नदी का किनारा था। नितांत निर्जन। वहाँ कोई आता-जाता न था। शाम का समय था। पक्षी दल अपने बसेरे की ओर लौट रहे थे। पूर्व दिशा से पूर्ण चाँद धीरे-धीरे अपनी चाँदनी फैलाने लगा था।
बगल के गाँव की शीला रोज नदी के किनारे आकर बैठती थी और घंटों प्रकृति से संवाद करती, खिलखिलाती और लौट जाती। इधर महीनों से वह यहाँ नहीं आई थी।
आज जब चाँद ने अपनी पूरी चाँदनी धरा पर बिछा दी, शीला थके कदमों से नदी किनारे आई और किनारे पड़े एक पत्थर पर बैठकर नदी की ओर अपलक निहारने लगी। उसके बाल बेतरतीब-से उलझे थे और आँखों से बहती अश्रुधारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
आज उसकी बातों में कोई जिज्ञासा नहीं थी, न ही वह खिलखिलाई।
कुछ देर तक वह नदी और उसके आस-पास की प्रकृति को निहारती रही। अचानक वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसके चित्कार से वातावरण की शांति कुछ पल के लिए ठहर गई।
हमेशा प्रफुल्लित रहने वाली इस शीला को आज क्या हो गया था?
नदी बहती रही।
चाँदनी उतरती रही।
पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ सरसराती रहीं।
लेकिन शीला के भीतर जैसे कोई तूफान उमड़ रहा था।
वह दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँककर देर तक रोती रही। फिर उसने नदी की ओर देखा और धीमे स्वर में बोली—
“तुम तो सब जानती हो न, नदी? मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं छिपाया। फिर आज मैं तुमसे अपना दुःख कैसे छिपाऊँ?”
नदी ने कोई उत्तर नहीं दिया। पर उसकी लहरें किनारे से टकराकर जैसे कोई पुराना गीत गा रही थीं।
शीला ने आँखें बंद कर लीं।
उसे वे दिन याद आने लगे जब वह छोटी थी। यही नदी उसके बचपन की सबसे बड़ी सहेली थी। गर्मियों की दोपहर में वह अपनी सहेलियों के साथ यहाँ आती। बरसात में नदी को उफनते देखती और माँ से पूछती—
“माँ, नदी इतनी गुस्से में क्यों है?”
माँ हँसकर कहती—
“नदी गुस्सा नहीं करती बेटी, वह अपना रास्ता खोजती है।”
तब शीला को माँ की बात समझ नहीं आती थी।
आज समझ आ रही थी।
इंसान भी शायद नदी जैसा ही होता है। जब रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तो वह या तो टूटता है या फिर अपना नया रास्ता बनाता है।
और शीला के रास्ते भी पिछले कुछ महीनों से बंद कर दिए गए थे।
शीला गाँव की उन लड़कियों में थी जिसे पढ़ने का बहुत शौक था। उसके पिता किसान थे। घर में साधन सीमित थे, लेकिन पिता ने कभी उसकी पढ़ाई नहीं रोकी।
“बेटी पढ़ेगी,” वे कहा करते थे, “तो हमारा घर ही नहीं, पूरा गाँव पढ़ेगा।”
शीला ने पढ़ाई पूरी की और गाँव के बच्चों को पढ़ाने लगी। उसके लिए शिक्षक होना नौकरी नहीं, जिम्मेदारी थी।
वह बच्चों से कहती—
“किताब सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए मत पढ़ो। किताब तुम्हें यह सिखाए कि अच्छा इंसान कैसे बनना है।”
गाँव के बच्चे उसे बहुत प्यार करते थे।
लेकिन कुछ महीनों पहले गाँव में एक घटना हुई जिसने शीला की जिंदगी बदल दी।
नदी के किनारे रात-दिन अवैध रूप से बालू निकाली जाने लगी। बड़े-बड़े ट्रैक्टर और मशीनें नदी के पेट को खोदने लगीं। गाँव के कुछ प्रभावशाली लोग इस काम में शामिल थे।
पहले नदी का किनारा सुंदर था। वहाँ पीपल, नीम और कदंब के पेड़ थे। पक्षियों के घोंसले थे। मछलियाँ थीं। बरसात में नदी भरती तो खेतों को पानी मिलता।
धीरे-धीरे नदी का स्वरूप बदलने लगा।
किनारे कटने लगे।
पेड़ गिरने लगे।
पानी गंदा होने लगा।
और एक दिन गाँव के पास का पुराना पुल कमजोर होकर टूट गया।
उसी दिन शीला का छोटा भाई निखिल शहर से लौट रहा था।
वह नदी पार करने की कोशिश में तेज धारा में बह गया।
बहुत खोजा गया।
लेकिन निखिल नहीं मिला।
उस दिन शीला पहली बार नदी से नाराज़ हुई थी।
वह नदी किनारे बैठकर चीखी थी—
“तुमने मेरा भाई क्यों ले लिया?”
फिर उसे अचानक पिता की कही बात याद आई—
“नदी गुनहगार नहीं होती बेटी। गुनहगार वे हाथ होते हैं जो प्रकृति का गला घोंटते हैं।”
शीला ने उसी दिन तय कर लिया कि वह चुप नहीं बैठेगी।
उसने गाँव वालों को इकट्ठा किया। पंचायत में आवाज उठाई। अधिकारियों को आवेदन दिए। बच्चों के साथ नदी बचाओ अभियान शुरू किया।
लेकिन उसके सामने एक बड़ी दीवार थी—स्वार्थ और डर की दीवार।
कुछ लोगों ने उसे समझाया—
“तुम एक लड़की होकर इन बड़े लोगों से टकराओगी?”
किसी ने कहा—
“घर संभालो। समाज सुधारने का ठेका मत लो।”
किसी ने धमकी दी—
“बहुत बोलोगी तो अच्छा नहीं होगा।”
और सबसे दुखद बात यह थी कि गाँव के कुछ लोग, जो सब कुछ जानते थे, डर के कारण चुप रहे।
शीला लड़ती रही।
फिर एक दिन उसके पिता भी चल बसे।
लगातार संघर्ष, भाई का दुःख और पिता की मृत्यु—इन तीनों ने उसे भीतर तक तोड़ दिया।
वह गाँव छोड़कर शहर चली गई।
महीनों तक वह वापस नहीं आई।
लेकिन आज वह लौट आई थी।
उसी नदी के किनारे।
रात गहरी हो रही थी।
शीला ने अपने आँसू पोंछे और नदी के पास झुककर पानी को हाथों में भर लिया।
पानी पहले जैसा निर्मल नहीं था।
उसने मुट्ठी खोली।
पानी उसकी उँगलियों के बीच से फिसल गया।
शीला मुस्कराई।
“तुम भी तो यही कह रही हो न? जो हाथ में है, उसे हमेशा बाँधकर नहीं रखा जा सकता।”
तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
शीला ने पलटकर देखा।
गाँव का बूढ़ा रामदीन काका खड़ा था।
“तू यहाँ है बेटी?”
शीला ने कुछ नहीं कहा।
काका धीरे-धीरे उसके पास आकर बैठ गए।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर काका बोले—
“तेरे बाबूजी कहते थे, शीला नदी जैसी लड़की है।”
शीला ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
“नदी जैसी?”
“हाँ,” काका मुस्कराए, “रास्ते में कितने भी पत्थर आएँ, नदी रुकती नहीं।”
शीला की आँखें फिर भर आईं।
“काका, मैं थक गई हूँ।”
“थकना बुरा नहीं है बेटी। रुक जाना बुरा है।”
शीला ने नदी की ओर देखा।
काका ने जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज निकाला और उसके हाथ में रख दिया।
“यह क्या है?”
“गाँव के बच्चों ने लिखा है।”
शीला ने कागज खोला।
उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“शीला दीदी, नदी को बचाइए। हम फिर से नदी किनारे खेलना चाहते हैं।”
शीला देर तक उस कागज को देखती रही।
फिर उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन इस बार वे आँसू बेबसी के नहीं थे।
उनमें संकल्प था।
अगली सुबह गाँव में एक अजीब दृश्य दिखाई दिया।
शीला घर-घर जा रही थी।
उसने किसी को दोष नहीं दिया।
किसी से लड़ाई नहीं की।
बस एक ही सवाल पूछा—
“क्या हम अपने बच्चों के लिए नदी बचाना चाहते हैं?”
पहले लोग चुप रहे।
फिर एक किसान बोला—
“हाँ।”
दूसरा बोला—
“हम क्या कर सकते हैं?”
शीला ने कहा—
“सब कुछ।”
उसने गाँव के बच्चों, महिलाओं, किसानों और युवाओं की एक टोली बनाई—‘नदी मित्र दल’।
उन्होंने नदी किनारे सफाई शुरू की।
जहाँ अवैध खनन हुआ था, वहाँ पौधे लगाए।
स्कूल में बच्चों को नदी और पर्यावरण के बारे में पढ़ाया।
गाँव की महिलाओं ने तय किया कि वे नदी में कूड़ा नहीं फेंकेंगी।
किसानों ने रासायनिक अपशिष्ट नदी में न जाने देने का संकल्प लिया।
युवाओं ने प्रशासन को सामूहिक शिकायत भेजी।
और सबसे महत्वपूर्ण—गाँव के लोगों ने डर के बजाय एकता को चुना।
जब फिर से रात में बालू निकालने वाली मशीनें नदी किनारे पहुँचीं, इस बार वहाँ अकेली शीला नहीं थी।
पूरा गाँव खड़ा था।
बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ, किसान, शिक्षक—सब।
शीला ने किसी से लड़ाई नहीं की। उसने केवल मोबाइल से तस्वीरें और वीडियो बनाए और संबंधित अधिकारियों को भेज दिए।
उसने कहा—
“हम कानून अपने हाथ में नहीं लेंगे। लेकिन कानून को अपना काम करने से रोकने भी नहीं देंगे।”
यह बात गाँव के लोगों के मन में उतर गई।
कुछ ही दिनों में प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी।
अवैध खनन पर रोक लगी।
नदी का किनारा सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया।
गाँव के लोगों ने मिलकर नदी के दोनों किनारों पर वृक्षारोपण शुरू किया।
लेकिन शीला यहीं नहीं रुकी।
उसने कहा—
“नदी केवल पानी की धारा नहीं है। नदी हमारी सभ्यता है। अगर नदी बची तो खेत बचेंगे, जंगल बचेंगे, पशु-पक्षी बचेंगे और हमारा भविष्य बचेगा।”
एक वर्ष बीत गया।
बरसात आई।
इस बार नदी फिर से भरने लगी।
उसके किनारे नए पौधे लहलहाने लगे।
पक्षियों ने लौटकर फिर से घोंसले बनाए।
मछलियाँ दिखाई देने लगीं।
गाँव के बच्चों की हँसी फिर नदी किनारे सुनाई देने लगी।
और एक शाम—
उसी पूर्णिमा की रात—
शीला फिर उसी पत्थर पर बैठी थी।
चाँद आकाश में था।
नदी चाँदनी को अपने भीतर समेटकर बह रही थी।
शीला ने मुस्कुराकर नदी से कहा—
“देखो, मैं लौट आई।”
हवा ने उसके बालों को छुआ।
पेड़ों की पत्तियाँ झूम उठीं।
नदी की लहरें किनारे से टकराईं।
ऐसा लगा जैसे नदी कह रही हो—
“तुम नहीं लौटी शीला… तुमने मुझे लौटा दिया है।”
शीला की आँखें भर आईं।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
तभी पीछे से बच्चों का शोर सुनाई दिया—
“शीला दीदी!”
वह पलटी।
दर्जनों बच्चे हाथों में छोटे-छोटे पौधे लिए खड़े थे।
एक बच्चा बोला—
“दीदी, आज आपने हमें कहानी सुनाने का वादा किया था।”
शीला हँस पड़ी।
“कौन-सी कहानी?”
बच्चे एक स्वर में बोले—
“नदी की!”
शीला ने उन्हें अपने पास बैठाया।
कुछ देर नदी को देखती रही।
फिर बोली—
“आज मैं तुम्हें नदी की नहीं, इंसान की कहानी सुनाऊँगी।”
एक बच्चे ने पूछा—
“किस इंसान की?”
शीला ने मुस्कुराकर कहा—
“उस इंसान की जो समझता है कि समाज को बदलने के लिए किसी बड़े पद की जरूरत नहीं होती। एक सच्चा विचार, एक साहसी कदम और कुछ अच्छे लोगों की एकजुटता ही काफी होती है।”
बच्चे ध्यान से सुनने लगे।
शीला ने आगे कहा—
“याद रखना, अन्याय हमेशा इसलिए ताकतवर नहीं होता कि उसके पास ताकत होती है। कई बार वह इसलिए ताकतवर हो जाता है क्योंकि अच्छे लोग चुप हो जाते हैं।”
एक बच्ची ने पूछा—
“तो हमें क्या करना चाहिए?”
शीला ने उसकी हथेली में एक छोटा-सा पौधा रख दिया।
“जहाँ अन्याय दिखे, वहाँ सच का साथ देना। जहाँ गंदगी दिखे, वहाँ सफाई करना। जहाँ निराशा दिखे, वहाँ उम्मीद जगाना। और जहाँ कोई अकेला लड़ रहा हो, वहाँ उसके साथ खड़े हो जाना।”
बच्ची ने पौधे को सीने से लगा लिया।
शीला ने आकाश की ओर देखा।
पूर्ण चंद्रमा पहले से अधिक उजला लग रहा था।
उसने मन ही मन पिता को याद किया।
“बाबूजी, आपने कहा था न—बेटी पढ़ेगी तो गाँव पढ़ेगा। आपने यह नहीं कहा था कि बेटी अकेली लड़ेगी। आपने शायद यह भी चाहा था कि एक दिन पूरा गाँव साथ खड़ा होगा।”
उसकी आँखों से दो बूँद आँसू गिरे।
इस बार नदी ने उन्हें अपने भीतर समेट लिया।
समय बीतता गया।
नदी किनारे बना वह छोटा-सा ‘नदी मित्र दल’ आगे चलकर पूरे जिले का अभियान बन गया।
लोग दूसरे गाँवों से सीखने आने लगे।
जहाँ पहले लोग कहते थे—
“हम अकेले क्या कर सकते हैं?”
अब वही लोग कहते थे—
“हम सब मिलकर क्या नहीं कर सकते?”
शीला ने गाँव में एक पुस्तकालय भी खुलवाया।
उसका नाम रखा गया—“निखिल ज्ञानालय”।
वह चाहती थी कि उसका भाई केवल उसकी स्मृतियों में न रहे, बल्कि गाँव के बच्चों के सपनों में जीवित रहे।
वहाँ पर्यावरण, संविधान, विज्ञान, साहित्य और समाज से जुड़ी किताबें रखी गईं।
हर वर्ष निखिल की पुण्यतिथि पर कोई शोकसभा नहीं होती।
उस दिन गाँव के बच्चे पौधे लगाते, नदी की सफाई करते और एक संकल्प लेते—
“हम अपने गाँव, अपने समाज और अपने देश को बेहतर बनाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाएँगे।”
शीला हमेशा कहती—
“देश केवल संसद में नहीं बनता। देश हमारे घर, हमारे स्कूल, हमारे खेत, हमारी सड़क, हमारे गाँव और हमारी सोच में बनता है।”
कई वर्षों बाद जब कोई उस गाँव में जाता, तो उसे विश्वास नहीं होता कि यही वह जगह है जहाँ कभी नदी का किनारा उजड़ गया था।
अब वहाँ हरियाली थी।
बच्चों के खेलने का मैदान था।
एक छोटा पुस्तकालय था।
नदी किनारे बैठने के लिए पत्थर की चौकियाँ थीं।
और सबसे खास बात—वहाँ लोगों के चेहरों पर यह विश्वास था कि वे अपने समाज के भाग्य के केवल दर्शक नहीं, निर्माता भी हैं।
एक दिन शहर से आए एक पत्रकार ने शीला से पूछा—
“आपने इतना बड़ा परिवर्तन कैसे कर दिया?”
शीला कुछ क्षण चुप रही।
फिर नदी की ओर देखते हुए बोली—
“मैंने कुछ नहीं किया।”
पत्रकार चौंका।
“कुछ नहीं किया?”
शीला मुस्कुराई।
“मैंने सिर्फ लोगों को उनकी अपनी ताकत याद दिलाई है। नदी को बचाने का काम नदी ने नहीं, गाँव ने किया है। और गाँव को बदलने का काम किसी एक व्यक्ति ने नहीं, लोगों की सामूहिक इच्छा ने किया है।”
पत्रकार ने पूछा—
“और आपकी सबसे बड़ी सीख?”
शीला ने उत्तर दिया—
“जब कोई व्यवस्था गलत हो जाए तो उसे कोसने से पहले अपने हिस्से का दीपक जलाइए। अँधेरा कितना भी बड़ा हो, रोशनी की शुरुआत हमेशा एक छोटे दीपक से होती है।”
सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।
नदी पर सुनहरी आभा फैल रही थी।
कुछ बच्चे किनारे पौधे लगा रहे थे।
कुछ महिलाएँ सफाई कर रही थीं।
युवा नदी की निगरानी कर रहे थे।
और शीला उसी पुराने पत्थर पर बैठी मुस्कुरा रही थी।
कभी इसी पत्थर पर बैठकर उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा दुःख रोया था।
आज उसी पत्थर पर बैठकर वह पूरे गाँव की सबसे बड़ी खुशी देख रही थी।
नदी बह रही थी।
चाँद फिर उगने वाला था।
और शीला समझ चुकी थी—
दुःख हमें तोड़ने नहीं, कभी-कभी हमारे भीतर छिपी हुई शक्ति को जगाने आता है।
जिस दिन इंसान अपने दुःख को केवल अपना दुःख मानना छोड़ देता है और उसे समाज के लिए संवेदना, संघर्ष और परिवर्तन में बदल देता है, उसी दिन उसकी जिंदगी का अर्थ बदल जाता है।
शीला ने नदी की ओर देखा।
लहरों पर चाँद की पहली किरण उतर चुकी थी।
उसने धीरे से कहा—
“अब तुम अकेली नहीं हो।”
नदी बहती रही।
चाँदनी फैलती रही।
और उस रात नदी के किनारे सिर्फ एक लड़की नहीं बैठी थी—
वहाँ एक विचार बैठा था।
एक संकल्प बैठा था।
एक पूरा समाज बैठा था।
और उस संकल्प की रोशनी दूर तक फैल रही थी।
क्योंकि बदलाव कभी भीड़ से नहीं, जागे हुए मन से शुरू होता है।
और जब जागा हुआ मन दूसरे जागे हुए मनों से जुड़ जाता है, तो एक छोटी-सी नदी भी पूरे समाज की दिशा बदल सकती है।
— रेणु रंजन