मौन प्रेम -कंचन प्रभा - गद्य गुँजन

मौन प्रेम -कंचन प्रभा

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बहुत ही सुन्दर गाँव था। गाँव में काफी खूबसूरत वातावरण था। कल कल करती नदियाँ बह रही थी। हरे-भरे पेड़ पथिकों को चिलचिलाती गर्मी से राहत दिया करते थे।

खेतों में लहलहाते फसल किसी दुल्हन का घूँघट लगती थी। उसी गाँव में मीना अपने पिता के साथ रहती थी। उसके पिता उसी गाँव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। उसके पिता मीना को मनहूस मानते थे क्योंकि उसकी माँ उसको जन्म देने समय ही गुजर गई थी। पिता जी उससे बहुत बुरा व्यवहार करते थे। मीना हमेशा चुप-चुप रहा करती थी और माँ को याद करती रहती थी। एक दिन वो अपने रसोई में रोटी पका रही थी तभी उसने देखा की सामने वाले घर में जो बरसों से बन्द था उसका आज ताला खुला था और एक बूढ़ी साफ़-सफाई में लगी थी। उसी समय एक लड़का वहाँ आया और बूढ़ी के हाथों से झाड़ू ले कर खुद सफाई में लग गया। उसे आश्चर्य लग रहा था कि इतने दिनों के बाद इस घर में कौन आ गया। खैर धीरे धीरे धीरे आव-भाव से उसे समझ आ गया कि ये लोग इस घर में नये आये हैं।

 एक दिन गाँव के कुछ बच्चे शाम में मीना के घर के सामने खेल रहे थे तभी किसी बच्चे को चोट लग गई ,बच्चा रोने लगा। इतने में मीना दौड़ कर आई और उस बच्चे को गोद में उठा लिया और जहाँ चोट लगी थी सहलाने लगी। बच्चा भी चुप हो गया। यह सब उस नये पड़ोस में आई बूढ़ी देख रही थी। वो भी टहलते हुये वहाँ आ गई और मीना से उसका नाम पुछा और बात करने लगी। धीरे-धीरे दोनों में खुब बातें होने लगी।अब जब भी मौका मिलता मीना उस बूढ़ी के घर जा कर उसके कामों में सहायता करने लगी। मीना को पता चला कि ये घर बूढ़ी के किसी रिश्तेदार की है जो बड़े शहर जाने समय मकान इन लोगों को दे गया। और वो लड़का जिसका नाम नीरज था वो उस बूढ़ी का पोता था। धीरे-धीरे मीना से उन दोनों का लगाव बढ़ने लगा। मीना के पिता को इस सब बातों से कोई मतलब नहीं था वो बस घर में जरूरत की बातें ही मीना से करते और खुद के कामों में व्यस्त रहते थे। मीना भी उस बूढ़ी को दादी कह कर पुकारने लगी और पिता जी के विद्यालय जाने के बाद पूरे दिन अब उसका समय दादी के घर में ही बीता करता। इन सब के बीच मीना को कब नीरज अच्छा लगने लगा उसे पता ही नहीं चला लेकिन वह ये बात किसी को नहीं बताई मन ही मन बस नीरज के साथ बिताये पल को सोचती रहती। उसके यादों में खोई रहती।उसकी कोई सहेली भी नही थी जिससे वो ये सब बाते करती। इसी बीच उसे पता चला की नीरज को गाँव में ही एक दुकान में नौकरी लग गई है अब तो वह सुबह दुकान चला जाता और रात में घर लौटता। मीना को अब उससे मिलना कम हो गया जिससे वो बेचैन रहती थी। उसकी बातों से धीरे-धीरे दादी को उसके मन की बात समझ मे आने लगी थी और दादी ने विचार किया कि नीरज से वो इस विषय पर बात करेगी क्योंकि दादी को भी मीना बहुत पसंद थी पर अभी वो मीना को कुछ भी नहीं बताई। शाम हो गई थी मीना भी दादी और नीरज का खाना बना कर अपने घर चली गई । लगभग आधी रात में मीना के घर से तेज आवाजें आने लगी। नीरज चिल्लाते हुए दादी से बोल रहा था ''दादी उठो दादी क्या हुआ तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही।" काफी रात थी इस लिये मीना अपने पिता जी को उठाई और बताया कि ''शायद दादी की तबीयत ठीक नहीं है आप उनकी मदद किजीये।" पर पिता तो मीना की कोई भी बात पर ध्यान ही नहीं देते थे अत: वो नहीं उठे। मीना मजबूर हो कर खुद ही दौड़ पड़ी। वहाँ पर पहुंच कर जो नजारा उसने देखा वो सन्न रह गई। उसके पाँव के नीचे की जमीन खिसक रही थी। दादी बिस्तर पर उल्टी सांसे ले रही थी और नीरज बगल में बैठा दादी का हाथ थामे रो रहा था।

मीना भी करीब गई पर तब तक दादी के प्राण निकल चुके थे। नीरज रोते हुए आस पास के लोगों को बुला लाया। सभी दादी की मौत से सन्न थे। खैर अब जिसे जाना है उसे कोई रोक नहीं सकता।

 दादी की मौत के बाद नीरज काफी उदास रहने लगा। मीना को उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती पर वो क्या करती। उसके लिये रोज खाना बना कर दे देती और कभी कभी थोड़ा समझा देती कि किसी के जाने से जिन्दगी खत्म नहीं होती।

  मीना के मन में उसका नीरज के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा था पर वो बता नहीं पा रही थी बस उसका पूरा ख्याल रखती थी।

  इधर मीना के पिता उसके लिये लड़का खोजने लगे। जब उसे इस बात का पता चला तो वो और भी चिंतित हो गई और दादी को याद करने लगी।

नीरज भी धीरे धीरे अपनी दिनचर्या में लग गया। वो दुकान से लौटने के बाद गाँव के कुछ बच्चों को पढ़ा दिया करता जिससे उसका मन बहल जाता था।

मीना धीरे-धीरे मन बनाने लगी की वो नीरज से बात करेगी।

आज सावन का पूर्णिमा है गाँव में चारों ओर चहल पहल है। सभी मेले जाने की तैयारी कर रहे है। आज मीना ने नीरज को सुबह ही कहा था कि आज सांझ मेला देखने चलेंगे।

सांझ हुई मीना खुब सुन्दर कपड़े पहने और सिंगार किया आज वो बेहद खुश थी और बार बार आईने के सामने जा कर अभिनय कर रही थी।

” नीरज मैं तुमसे प्रेम करती हूँ क्या तुम भी——” कहती और शर्मा जाती। तभी मीना के पिता आये और मीना को कहा ”कल शाम तुम्हें लड़के वाले देखने आ रहे है तैयार रहना।” सुन कर मीना थोड़ा उदास हो गई लेकिन उसने सोचा कि शायद आज अगर वो नीरज से इजहार नहीं करेगी तो बहुत देर हो जायेगी। वो पिता की बातों में सिर हिला दिया और काम में लग गई। वो नीरज के साथ मेला देखने गई पर पूरे समय वो ज्यादा चुप रही। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उससे बात करने की। बार बार कोशिश करती और बात बदल देती थी। उसका मन मेला में नहीं लग रहा था। काफी देर हो गई आखिर दोनों घर आ गये पर मीना बोल नहीं पाई। रात भर उसे नींद नहीं आई। वो इसी उधेड़ बुन में लगी रही कि कैसे नीरज को बताऊं? अन्त: उसने निर्णय किया कि सुबह जब वो चाय देने जायेगी तो निश्चित ही बात करेगी।

भोर हो चुकी थी सूरज की नई किरण चारों ओर फैल गये। मीना के पिता विद्यालय जा चुके थे ।मीना चाय और नाश्ता बनाया और पूरे विश्वास के साथ नीरज के घर पहुंची। उसने देखा कि नीरज अभी जगा नहीं है। नाश्ता और चाय पास के टेबल पर रखा और उसके कमरे में गई पर वो वहाँ नहीं था तभी आंगन में उसकी नजर पड़ी । नीरज आंगन में चटाई पर उलटी दिशा में मुहं किये लेटा था। मीना खुद को संभालते हुए वहां गई और बोली ” नीरज तुम रात में यहाँ सोये थे शायद गर्मी बहुत थी इस लिये। खैर अब उठो चाय ठंढी हो जायेगी। एक और बात मैं तुमसे कहना चाहती हूँ तुम बुरा मत मानना नीरज उठो ना।” और वो पास जा कर नीरज का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया। ये क्या उसके मुख से झाग निकल रहा था उसका पूरा शरीर नीला हो चुका था। पास ही मिट्टी पर एक मोटे सर्प का केंचुआ पड़ा था। ये सब देख कर मीना के होश उड़ गये।

मीना के प्रेम को एक काले सर्प ने डस लिया था और उसका प्रेम मौन ही रह गया।

कंचन प्रभा
विद्यालय- रा0 मध्य विद्यालय गौसाघाट, दरभंगा
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