- जब नागपाश में बँध गए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
लंका की धरती पर भीषण युद्ध छिड़ा था। एक ओर अधर्म का अभिमान था, तो दूसरी ओर धर्म की रक्षा का संकल्प। भगवान श्रीराम अपनी मर्यादा, सत्य और धर्म के बल पर रावण की विशाल सेना का सामना कर रहे थे।
तभी रावण के पुत्र मेघनाद ने अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग किया। उसने ऐसा नागपाश चलाया कि भगवान श्रीराम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण सर्पों के बंधन में जकड़ गए।
यह दृश्य देखकर वानर सेना में खलबली मच गई। सबकी आँखों में चिंता थी। विभीषण और जामवंत ने परिस्थिति की गंभीरता को समझा। अंततः सबकी दृष्टि हनुमानजी की ओर उठी।
हनुमानजी ने श्रीराम की ओर देखा। उनके हृदय में प्रभु के प्रति अगाध प्रेम था। वे रामकार्य के लिए सदैव तत्पर रहते थे। परंतु नागपाश का बंधन ऐसा था, जिसे साधारण शक्ति से काटना संभव नहीं था।
तभी समाधान सामने आया—इस नागपाश को गरुड़जी ही काट सकते हैं।
हनुमानजी ने बिना एक क्षण गँवाए गरुड़जी को बुलाने की व्यवस्था की। गरुड़जी आए और उन्होंने अपने प्रभाव से नागपाश को छुड़ा दिया।
प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण मुक्त हो गए। वानर सेना में जयघोष गूँज उठा—
जय श्रीराम! जय लक्ष्मण! जय हनुमान!
लेकिन गरुड़जी के मन में एक विचित्र प्रश्न उठ खड़ा हुआ।
वे सोचने लगे—
जिन श्रीराम को समस्त सृष्टि का विधाता कहा जाता है, जिनके संकेत पर सृष्टि का संचालन होता है, वे स्वयं नागपाश में कैसे बँध गए? और यदि वे वास्तव में सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्होंने स्वयं उस बंधन को क्यों नहीं तोड़ा?
गरुड़जी के मन में संशय का बीज पड़ चुका था। वे प्रभु की महिमा से परिचित थे, फिर भी उनकी लीला को समझ नहीं पा रहे थे।
- गरुड़जी का संशय और देवताओं से समाधान की खोज
गरुड़जी के मन में प्रश्न गहराता गया। वे सोचते रहे कि यदि भगवान श्रीराम सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें किसी दूसरे की सहायता की आवश्यकता क्यों पड़ी?
उन्होंने देवताओं से इस प्रश्न का समाधान जानना चाहा। वे नारद मुनि के पास पहुँचे।
नारदजी ने उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनी। वे जानते थे कि ईश्वर की लीला को केवल तर्क से नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने गरुड़जी को ब्रह्माजी के पास जाने की सलाह दी। ब्रह्माजी ने भी उनके प्रश्न को गंभीरता से सुना और अंततः उन्हें भगवान शिव की शरण में जाने का संकेत दिया।
भगवान शिव ने गरुड़जी की दुविधा को समझा। उन्होंने विचार किया कि इस प्रश्न का समाधान केवल शास्त्रों के तर्क से नहीं, बल्कि रामकथा के मर्म को समझने से होगा।
तब उन्होंने गरुड़जी को काकभुशुण्डिजी के पास जाने का मार्ग बताया।
गरुड़जी काकभुशुण्डिजी के आश्रम पहुँचे।
काकभुशुण्डिजी ने उनका आदर-सत्कार किया। गरुड़जी ने अपने मन का संशय उनके सामने रख दिया।
काकभुशुण्डिजी मुस्कुराए और बोले—
“हे पक्षिराज! आप भगवान की शक्ति को जानते हैं, लेकिन उनकी भक्ति और लीला का रहस्य अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। आइए, मैं आपको प्रभु श्रीराम की ऐसी कथा सुनाता हूँ, जिससे आपके मन का संशय दूर हो जाएगा।”
- बालक राम की लीला और काकभुशुण्डिजी का अनुभव
काकभुशुण्डिजी ने कहना आरंभ किया—
“हे गरुड़जी! जब भगवान श्रीराम अयोध्या में बालस्वरूप में थे, तब मैं एक छोटे पक्षी का रूप धारण करके उनके आँगन में जाया करता था।
प्रभु बालक की तरह खेलते, हँसते और अठखेलियाँ करते थे। मैं भी उनके साथ खेलता था। कभी उनके पास बैठता, कभी उनके हाथ से भोजन का छोटा-सा टुकड़ा उठा लेता और कभी उड़कर उनसे दूर जा बैठता।
प्रभु मुझे पकड़ने के लिए अपने नन्हे-नन्हे हाथ बढ़ाते। मैं उड़ जाता तो वे हँसने लगते। कभी मैं उनसे दूर चला जाता तो वे मुझे पकड़ने के लिए पीछे दौड़ते।
उनकी बाललीला इतनी मनोहर थी कि मन बार-बार उसी में रम जाता था। नारद मुनि भी प्रभु की बाललीलाओं को देखकर वीणा बजाते और उनके गुण गाते थे।
उनकी वाणी में मानो यही भाव झलकता था कि संसार के सभी जीव उस परमात्मा की लीला के सहभागी हैं, जो बालरूप में भी सबके मन को मोह लेते हैं।
एक दिन माता कौशल्या किसी काम से बाहर गई थीं। प्रभु श्रीराम और मैं आँगन में अकेले थे। प्रभु अपने हाथ में रोटी का एक टुकड़ा लिए मुझे ललचा रहे थे। मैं पास जाता तो वे मुझे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाते और मैं उड़ जाता।
खेलते-खेलते मैंने उनके हाथ से रोटी का टुकड़ा छीन लिया।
बस, फिर क्या था! बालक राम रूठ गए और रोने लगे।
उनकी आँखों में आँसू देखकर मेरे मन में एक विचित्र विचार आया।
मैं सोचने लगा—
क्या यही वे भगवान हैं, जिनकी महिमा का गान ऋषि-मुनि करते हैं? क्या यही समस्त सृष्टि के स्वामी हैं? यदि ये भगवान हैं, तो एक छोटे-से पक्षी के हाथ से अपनी रोटी भी नहीं बचा पाए!
मेरे मन में संशय उत्पन्न हुआ। मैं प्रभु को उसी आँगन में छोड़कर आकाश की ओर उड़ चला।
लेकिन यह क्या!
मैं जहाँ-जहाँ उड़ता, मुझे लगता कि बालक राम मेरे पीछे चले आ रहे हैं। मैंने अपनी गति बढ़ाई, दूर-दूर तक उड़ने का प्रयास किया, किंतु उनसे दूर नहीं जा सका।
मेरी गति क्षीण होने लगी। मेरा अभिमान टूटने लगा। मैं समझ गया कि मेरी शक्ति और गति उस परम सत्ता के सामने कुछ भी नहीं हैं।
अंततः मैं थककर उसी आँगन में लौट आया और प्रभु के चरणों में गिर पड़ा।
मैंने विनती की—
‘हे दीनबंधु! हे करुणानिधान! मेरी रक्षा कीजिए। मेरा अज्ञान दूर कीजिए। मैं आपकी लीला को समझ नहीं पाया। मुझे क्षमा कर दीजिए।’
तभी प्रभु ने मुझे अपना दिव्य चतुर्भुज स्वरूप दिखाया। मैं विस्मित रह गया। जिस बालक को मैं साधारण समझ बैठा था, वही अनंत ब्रह्म का स्वरूप था।
प्रभु की करुणा उमड़ पड़ी। उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा—
‘हे काग! तुम मुझसे क्या माँगते हो? संपत्ति, सद्गति, सुख, मुक्ति या कोई ऐसा वरदान, जो किसी और को प्राप्त न हुआ हो?’
उनकी प्रेममयी वाणी सुनकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
मैंने मन ही मन विचार किया—
संपत्ति आज है, कल नहीं। संसार के सुख समय के साथ बदल जाते हैं। पद और प्रतिष्ठा भी सदा साथ नहीं रहते। लेकिन प्रभु की भक्ति से मिलने वाला आनंद ऐसा है, जो हृदय को निरंतर समृद्ध करता है।
मैंने हाथ जोड़कर कहा—
‘प्रभु! मुझे संसार के क्षणभंगुर सुख नहीं चाहिए। मुझे आपकी अखंड भक्ति चाहिए। मेरा मन सदैव आपके चरणों में लगा रहे। मैं कभी आपके प्रेम से विमुख न होऊँ।’
प्रभु प्रसन्न हो उठे।
उन्होंने कहा—
‘हे कागभुशुण्डि! तुमने भौतिक सुखों के स्थान पर भक्ति माँगी है। इससे बढ़कर बुद्धिमानी और क्या होगी? अनेक साधक कठोर तपस्या करके भी जिस भक्ति को पाने की कामना करते हैं, तुमने उसे मेरे प्रेम से प्राप्त करने का वर माँगा है।’
प्रभु ने मुझे अपनी कृपा से अनुगृहीत किया और रामतत्त्व को समझने की शक्ति प्रदान की।
काकभुशुण्डिजी ने आगे कहा—
“हे गरुड़जी! प्रभु का बालरूप हो या उनका राजसी स्वरूप, वे अपनी लीला में भक्तों को अलग-अलग अनुभव प्रदान करते हैं। जब वे मानव रूप में अवतरित होते हैं, तब अपनी मर्यादा के अनुरूप आचरण करके संसार को धर्म, प्रेम, कर्तव्य और आदर्श का पाठ पढ़ाते हैं।
नागपाश में उनका बँधना उनकी असमर्थता नहीं था। वह उनकी लीला थी। उस लीला के माध्यम से हनुमानजी की सेवा, गरुड़जी की महत्ता और भक्तों के प्रेम को प्रकट होने का अवसर मिला।
भगवान को भक्त की सहायता की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन भक्त को अपनी सेवा और समर्पण का अवसर देकर भगवान उसे धन्य कर देते हैं।”
- काकभुशुण्डिजी के सात प्रश्न और जीवन का अमूल्य ज्ञान
गरुड़जी ध्यानपूर्वक रामकथा सुन रहे थे। उनके मन में अब केवल भगवान की शक्ति को लेकर प्रश्न नहीं था; वे जीवन के गहरे सत्य को भी समझना चाहते थे।
उन्होंने काकभुशुण्डिजी से धर्म, अधर्म, पाप, पुण्य और मानव जीवन के संबंध में प्रश्न पूछे।
काकभुशुण्डिजी ने सरल शब्दों में समझाया—
पहला प्रश्न—सबसे बड़ा दुख और सबसे बड़ा सुख क्या है?
उन्होंने बताया कि दरिद्रता मनुष्य के जीवन को अनेक कठिनाइयों से भर देती है, जबकि संतों का संग मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है। सत्संग से विचार शुद्ध होते हैं और जीवन को नई दिशा मिलती है।
दूसरा प्रश्न—सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप क्या है?
काकभुशुण्डिजी ने कहा—
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।”
अर्थात दूसरों की भलाई करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं और किसी को जानबूझकर पीड़ा देने से बढ़कर कोई अधर्म नहीं।
तीसरा प्रश्न—मनुष्य के मन के प्रमुख रोग कौन-से हैं?
उन्होंने समझाया कि मोह, काम, लोभ और क्रोध मनुष्य के विवेक को ढक देते हैं। जब मनुष्य इन विकारों के वश में हो जाता है, तब वह अपने हित-अहित का निर्णय भी ठीक से नहीं कर पाता।
चौथा प्रश्न—ज्ञान का दीपक कब जलता है?
जब मनुष्य विवेक से सही-गलत का अंतर समझता है, संतोष अपनाता है, अनावश्यक मोह से ऊपर उठता है और ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित करता है, तब उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
पाँचवाँ प्रश्न—ज्ञान और भक्ति में कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है?
काकभुशुण्डिजी ने समझाया कि ज्ञान का मार्ग गहन साधना और विवेक माँगता है। भक्ति का मार्ग प्रेम, विश्वास और समर्पण से हृदय को भगवान से जोड़ता है। भक्ति सरल अवश्य है, लेकिन सच्ची भक्ति के लिए अहंकार त्यागना और आचरण को शुद्ध रखना आवश्यक है।
छठा प्रश्न—संत और असंत के स्वभाव में क्या अंतर है?
उन्होंने चंदन और कुल्हाड़ी का उदाहरण दिया।
चंदन को काटने वाली कुल्हाड़ी पर भी चंदन की सुगंध लग जाती है। उसी प्रकार संत अपने प्रति बुरा व्यवहार करने वाले के प्रति भी अपने सद्गुण नहीं छोड़ते। इसके विपरीत, असंत का स्वभाव दूसरों को हानि पहुँचाना होता है।
सातवाँ प्रश्न—संसार रूपी भवसागर से मुक्ति कैसे मिलती है?
काकभुशुण्डिजी ने कहा कि भगवान श्रीराम की कृपा, सच्ची भक्ति और धर्ममय आचरण मनुष्य को भवसागर से पार जाने का मार्ग दिखाते हैं। केवल अहंकार, ज्ञान का प्रदर्शन या बाहरी आडंबर मनुष्य को परम शांति नहीं दे सकते।
इन उत्तरों को सुनकर गरुड़जी का हृदय श्रद्धा से भर उठा।
- गरुड़जी के भाव में आया परिवर्तन
काकभुशुण्डिजी की कथा सुनने से पहले गरुड़जी के मन में एक प्रश्न था—जब भगवान श्रीराम सर्वशक्तिमान हैं, तो वे नागपाश में बँधे ही क्यों?
लेकिन अब उनकी दृष्टि बदल चुकी थी।
वे समझ गए कि भगवान की लीला को केवल बाहरी घटनाओं से नहीं परखा जा सकता। प्रभु श्रीराम का नागपाश में बँधना उनकी दुर्बलता नहीं, बल्कि उनकी मर्यादा और लीला का एक प्रसंग था।
गरुड़जी ने यह भी समझा कि हनुमानजी की महानता केवल उनकी असाधारण शक्ति में नहीं, बल्कि उनके निष्काम सेवाभाव में है।
हनुमानजी ने यह विचार नहीं किया कि भगवान स्वयं अपना बंधन क्यों नहीं तोड़ते। उन्होंने यह नहीं पूछा कि सर्वशक्तिमान प्रभु को मेरी सहायता की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने तो बस प्रभु का कष्ट देखा और रामकार्य में जुट गए।
यही सच्ची भक्ति है—जहाँ तर्क और अहंकार से पहले प्रेम और सेवा का स्थान होता है।
गरुड़जी के मन का संशय दूर हो गया। उनका अभिमान विनम्रता में बदल गया। प्रश्नों की जगह श्रद्धा ने ले ली और जिज्ञासा का अंत ज्ञान में हुआ।
वे काकभुशुण्डिजी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए बोले—
“आज मैंने जाना कि भगवान की महिमा को समझने के लिए केवल शक्ति का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उनके प्रेम, उनकी मर्यादा और उनकी भक्ति को भी समझना आवश्यक है।”
उनके हृदय में भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा और गहरी हो गई।
- विजयादशमी का संदेश—अहंकार पर भक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय
विजयादशमी केवल रावण के वध का पर्व नहीं है। यह मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अधर्म पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा भी देता है।
भगवान श्रीराम हमें सिखाते हैं कि शक्ति के साथ मर्यादा, विजय के साथ विनम्रता और अधिकार के साथ कर्तव्य भी आवश्यक हैं।
हनुमानजी हमें सिखाते हैं कि सच्चा सेवक अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य को पहचानता है। उसके लिए प्रभु की सेवा ही सबसे बड़ा सम्मान है।
गरुड़जी का प्रसंग हमें बताता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रश्न करना गलत नहीं, लेकिन अपने प्रश्नों के समाधान के लिए विनम्रता और सत्संग भी आवश्यक हैं।
काकभुशुण्डिजी की कथा यह संदेश देती है कि संसार के क्षणभंगुर सुखों से बढ़कर भक्ति, परहित और सदाचार का आनंद है।
आइए, इस विजयादशमी पर हम अपने भीतर के रावण को पहचानें, अहंकार को त्यागें, दूसरों की भलाई का संकल्प लें और श्रीराम की मर्यादा तथा हनुमानजी की निष्काम भक्ति को अपने जीवन में उतारें।
क्योंकि सच्ची विजय वही है, जिसमें मनुष्य दूसरों को पराजित करने से पहले अपने भीतर के अवगुणों पर विजय प्राप्त करे।
जय श्रीराम!
जय बजरंगबली!
स्वरचित, रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
बिहार सरकार द्वारा पूर्णतः स्वीकृत विद्यालय
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर