विचार के साथ-साथ कार्य भी आवश्यक होता है। तभी सफलता मिलती है।
…….रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में केवल विचार है, परिणाम में कुछ नहीं। युद्धकाण्ड/लंकाकांड में केवल कर्म है, तो परिणाम में पतन ही है। सुन्दरकाण्ड में विचार के साथ कर्म भी है। सुन्दरकाण्ड में श्री हनुमानजी पग-पग पर अपने आराध्य श्रीराम पर विश्वास करते हुए विचार के साथ कार्य भी करते जाते हैं, इसलिए उन्हें सफलता मिलती जाती है।
……ईश्वर में आस्था रखते हुए पग-पग पर विचार के साथ कार्य करने से सिद्धि(सफलता) और समृद्धि दोनों मिलती हैं।
…..कविवर भारवि रचित ‘किरातार्जुनीयम्’ नामक ग्रंथ में कहा गया है।-
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥(किरातार्जुनीयम्)
….. अर्थात् अकस्मात् बिना सोचे-विचारे किसी कार्य को नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि अविवेक आपत्तियों का घर है। जो विचार करके कार्य करते हैं, उसे गुण और समृद्धि स्वत: प्राप्त होती रहती है।
तीन चीजों में विश्वास आवश्यक है – ईश्वर में विश्वास, स्वयं में विश्वास(आत्मविश्वास) और अपने पारिवारिक संस्कारों में विश्वास।
………गिरीन्द्र मोहन झा(स्वरचित)
विचार… गिरींद्र मोहन झा
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