। लोकगायिका शारदा सिन्हा जी को ‘बिहार कोकिला’ भी कहा जाता है। उन्होंने लोकसंगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उनकी साधना और समर्पण आज के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इसी प्रकार ने बिहार की लोक परंपराओं, विशेषकर छठ गीतों और मैथिली लोकसंगीत को विश्वस्तर पर पहचान दिलाई। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी वैश्विक पहचान बनाई जा सकती है। इन विभूतियों का जीवन विद्यार्थियों को यह संदेश देता है कि प्रतिभा तभी फलती-फूलती है जब उसके साथ निरंतर अभ्यास, अनुशासन और समर्पण जुड़ा हो।
संगीत : जीवन को सुंदर बनाने की कला
संगीत केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी संवेदनाओं को जागृत करने की कला है। यह मन को संयमित करता है, विचारों को परिष्कृत करता है और व्यक्तित्व को संतुलित बनाता है।
जब प्रातःकालीन चेतना सत्र में सैकड़ों विद्यार्थियों के स्वर एक साथ ‘वंदे मातरम्’ या सरस्वती वंदना का गायन करते हैं, तब विद्यालय केवल शिक्षण संस्थान नहीं रह जाता, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक परिवार बन जाता है। तबला की थाप, हारमोनियम के स्वर और बच्चों की उत्साहपूर्ण सहभागिता पूरे परिसर को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
महान संगीतज्ञ का कथन है— “संगीत आत्मा की भाषा है।” वास्तव में जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ से संगीत बोलना शुरू करता है।
निष्कर्ष:
नई शिक्षा नीति 2020 ने संगीत शिक्षा को नई ऊर्जा, नई दिशा और नया सम्मान प्रदान किया है। विद्यालयों में संगीत अब केवल एक विषय नहीं, बल्कि समग्र शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और व्यक्तित्व निर्माण का प्रभावी माध्यम बन रहा है।
अनेक शोधों से सिद्ध हुआ है कि संगीत विद्यार्थियों में एकाग्रता, स्मरण शक्ति, भावनात्मक संतुलन, आत्मविश्वास और सामाजिक समन्वय की क्षमता को बढ़ाता है। नई शिक्षा नीति इसी कारण कला-आधारित शिक्षण को शिक्षा का अभिन्न अंग मानती है।
एक संगीत शिक्षक के रूप में मेरा अनुभव है कि जब बच्चे संगीत से जुड़ते हैं तो उनके भीतर आत्मविश्वास, अनुशासन, संवेदनशीलता, रचनात्मकता और सामाजिक चेतना का विकास स्वतः होने लगता है। यही नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य भी है— ऐसे जागरूक, संस्कारित और सृजनशील नागरिकों का निर्माण जो अपनी संस्कृति से जुड़े हों और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हों।
अंत में यही कहा जा सकता है कि— “संगीत वह साधना है जो मनुष्य को स्वयं से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है और अंततः मानवता से जोड़ देती है।”
माँ सरस्वती की कृपा आप सबो पर बनी रहे, यही आशा और विश्वास के साथ हृदय से धन्यवाद व्यक्त करता हूँ।
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
