बेटी की मुस्कुराहट-श्री विमल कुमार "विनोद" - गद्य गुँजन

बेटी की मुस्कुराहट-श्री विमल कुमार “विनोद”

Bimal Kumar

संक्षिप्त सार- शमशान में एक लावारिश लड़की के लाश को जलाया जा रहा है।उसी समय उस रास्ते से मोहन और सोहन
दो मित्र गुजर रहे हैं।मोहन अपने मित्र सोहन को कहता है कि देखो एक गरीब की बेटी का
कुछ हैवान लोगों ने बलत्कार करके उसे जान से मार दिया।उस लाश की स्थिति ऐसी थी कि उसे जलाने वाला भी कोई नहीं था।
सोहन गौर से सुनकर कहता है कि तुम्हारे इस तरह कहने का मतलब क्या है?फिर मोहन कहता है कि तुम भी गरीब हो कभी तुम्हारी बेटी भी जब बड़ी होगी तो यदि कोई तुम्हारी बेटी कागलथ विडियो बनाकर वायरल करेगा तथा दुर्भाग्यवश यदि उसको भी बलत्कार करके मार देगा तो शायद तुम बर्दाश्त नहीं कर पाओगे।इसलिये सबसे अच्छा है कि बचपन में अपनी छोटी सी बेटी को मार दो तो बहुत अच्छा होगा।यह बात जब मोहन बार-बार सोहन को कहता है तो वह अपने को रोक नहीं पाता है तथा अपनी प्यारी सी बेटी को अपनी को गला दाबकर मारने
की नियत से घर जाता है,
उसी समय सोहन की बेटी रीमा आकर अपने पिता के गले से लगकर,पिता के गालों को चुमती
है।रीमा के द्वारा अपने गालों को चुमते हुये देखकर सोहन का हृदय द्रवित होता है और फिर वह अपनी बेटी की हत्या करने की बातों को भूल जाता है।इसी बीच रीमा अपने पिता को देखकर प्यार से मुस्कुराती है,जिसके चलते पिता का दिल द्रवित हो जाता है।
विस्तार- आज के समय में समाज में तबाही का मंजर है असामाजिक तत्वों के द्वारा लूटपाट,बलत्कार जैसे मामलों से समाज में जीवन जीना अस्तव्यस्त हो चुका है।इसी बीच
दूर झाड़ी पर एक अर्धनग्न लड़की की लाश जिसे कुत्ते नोंचने का प्रयास कर रहे हैं,तभी उस रास्ते से मोहन तथा सोहन पार हो रहा है।इन दोनों की नजर लाश पर पड़ती है।दोनों झपट्टा मारकर कुत्ते को भगाते हुये अपने कपड़े उतारकर लाश को ढक देते हैं।
मोहन,सोहन से अरे यह तो अपने गाँव के हीरवा की बेटी हैं।कितनी अभागिन थी,जिसे समाज के कुछ दरिदों ने बलत्कार करने के बाद जान मारकर यों ही लावारिश लाश की तरह सुनसान झाड़ी में फेंक दिया।मोहन तथा सोहन बड़ी गौर से उस जलती हुई लाश को देखता है।मोहन,सोहन को कहता है कि, देखते हो मित्र गरीबी क्या होती है,जहाँ पर समाज के दरिदों ने किसी की गरीबी का फायदा उठाकर उसकी बेटी की इज्जत लूटकर उसकी बेरहमी के साथ हत्या कर दी।
सोहन-आह क्या समाज है,ऐसे समाज से क्या उम्मीद कर सकते हो,जहाँ पर सरे आम गरीब गुरूबा लोगों की बेटी की इज्जत लूटकर सरेआम कत्ल कर कर सड़क के बगल में फेंक दिया जाता है।वाह रे जमाना,क्या सरकार है,प्रशासन है,लोगों की
मानसिकता कितनी गिर चुकी है,
लगता है लोगों की मानवता समाप्त हो चुकी है।लोगों का जमीर मिट चुका है।क्या समाज है जहाँ पर धार्मिक संस्थानों में रात में घुसकर किसी साध्वी का बलत्कार कर लिया जाता है।हे
प्रभु ऐसे समय में गरीब गुरूबा लोगों की बेटी का क्या होगा,कैसे समाज में एक गरीब की बेटी जिन्दा रह सकेगी।
सोहन,(मोहन से)मोहन भैया आपने ठीक ही कहा कि जब आज का यह समाज किसी गरीब की बेटी को राह चलते ऊठाकर
बलत्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर झाड़ी में लाश को फेंक देता है तो फिर क्या कहना।
मोहन(सोहन से)क्या सोंच रहे हो सोहन,जाओ तुम्हारे घर में भी एक छोटी सी बच्ची है,क्यों नहीं गला दबा कर उसकी हत्या कर देते हो।सोहन जाओ अपनी छोटी सी बेटी को गला दबा कर मार दो,क्योंकि आगे चलकर जब तुम्हारी भी बेटी का बलत्कार किया जायेगा तब तुम अपने को नहीं संभाल पाओगे।
यह सुनकर सोहन के मन में यह बात उत्पन्न होती है कि क्यों नहीं घर में एकलौती बेटी रीमा को गला दाबकर मार दिया जाय।यह सोंचकर आवेश में सोहन घर जाता है तथा रीमा के सोने के समय की तलाश कर रहा है।तभी रीमा अपने पिता सोहन के बगल में आकर लेट जाती है तथा प्यार से सोहन के सीने से लिपट कर उसके गालों को प्रेम से चूमने लगती है।तभी सोहन के दिल में बेटी के प्रति पिता का प्रेम जागृत होता है तथा अपनी बेटी को बाहों में पकड़कर रोने लगता है।रीमा
अपने पिता जी को कसकर पकड़कर रोने लगती है।
रीमा पापा जी आप क्यों रो रहे हैं,जब मैं बड़ी होकर शादी होने के बाद ससुराल चली जाऊँगी तब आप मुझे बहुत याद आयेंगे।पापा जी आप मेरे कितने सुन्दर पापा हैं,पुनःअपने पिता के गले से लिपट कर सोहन के गालों को चूमने लगती है।यह देखकर सोहन का हृदय द्रवित हो जाता है
और वह अपनी बेटी को गले से लगाकर रोने लगता है।
इस लघुकथा के लेखक होने के नाते लगता है कि आखिर आज के समय में लगातार बढ़ रही
बलत्कार जैसी विकृत मानसिकता जिसके कारण नित प्रतिदिन समाज की अनेकों लड़कियों को बलत्कार की बलिवेदी पर चढ़ना पड़ता है। इसके क्या कारण हो सकते हैं,
तो मुझे लगता है कि इसका पहला मूल कारण अशिक्षा है, दूसरा”Digital India”में लगातार बच्चों को जिस प्रकार से प्रभावित किया है,जिससे कि सभी उम्र के लोग इससे प्रभावित हुये है।तीसरा कारण है कि बहुत सारे लोग काम करने के बाद के समय में”ऑन लाइन”मोबाइल से तरह-तरह की चीजें देखकर बहुत
समय कुछ अप्रिय घटना को भी अंजाम दे देते हैं।इस प्रकार देखते हैं कि नित्य नई-नई बलत्कार से संबंधित घटनायें होती है जिसे सरकार रोक पाने में असमर्थ महसूस करती है।
इन कुछ समस्याओं के संबंध में विचार करने पर मुझे लगा कि
यदि”Live in relationship”में यदि रोजगार करने वाले लोग जीवन जीयें तो कुछ हद तक बलत्कार जैसी घृणित कृत्य को रोका जा सकता है।इसके अलावे बच्चों के पाठ्यक्रम में यौन संबंधी बातों को जोड़ा जाना चाहिये।तीसरा “Digital India”में दिखाये जाने
वाले कुछ चीजों पर सेंसर किया जाना चाहिये।साथ ही शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया जाना चाहिये,तभी समाज में”बेटी की मुस्कुराहट”देखी जा सकती है।क्योंकि आज भी साधारण तथा गरीब गुरूबा लोगों को लगता है कि पता नहीं हम गरीबों की बेटी इस संसार में मुस्कुरा पायेगी या नहीं।इसलिये समाज में”बेटी की मुस्कुराहट देखने को मिलती ही रहे इसलिये
समाज के विकृत मानसिकता वाले लोगों के सोच में परिवर्तन लाने की जरूरत है।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार “विनोद” प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा(बाँका)

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