जुनून-अरविंद कुमार - गद्य गुँजन

जुनून-अरविंद कुमार

जुनून

शाम के 4 बज रहे थे, जवाहर उच्च विद्यालय भरगामा के मैदान पर भरगामा क्रिकेट टीम के खिलाड़ी क्रिकेट खेल रहे थे। हर रोज की तरह आज भी किशन मैदान पर आ धमका था।किशन का घर मैदान से लगभग 1 किलोमीटर दक्षिण सुकैला मोड़ के तरफ था । 12-13 साल का लड़का, घुघराले बाल, रंग गोरा था, गरीबी की मार झेलने के बाबजूद भी उसके चेहरे पर गजब की चमक थी। वह रोज की तरह आज भी, मैदान पर आकर अपने काम मे जुट गया था । किशन का काम था बॉउंड्री से बाहर के गेंद को उठा कर खिलाड़ियों को वापस करना।किशन को गेंद पकड़ने में खूब मजा आता था। हालांकि उस गरीब को ये गेंद पकड़ने के काम के लिए कितनी जहमत उठानी पड़ती थी, ये तो किशन ही जानता था। वह माँ-बाप से नजरें चुराकर ही रोज खेल का हिस्सा बन पाता था।

पिता वीरेंद्र दास बच्चों के खेल के दुश्मन थे। वह खुद हमेशा खेती-बाड़ी के काम मे लगे रहते तथा अपने बच्चो से भी खूब काम करवाते। उनके नजर में पढ़ाई से ज्यादा काम का महत्व था। हालांकि किशन की माँ रंभा देवी का नजरिया किशन के शिक्षा को लेकर सकारात्मक था। काम न करने के एवज में वीरेंद्र दास को बच्चों की पिटाई करने तक से गुरेज न था। किशन भी कई बार उनके सितम का शिकार हो चुका था इसलिए वो खासा सचेत रहा करता था। पेट की आग इंसान के जीवन के मायने ही बदल देती है। उसकी सम्पुर्ण जिंदगी इस डर में गुजरता है कि कही पेट के लाले न परे। बस इसकी जुगत में जिंदगी संकुचित होकर आगे निकल जाती है। बॉउंड्री से बाहर के गेंद को उठा-उठा कर वापस करने के साथ किशन की भी इच्छा बेटिंग या बोलिंग की होती मगर वो इच्छा आज तक पूरी नही हो पाई थी। अगर इच्छा शक्ति मजबूत हो तो दुनियाँ का कोई भी काम भारी नहीं लगता। इसलिए कुछ दिनों बाद अपनी इच्छा पूर्ति के लिए किशन ने अपने कुछ पास-पड़ोस के मित्रों के साथ मिलकर खुद से लकड़ी का बैट बनाया और अपने दोस्तों के साथ गाँव के ख़ाली पड़े खेतों में क्रिकेट खेलना शुरु किया। हालांकि उसे ऐसा करने के लिए घरेलू कामों को समय पर निपटाने के साथ-साथ पिता से भी नजरें चुरानी पड़ती थी ।
हर बच्चों के अंदर कुछ नैसर्गिक गुण होते हैं जिसे समझने की जरूरत होती है। अगर बच्चे के इसी गुण को उसके मनोनुकूल दिशा में थोड़ा सहयोग किया जाय तो परिणाम बेहतर हो सकते है ।

किशन की इच्छा शक्ति, उसकी लगन व ज़िद ने उसे कुछ बरसों बाद एक बेहतर खिलाड़ी बना दिया था। अब दूसरे टीम के खिलाड़ी भी किशन को अपनी टीम में रखना चाहते थे। स्थानीय स्तर पर बोरो खिलाडी के रूप में किशन की काफी मांग थी। गजब की फील्डिंग और बेहतरीन बल्लेबाजी की शैली ने उसे इलाके का हीरो बना दिया था। दूसरी तरफ खेल से अनभिज्ञ वीरेंद्र दास के नजर में किशन दिन-प्रतिदिन खलनायक ही बनता जा रहा था। उन्हें ये खेल-कूद सब फालतू लग रहा था। मार्च के महीने में भरगामा में युवा क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया गया था। इस टूर्नामेंट में काफी दूर-दराज के टीम के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। काफी लीग मैच खेले जाने के बाद अततः भरगामा और फारबिसगंज की टीम के बीच फाइनल मुकाबला खेला जाना था। 8 मार्च का दिन था, मौसम साफ था, नीले आसमान के नीचे मौजूद पेड़-पौधे मंद हवाओं के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे। पूरा वातावरण खुशियों से सराबोर था और आज ही के दिन 12 बजे से जवाहर हाई स्कूल भरगामा के मैदान में फारबिसगंज और भरगामा के बीच फाइनल मुकाबला खेला जाना था। मैदान को दुल्हन की तरह सजाया गया था। हर कोने में लाउडस्पीकर की आवाजें गूँज रही थी। दर्शकों से मैदान खचा-खच भरा हुआ था । जिले से लेकर प्रखण्ड स्तर तक के अधिकारियों व बिहार सरकार के स्थानीय मंत्री की मौजूदगी ने उस फ़ाइनल मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया था। उधर भरगामा टीम की जान व कड़ी मेहनत से टीम को फाइनल तक पहुँचाने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले किशन अभी तक मैदान पर नही पहुँचा था जो उसके कप्तान मनीष की बेचैनी को लगातार बढ़ा रहा था। यहाँ किशन के पिता वीरेंद्र दास किशन को खेत पर आने को कहकर आगे बढ़ गये थे। किशन भी सहमति में सिर हिलाकर हाँ भर दिया था। वीरेंद्र दास के जाते ही पिंजड़े से आज़ाद पंछी के माफिक, किशन मैदान की तरफ दौड़ पड़ा। किशन को देख कप्तान मनीष ने राहत की सांस ली। टॉस जीत पहले बल्लेबाजी करते हुए फारबिसगंज की टीम ने निर्धारित 20 ओवर में 160 रन का मजबूत लक्ष्य रखा। बाद में बल्लेबाजी करने उतरी भरगामा की टीम का दर्शकों ने तालियों से अभिवादन किया। जीत की उम्मीद लिए भरगामा के दर्शक हर एक चौके व छक्कों पर तालियों की बौछार करते थे। मगर कुछ ही देर के अंदर मैदान खमोशी की चादर ओढ़ लिया था। फारबिसगंज के घातक गेंदबाजी के सामने भरगामा टीम बौनी नजर आ रही थी। 5 विकेट के नुकसान पर सिर्फ 36 रन ही बने थे। ड्यूज बॉल आज भरगामा के लिए घातक साबित हो रहा था। थोड़ी बहुत उम्मीद की किरण अगर कुछ था तो वो किशन था जो 18 रन बनाकर खेल रहा था। सारे दर्शक दीर्घा में उदासी छाई हुई थी मगर ये बल्लेबाज किशन था जो हार मानने को तैयार न था। वह भरगामा के आन बान शान के लिए विरोधियों के सामने डटा था। किशन को लग रहा था मैच हाथ से निकल रहा है। दर्शकों की ख़ामोशी भी इस बात की गवाही दे रहे थे। इसलिए किशन ने रिस्क उठाया और अपनी क्षमता के अनुरूप ताबड़-तोड़ बल्लेबाजी करना शुरु किया। ठीक उसी तरह जैसै बुझने वाला चिराग अपने अंतिम समय में कुछ ज्यादा ही प्रकाश फैलाने लगता है। उसके शाॅर्ट अब हवा को चीरते हुए बाउंड्री के बाहर हो रहे थे।किशन के हौसले ने साथी खिलाड़ी कार्तिक में भी एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया था। वह भी किशन का भरपूर साथ दे रहा था। दर्शकों में अब उम्मीद की किरण जग चुकी थी। विरोधियों के हर दांव फेल हो रहे थे। किशन छक्कों और चौकों से दर्शकों का खूब मनोरंजन कर रहा था। उधर समय पर किशन के खेत नही पहुँचने के कारण बेटे को दंड देने वीरेंद्र दास भी मैदान पहुँच चुके थे। पहली बार गुस्से से मैदान पर पहुँचे वीरेंद्र दास को वहाँ का नजारा तो कुछ और ही दिखा। बड़ी मशक्कत के बाद बेचारे को दर्शकों के बीच थोड़ी सी जगह मिली। बेटे के चौके छक्कों पर झूमते लोगों को देखकर आज अनायास ही गरीब वीरेंद्र दास का सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था ।
अंततः भरगामा की टीम फाइनल मुकाबला जीत गई। भरगामा के दर्शक किशन को अपने कंधे पर बैठाकर मैदान का चक्कर काट रहे थे।किशन को मैन ऑफ द मैच चुना गया था। मीडिया के बीच मंत्री के हाथों शील्ड पाते अपने बच्चे को देखकर गरीब वीरेंद्र दास की आँखे छलक आई। वीरेंदर दास अपने मैले-कुचैले गमछे से अपने ख़ुशी के आँसू पोछ रहे थे ।

अरविंद कुमार 

म. वि. भरगामा अररिया 
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