गद्य गुँजन संस्मरण विद्यालय के ऑफिस में भूत! – लेखक:- उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक “

विद्यालय के ऑफिस में भूत! – लेखक:- उमेश कुमार सिन्हा ” निर्देशक “



एक विद्यालय था। वहाँ शिक्षक और कर्मचारी मिल-जुलकर काम करते थे। विद्यालय का वातावरण पढ़ाई-लिखाई और बच्चों की चहल-पहल से भरा रहता था। लेकिन एक दिन विद्यालय के कार्यालय में ऐसी रहस्यमयी घटनाएँ होने लगीं कि पूरे स्टाफ की नींद उड़ गई।

रहस्यमयी घटनाओं की शुरुआत

विद्यालय के कार्यालय में शर्मा सर, मिश्रा मैडम और गुप्ता जी सहित कई कर्मचारी काम करते थे। दिनभर कार्यालय में फाइलें, रजिस्टर, पेन, कागज और दूसरी जरूरी वस्तुएँ करीने से रखी रहती थीं।

एक सुबह जब शर्मा सर कार्यालय पहुँचे, तो दरवाजा खोलते ही उनके मुँह से निकला—

शर्मा सर: “अरे! यह क्या हो गया? मेज पर रखी फाइलें जमीन पर कैसे गिर गईं?”

मिश्रा मैडम भी वहाँ आ पहुँचीं।

मिश्रा मैडम: “कल शाम तो मैंने सारी फाइलें ठीक से रखी थीं। ये कुर्सियाँ इधर-उधर कैसे हो गईं?”

गुप्ता जी ने मेज के नीचे बिखरे कागजों को देखते हुए कहा—

गुप्ता जी: “कहीं रात में कोई चोर तो नहीं घुस आया?”

शर्मा सर ने तुरंत जवाब दिया—

शर्मा सर: “चोर कैसे घुसेगा? कार्यालय के दरवाजे पर ताला लगा था। खिड़कियाँ भी बंद थीं। फिर यह सब किसने किया?”

किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।

रात का अनदेखा मेहमान

पहले दिन सभी ने इसे सामान्य घटना समझकर अनदेखा कर दिया। लेकिन अगली सुबह फिर वही हुआ। इस बार मेज पर रखी फाइलें नीचे पड़ी थीं, पेन स्टैंड उलटा था और कागज पूरे कमरे में बिखरे हुए थे।

तीसरे दिन भी वही नजारा था।

चौथे दिन तो हद ही हो गई। एक कुर्सी मेज से दूर खिसकी हुई थी और रजिस्टरों का ढेर जमीन पर पड़ा था।

मिश्रा मैडम (घबराकर): “मुझे तो कुछ ठीक नहीं लग रहा। आखिर रोज रात को यहाँ कौन आता है?”

गुप्ता जी: “दरवाजे पर ताला, खिड़कियाँ बंद! कोई आदमी अंदर आ ही नहीं सकता। मुझे तो कुछ और ही मामला लगता है।”

शर्मा सर: “आपका मतलब है कि…?”

गुप्ता जी ने धीमी आवाज में कहा—

गुप्ता जी: “कहीं यह किसी भूत-प्रेत का काम तो नहीं?”

यह सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

भूत की चर्चा से बढ़ा डर

अब विद्यालय के कर्मचारियों के बीच तरह-तरह की बातें होने लगीं। कोई कहता कि रात में कार्यालय से आवाजें आती हैं, तो कोई दावा करता कि वहाँ कोई अदृश्य शक्ति रहती है।

एक दिन चपरासी रामू ने भी अपनी बात रखी—

रामू: “साहब, मैंने सुना है कि पुराने कमरों में कभी-कभी आत्माएँ भटकती हैं। कहीं हमारे कार्यालय में भी तो ऐसा कुछ नहीं?”

शर्मा सर: “रामू, बिना देखे-सुने ऐसी बातें मत फैलाओ।”

रामू: “मैं तो वही कह रहा हूँ, जो लोग बता रहे हैं। लेकिन अब रात में इस तरफ आने की हिम्मत नहीं होती!”

धीरे-धीरे डर इतना बढ़ गया कि कर्मचारी शाम होते ही कार्यालय से निकलने की जल्दी करने लगे। कुछ लोग अकेले कमरे में जाने से भी कतराने लगे।

रहस्य खुलने का समय

पाँचवें दिन सभी ने तय किया कि अब इस रहस्य का पता लगाना ही होगा।

शर्मा सर: “हम रोज डरते रहेंगे, तो काम कैसे चलेगा? आज कार्यालय की अच्छी तरह जाँच करेंगे।”

मिश्रा मैडम: “हाँ, लेकिन सावधानी से। आखिर कोई न कोई बात जरूर है।”

सभी ने कमरे के कोने-कोने को देखा। मेज के नीचे, पर्दों के पीछे और अलमारियों के आसपास जाँच की गई। लेकिन कुछ भी असामान्य नहीं मिला।

तभी रामू की नजर एक बड़ी अलमारी पर पड़ी। उसका दरवाजा थोड़ा खुला था।

रामू: “साहब, जरा इधर आइए! इस अलमारी में कुछ हलचल हो रही है।”

सभी की साँसें थम गईं।

गुप्ता जी: “धीरे से दरवाजा खोलो। पता नहीं अंदर क्या है!”

शर्मा सर ने हिम्मत जुटाई और अलमारी का दरवाजा खोला।

अचानक अंदर से दो चमकती आँखें दिखाई दीं। अगले ही पल एक काली बिल्ली जोर से म्याऊँ करती हुई बाहर कूद पड़ी!

मिश्रा मैडम: “अरे! बिल्ली! यही है हमारा भूत?”

रामू: “हे भगवान! इतने दिनों से हम इससे डर रहे थे?”

बिल्ली घबराकर भागने लगी, लेकिन दरवाजा बंद होने के कारण वह कमरे में ही इधर-उधर दौड़ने लगी। आखिरकार कर्मचारियों ने सावधानी से उसे पकड़ लिया और कार्यालय से बाहर निकाल दिया।

भूत नहीं, बिल्ली थी!

अब सभी के चेहरे पर डर की जगह हँसी थी।

गुप्ता जी (हँसते हुए): “तो जनाब, हमारा भूत चार पैरों वाला निकला!”

शर्मा सर: “जिसे हम अदृश्य शक्ति समझ रहे थे, वह तो एक शरारती बिल्ली थी!”

मिश्रा मैडम: “हमने बिना सच्चाई जाने कितनी बातें बना लीं। अगर पहले ही जाँच कर लेते, तो इतने दिन डरना नहीं पड़ता।”

रामू भी मुस्कुराते हुए बोला—

रामू: “अब समझ में आया कि रात में फाइलें कौन गिराता था और कागज कौन बिखेरता था!”

सभी जोर-जोर से हँस पड़े। उस दिन के बाद कार्यालय में भूत की चर्चा बंद हो गई। कर्मचारियों ने खिड़कियों और दरवाजों की जाँच की, ताकि बिल्ली दोबारा अंदर न घुस सके।

कहानी से मिली सीख

इस घटना ने सभी को एक महत्त्वपूर्ण बात सिखाई—किसी भी घटना के पीछे का कारण जाने बिना डरना या अफवाह फैलाना उचित नहीं है।

कई बार हमारी कल्पना किसी छोटी-सी घटना को बहुत बड़ा रहस्य बना देती है। डर के स्थान पर समझदारी, अफवाह के स्थान पर जाँच और अंधविश्वास के स्थान पर विवेक अपनाना चाहिए।

संदेश: सच्चाई की रोशनी में डर का अँधेरा अपने आप मिट जाता है।

स्वरचित मौलिक कहानी :-
लेखक :- उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
गोस्वामी तुलसीदास पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर

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