दीपू अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था। देखने में गोरा, लंबा और हृष्ट-पुष्ट था। उसने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त किया[...]
लाल सपना – चांदनी समरलाल सपना – चांदनी समर
उसकी नींद खुली तो बिस्तर पर खून के धब्बे थे। पेट में मरोड़ उठ रही थी। बड़ी मुश्किल से कराते[...]
दूसरा भगवान – संजीव प्रियदर्शीदूसरा भगवान – संजीव प्रियदर्शी
परामर्श शुल्क के अभाव में दो बार क्लीनिक से लौटाये जाने के बाद वह तीसरी दफे रुपये जुटाकर अपने दस[...]
वचनसीमा – संजीव प्रियदर्शीवचनसीमा – संजीव प्रियदर्शी
एक लघुकथा कपड़े के दो डिब्बे पति मनोहर को देती हुई बोली-‘ एक में तुम्हारी पसंद के शर्ट-पैंट हैं और[...]
जनता – संजीव प्रियदर्शीजनता – संजीव प्रियदर्शी
एक बार किसी राजा के कुछ सभासदों ने उनसे पूछ लिया- ‘सच्चा देवदूत, जनता क्या होती है? आजतक हमलोग इसके[...]
पगला है- संजीव प्रियदर्शीपगला है- संजीव प्रियदर्शी
लघुकथा सनोज दास जिस दिन नौकरी में आये,उस दिन उनके हिस्से की ऊपरी कमाई ढ़ाई सौ रुपये बनती थी।साथी अहलकार[...]
समझ- संजीव प्रियदर्शीसमझ- संजीव प्रियदर्शी
लघुकथा पत्नी ने आकर कहा-‘ अजी सुनते हो! मनोरमा को जिस पूज्य बाबा जी की अनुकंपा से लड़का हुआ है,चलो[...]
सबक- संजीव प्रियदर्शीसबक- संजीव प्रियदर्शी
एक लघुकथा बारात अभी जनवासे पर पहुँची थी कि घर के लोगों को जैसे सांप सूंघ गया। माता-पिता को कुछ[...]
गणवेश- मनोज कुमारगणवेश- मनोज कुमार
गणवेश; यह वह आवरण है जो हमारी कई पृष्टभूमि को ओझल कर देती है। यह हमारी ज्ञान रूपी गाड़ी को[...]
अपना-पराया- संजीव प्रियदर्शीअपना-पराया- संजीव प्रियदर्शी
लघुकथा आज देर शाम रघुनाथ जब घर लौटा तो पत्नी राधिका को डरी-सहमी मकान के सामने बरसाती में पाया। कारण[...]