आश्रयदाता पेड़ और पिता-सुरेश कुमार गौरव - गद्य गुँजन

आश्रयदाता पेड़ और पिता-सुरेश कुमार गौरव

Suresh

Suresh

आश्रयदाता पेड़ और पिता

          बचपन में जब भी मन करता मैं टिफिन टाईम स्कूल परिसर के बाहर स्थित काफी पुराना किंतु हरे-भरे ईमली के पेड़ पर चढ़ जाता तो कभी जलेबी के पेड़ पर चढ़ जाता और दोस्तों संग कभी कच्चे ईमली खाता तो कभी जलेबी के मीठे फल। कभी डाली पर बैठ झूलता तो कभी पेड़ के नीचे छांव में बैठ रहता। इसी तरह बचपन की पढ़ाई के साथ-साथ खट्ठी-मीठी हमारी दुनिया थी। उस समय गांधी सरोवर मध्य विद्यालय का छात्र था। खास सहपाठी मित्रों वीरेन्द्र, दीपक, धर्मेन्द्र, जग़न्नाथ, संजय, मोहन आदि के साथ दिन मस्ती में कट रहे थे और पेड़ सब भी मानो खुशी से झूल और झूम रहे थे जैसे लगता था यह स्थिति अनंत काल तक रहने वाली है।
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थोड़ा और बड़ा हुआ तो देखा पेड़ उसी गति से झूल और झूम रहा था। एक दिन स्कूल जाने की बेला में घर से निकला तो देखा ईमली का विशाल पेड़ गिरा पड़ा है। पता चला रात में आई आंधी पेड़ सहन नहीं कर पाया और बरसों पुराना यह पेड़ जड़ सहित धरती पर गिर पड़ा है। मैं हाथ में बस्ता लिए स्कूल जाना चाह रहा था लेकिन यह पेड़ मुझे जाने ही नहीं दे रहा था। मैं सोच में पड़ गया था – “पेड़ खड़ा था तो चढ़ने से और फल तोड़ने से भी नहीं रोकता था मानो पिता जैसे कंधे और पीठ पर घोड़े बन जाते वैसे यह भी तो मुझे वैसे ही महशूस कराते और आनंद देते थे। कितना अच्छा था यह दानी पेड़”!
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मैं रोज स्कूल आता-जाता देखता उस पेड़ को कि कैसे उसकी एक-एक डाली को लोग तोड़ रहे थे। हमारे मित्र मंडली में से एक ने मुझसे कहा- देखो तो ! ‘पेड़ की डाली से दूध टपक रहा है’। मुझसे रहा नहीं गया।मुझे लगा उसकी शाखा (बांह) से खून टपक रहा है। मेरी व्यथा को मेरे मित्र समझ गए थे। उसने कहा- “अब किया क्या जा सकता है? अब तो पेड़ गिर गया और मर भी गया चलो स्कूल।” 🌿🍀🌷🌱

कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। उस पेड़ को काट-काटकर गट्ठर बना-बनाकर नगर निगम वाले गाड़ी पर आते और ले जाते। जब पेड़ का मुख्य स्तंभ शाखा को आरी से काटा जाता तो मेरी बेचैनी और बढ़ जाती। मैनें काटने वाले से उस दिन पूछ ही लिया था- चाचा जी!” इसे काट क्यों रहे हो?” उन्होंने कहा “इस पेड़ की इस मुख्य शाखा से कुछ न कुछ काम लिए जाएंगें बेटा, जाओ यहां समय बर्बाद मत करो।”
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एक समय ऐसा आया की पेड़ की जगह जमीन समतल हो गई थी। मैं चुपचाप घर आया और पेड़ की ऐसी दुर्दशा पर सोचते जा जरा था। कितना दानी था पेड़। उस बालपन में और बालमन को पहली बार पता चला था कि एक पिता और पेड़ में कितना अंतर होता है।
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आज सोचता हूं तो लगता है परिवार की कहानी है। पिता ही पेड़ हैं। बचपन में हम उनकी पीठ पर बैठकर खेलते थे। फिर मेरे जीवन संसाधनों की पूर्ति के लिए अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ते थे। उनकी स्नेहभरी बाहें लपक कर गोद और छाती से चिपका लेती थीं।
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आज एक पिता के चरित्र में कभी संसाधनों से, कभी मूक योगदान से तो कभी जीवन के इस चरित्र के अकाट्य सत्य को पूरा करने में लगा हुआ हूं। यही जीवन है और जीवन कर्म भी।💝🙏

सुरेश कुमार गौरव

पटना (बिहार)

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