5 अक्टूबर, 2026 के अवसर पर
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शिक्षक बने प्रेरणास्रोत
आलेख: गिरीन्द्र मोहन झा(स्वरचित)
आज गुरु और शिक्षक शब्द एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं।
गुरु शब्द का अर्थ है – भारी । जो ज्ञान, अनुभव, विद्वत्ता और ईश्वरीय साधना में उच्चतर हो, वही गुरु है।
…….गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ प्रकाश । अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरु होते हैं।
……शिक्षकों को अपने विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत (role model) बनना चाहिए।
…… परमात्मा को परमगुरु कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता जैसा महान उपदेश देने के कारण भगवान श्रीकृष्ण को जगद्गुरु कहा गया है – कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से हम सबको प्रेरणा मिलती है।
……आदि शंकराचार्य ने दक्षिणामूर्ति स्तोत्र में भगवान दक्षिणामूर्ति (शिव) को गुरु मानते हुए लिखा है –
चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धा: शिष्या गुरुर्युवा ।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशया: ।।
(आश्चर्य तो यह है कि उस वटवृक्ष के नीचे सभी शिष्य वृद्ध हैं और गुरु युवा हैं। साथ ही गुरु का व्याख्यान भी मौन भाषा में है, किन्तु उसी से शिष्यों के संशय नष्ट हो रहे हैं।) अर्थात् गुरु अथवा शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि वे शिष्यों अथवा विद्यार्थियों के सभी संशयों को समाप्त करें और जिज्ञासाओं को संतुष्ट करें ।
…… शिक्षक अथवा गुरु का कर्त्तव्य है कि वे विद्यार्थियों के सामने अपने व्यक्तित्व, कृति एवं कृतित्व से प्रेरणास्रोत या रोल माडल बने ।
……. कर्त्तव्यपरायणता और कार्यकुशलता से कोई भी व्यक्ति महान बन जाता है।
….….निरंतर श्रेष्ठता का वरण, निरंतर अध्ययनशीलता, कर्त्तव्यपरायणता और कार्यकुशलता जैसे गुणों को आत्मसात् करने से कोई शिक्षक प्रेरणास्रोत बन सकते हैं।
शिक्षक के तीन प्रमुख गुण हैं –
- विषय का गंभीर ज्ञान (content knowledge)
- सम्प्रेषण कौशल(communication skill)
- शिक्षण-शास्त्र(pedagogy)
……इन तीनों गुणों को आत्मसात् करने की आवश्यकता है।
…… विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन का पाठ पढ़ाना शिक्षक का ही दायित्व है।
……यदि शिक्षक कक्षा में अच्छे ढंग से शिक्षण-कार्य करते हैं, विषय-ज्ञान देते हैं, content deliver करते हैं तो विद्यार्थी अनुशासित रहते हैं।
कबीरदास के शब्दों में,
गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट ।
अन्तर हाथ सहारा दे, बाहर बाहै चोट ।।
……शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि वे विद्यार्थियों को उनके स्तरों से ऊपर ले जाएं, न कि कभी नीचे ले जाएं ।
……शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि वे विद्यार्थियों को कहीं से भी सद्गुण ग्रहण करने, बुराई को छोड़ देने और अच्छा सीखने की प्रेरणा दे ।
शिक्षक उन्हें बताएं कि
अच्छी शिक्षा तथा ज्ञान, जहाँ से भी मिले, थोड़ा झुककर ही सही, अवश्य ग्रहण कर लेना चाहिए।
Never stop self-making and self- educating.
(स्वयं का निर्माण और स्वयं को शिक्षित करना कभी न छोड़ें)
तीन चीजें कभी नहीं हारनी या खोनी चाहिए – धैर्य, धर्म और साहस ।
विपरीत परिस्थितियों से घबराएं नहीं। विपरीत परिस्थितियों में धैर्यपूर्वक अवसर निकालें और उद्योगपूर्वक कर्मशील रहें ।
जीवन और नौकरी का एक ही नियम है – Try for best, ready for worst.(सर्वोत्तम के लिए प्रयास और विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार) आदि ।
……शिक्षक विद्यार्थियों के भीतर हर चीज में संभावनाएं देखने की दृष्टि जगाए और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शिक्षा दे ।
शिक्षक का कर्त्तव्य है कि वे अपने विद्यार्थियों को विषय-ज्ञान देने के साथ उसमें छिपे प्रतिभा और गुण को उसे दिखा दे, उसके दृष्टि(vision) को उसे बता दे । वह स्वयं बेहतर होते और बेहतर करते चले जाएगा, साथ ही साथ समय-समय पर उसका मार्गदर्शन करे ।
“पत्थर को तराशकर हीरा ही नहीं बनाता गुरु, दुनिया में हीरा को चमकाने का कार्य भी करता है गुरु ।”
……. शिक्षक ही विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा और विधा को परखकर उन्हें दृष्टि(vision) प्रदान करते हैं, जिनके आधार पर विद्यार्थी अपने लक्ष्य का निर्धारण करता है और अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति की दिशा में निरंतर अभ्यास और दृढ़संकल्प प्रयास करता है।
……शिक्षक का दायित्व है कि वह विषय-वस्तुओं को विद्यार्थियों के मन के अनुरूप रोचक बनाएं और विद्यार्थियों को अपने पाठ्य-बिन्दुओं की ओर आकृष्ट करे ।
शिक्षकों की दृष्टि (vision) श्रेष्ठ, उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण(scientific temperament), वैज्ञानिक व तार्किक सोच हो, ये सब गुण वे विद्यार्थियों में भी पैदा करे । शिक्षक विद्यार्थियों में जिज्ञासु प्रवृत्ति और नया सीखने और कुछ नया करने की ललक पैदा करे । उन्हें बार-बार प्रोत्साहित और प्रेरित करे । उन्हें प्रश्न पूछने- किताबें पढ़कर सार्थक प्रश्न पूछने की प्रेरणा दे और उनके प्रश्नों का उत्तर खोजकर उन्हें संतुष्ट करे ।
शिक्षक का कर्त्तव्य व दायित्व है कि वे विद्यार्थी को औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक एवं व्यवहारिक शिक्षा दे, ताकि वह समाज का सभ्य एवं सच्चरित्र मनुष्य और राष्ट्र का सभ्य नागरिक बन सके ।
Great teachers are not one who only teach, but one who inspire the students to learn.(महान शिक्षक केवल पढाते नहीं, वे विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।)
आज का समय अर्थयुग हो गया है। शिक्षक का कर्त्तव्य है कि आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने और कैरियर में उत्तम से उत्तम जगह प्राप्त करने के लिए उसके भीतर कौशल का विकास कराएं।
शिक्षक सीढ़ी के समान होते हैं। छत तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों की आवश्यकता होती है। सीढ़ियों के बिना छत तक नहीं पहुंचा जा सकता है।
“समाज और राष्ट्र की धूरी होते हैं शिक्षक”
“ध्यान रहे, छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन पर ही शिक्षकों एवं शिक्षकों एवं विद्यालय-महाविद्यालय की छवि निर्भर करती है।
…… शिक्षकों का व्यक्तित्व, कृति और कृतित्व इस प्रकार होने चाहिए कि वे अपने विद्यार्थियों के प्रेरणास्रोत – रोल माडल बन सके।
…….गिरीन्द्र मोहन झा(स्वरचित)