बापू की कहानी दादा जी की जुबानी-भोला प्रसाद शर्मा - गद्य गुँजन

बापू की कहानी दादा जी की जुबानी-भोला प्रसाद शर्मा

बापू की कहनी दादा की जुबानी

दादा जी, प्रणाम!
खुश रहो लल्ला, खुश रहो।
क्या हाल समचार है दादा जी आपसे मिले तो बहुते दिन हो गया। समझ में नहीं आ रहा है कि हम लोगों का दिन कैसे बीतेगी।

जी हाँ
लल्ला! ये सब तो ऊपर वाले की ही महिमा है। तो होगा भी क्यों नहीं, अब किसी को
फ़ुरसत ही कहाँ है कि जो किसी अपने से दो-चार बातें कर ले। सब अपने व्यस्तता में इतने लीन है कि अपना परिवेश, अपना परिवार यहाँ
तक की ईश्वर के प्रति आस्था भी मानवों में घटने लगे हैं।
हाँ लल्ला ये सब तो है, पर क्या करोगे, यह तो
दुनिया की रीत है। समय के अनुसार सब में बदलाव भी जरुरी है। दादा जी, कह रहे
थे कि आपसे किस्से-कहानियाँ सुने अर्से बीत गये, तो मेरे मन में कुछ बातें खटक रही है। तो उसमें से थोड़ा आप जैसे किस्से के रुप मे सुनाने का कष्ट करेंगे? ठीक है
कहो—-दादा जी, ऊ–जो बड़का-बड़का होडिंग में एक बुढ़े व्यक्ति के जो फोटो लगे रहते है, आँखों पर चश्मा, हाथ में छड़ी लेकर कहाँ-कहाँ घुमते-फिरते रहते हैं।

ऐ लल्ला, ऊ तो बहुते बड़े महान और अतुल्यनीय है! भाई वह हमारे देश के प्रति अपना प्राण तक गवाँ दिये। तो दादा जी, वह महान आदमी कौन है?

लल्ला, वह हमारे राष्ट्रपिता हैं। लोग उन्हें प्यार से बापू भी कहा करते है। उन हस्ति का नाम
है “महत्मा गाँधी “। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 ईo में काठियावाड़ (पोरबंदर) गुजरात में हुआ था। उनके पिता करमचंद्र गाँधी
काठियावाड़ रियासत के दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई परनामी वैश्य समुदाय के धार्मिक प्रवृत्ति की थी। तो क्या दादा जी,
उनकी पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई थी! जो ऐसे सिर्फ धोतिये पहन कर घूमते रहते!
अरे नहीं लल्ला …… ऐसी बात नहीं है। उन्होंने पढ़ाई में भी विस्तृत जानकारियाँ हासिल की है। उनकी शुरुआती शिक्षा गाँव के विद्यालय में ही हुई। उन्होंने मैट्रिक परीक्षा अहमदाबाद से उतीर्ण किया, फिर भावनगर शामल दास कॉलेज में नामांकन करा लिया। आगे की पढ़ाई वे विदेश जाकर पूरी की परंतु उनकी माता विदेश जाने से नाखुश थी पर वह नहीं माने
तो माता जी उनसे एक बात कही की कि “मदिरा मांस को हाथ न लगना। विदेशी यादोंं
को साथ न लाना”। बैरिस्टर की पढ़ाई उन्होंने लंदन में पूरी की।

दादा जी उनके और भी कोनो परिवार है क्या?अरे हाँ, है ना! गौर से सुनो वह जो है न कम उम्र में ही शादी कर ल। एक बात की बात तो यह है कि गाँधी जी की उम्र साढ़े 13 साल जबकि
उनकी पत्नी कस्तूरबा जी की उम्र 14 वर्ष थी। तो दादा जी इ अच्छा नहीं हुआ न! मेरी दादी जी कहा करती थी कि मैं अपने लल्ले
की शादी कम से कम 21वीं साल में करवाऊँगी और मेरी बहुरानी 18 से कम की नहीं होनी चाहिए। तो मैं कह रहा था कि उनके
चार पुत्र हुए– हरिलाल गाँधी, मणिलाल गाँधी, रामदास गाँधी और देवदास गाँधी।
दादा जी जब वह बड़े जमीन्दार खानदान से
ताल्लुकात रखते थे तो सिर्फ एक ही धोती क्योंं
पहना करते थे। लल्ला ये बहुत गम्भीर समस्या वाले प्रश्न तूने कर दिया! ये जो देख रहा है न हाथ में छड़ी, नंगे पाँव, एक ही धोती शरीर
मेः लपेटे ; वह दांडी यात्रा पर जब निकले थे तो उन्हीं का यह दृश्य है। हमारे देश पर फ़िरंगी का कब्जा था ही साथ ही उन्होंने हमारे देशवासी पर काफी अत्यचार भी कर रहे थे। फिरंगियों
द्वारा नमक पर कर (tax) लगाने की वजह से बापूजी ने नमक सत्याग्रह अन्दोलन
चलाया जो अहमदाबाद से दांडी गुजरात तक लगभग 388 किलोमीटर पैदल यात्रा कर स्वयं नमक उत्पन्न करने की योजना बनाई। लल्ला इसमें सरकार ने लगभग 60 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया ताकि
यह योजना असफल हो।

दादा जी, तो उनका जीवन बड़ा ही सादा होगा ।हाँ लल्ला, वे बिल्कुल ही शान्त स्वभाव के थे।
सत्य-अहिंसा के पुजारी थे। वह निरामिश भोजन करना अधिक पसंद करते थे। बेटा वह तो अपनी आत्म-शुद्धि के लिए 21 दिनों तक का भी उपवास किया करते थे। परिवार के किसी भी व्यक्ति के बीमार पड़ने पर उनकी
सेवा-सुश्रुषा में दिन-रात एक कर देते थे।
दादा जी वह तो बड़े-बड़े अन्दोलन भी किये होंगे? हाँ लल्ला …वह तो बड़े-बड़े नेताओं के सम्पर्क में रहते थे। उन्हें भी सभी बहुत चाहते थे और उनकी बात भी निराली थी। जहाँ खड़े
होते वहाँ महफ़िलें जम जाती थी। वह अपने जीवन-काल में अनेंको अन्दोलन किये। जैसे-खिलाफत अन्दोलन, खेड़ा अन्दोलन असहयोग अन्दोलन, नमक सत्याग्रह अन्दोलन, भारत छोड़ो अन्दोलन, हरिजन अन्दोलन आदि। अपने जीवन काल में कई बार सलाखों के पीछे रात गुजारे वह भी अपने नहीं सिर्फ हमारे देश के खातिर। अँगरेजों के द्ववारा गाँधी जी पर काफी अत्यचार भी किया गया परन्तु वह कभी
पीछे नहीं हटे। देश के प्रति सदा तत्पर रहते थे।एक बार की बात है जब वह ट्रेन पर
सफर कर रहे थे। वह प्रथम श्रेणी की वैध टिकट लेकर प्रथम-श्रेणी के कोच पर चढ़
गये। उन्हें वैध टिकट होने के बावजूद भी तीसरे श्रेणी के कोच में जाने कहा को गया। बापू जी सिर्फ जाने से इन्कार कर दिया तो पता है,
उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। इसमें
उनको काफी गंभीर नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा। ये सारी घटना उनके मन-मष्तिक में इस प्रकार समा गया कि वह अपने देश
के प्रति अपने मान-सम्मान पर प्रश्न चिन्ह समझने लगे। साथ ही वह अस्पृश्य्ता, शराब, अनभिज्ञता, अज्ञानता और गरीबी के प्रति लड़ते रहे। हमारे बापू जी ने ग्रामीण भारत को शशक्त, शिक्षित करने, छुआछूत के खिलाफ,
कताई-बुनाई एवं अन्य छोटे-छोटे कुटीर उधोगों को भी बढ़ावा देने में काफी लगनशील दिखते थे। दादा जी तो सच बात यह है कि अभी
जो हमलोग देख रहे है। बड़े-बड़े पोस्टर चौक-चौरहें पर लगी है। उसमे कुछ गरीब मजदूरों का भी चित्र अंकित है। जिसमें सिर पर टोकरी कंधे पर कुदाल दिखता है। हाँ लल्ला यही वह स्वारोजगार योजना है। जिसे गाँधी
जी वर्षों पहले स्वपना देखा करते थे। आज वह यह परिणाम सामने है, जिसका
नाम है “महात्मा गाँधी राष्ट्रीय स्वरोजगार योजना”। अब लोग अपने पंचायत के अन्तर्गत ही कार्य कर अपना भरण-पोषण करते हैं।
दादू जी, मैंने कहीं-कहीं देखा है कि वो चश्मे का
बड़ा सा आकार बना हुआ है और दोंनो शीशे जैसे आकार में कुछ अलग-अलग ही लिखा हुआ है। हाँ लल्ला! ये तो बड़े मजे की बात है। यह भी गाँधी जी के ही सपने थे। लोग कहा करते थे “‘मेरा भारत महान है”। पर हमारे बापू
जी कह रहे थे। “स्वच्छ भारत-स्वाथ्य भारत”।
यही उन चश्में की आकृति में लिखा है। एक बात लल्ला, वह स्वच्छता के प्रति इतना सचेत थे कि जब वह शौच करने जाते तो खुरपी भी
साथ ले जाया करते थे। उनका कहना था कि हमारा परिवेश साफ़-सुथरा हो। पर्यावरण में किसी प्रकार गन्दगी न हो। अगर पर्यावरण
अशुद्ध हो जाएगा तो हमारे मानव समाज में काफी कुपरिणाम नजर आने लगेंगे।
बच्चें-बूढ़े हमेशा बिमारी से ग्रसित होंगे। समाज में हमेशा उदासीनता छाया रहेगा। दादा जी, जब वह इतने अच्छे व्यक्ति थे, उनका चारित्र अच्छा था, वह सबका हमेशा भला ही
किया करते थे तो उन्हें मारा क्यों गया? वह किसी का क्या बिगाड़े थे। पर बेटा क्या करेगा, ये तो दुनियाँ का दस्तूर है, जो आया है, वह
एक दिन अवश्य जाएगा। परन्तु जो अच्छे होते हैं, जिनका कर्म अच्छा होता
है, ईश्वर भी उसे अत्यधिक पसंद करते हैं। वह भी चाहते हैंं कि इस मानव दलदल में सत्कर्म-पुरुषार्थ क्यों बोझिल हो रहा है? क्यों उन्हें अपने कर्मों का ढाढस बँधवाया जा रहा है परन्तु
कल क्या होगा किसने जाना है। वह रोज की भाँति पूजा-पाठ किया करते थे। सायं-कालीन पूजा कर वापस आ रहे थे कि विरला
हाउस में नाथूराम गोडसे ने उनपर तावड़-तोड़ गोलियाँ बरसाना शुरु कर दिया। एका-एक तीन गोलियाँ उनके सीने में दागी।आकस्मात 30
जनवरी 1948 में उनकी मृत्यु हो गई। जी दादा जी, मुझे बहुत नींद आ रही है मैं चला सोने। कल तो मुझे सुबह जल्दी उठना भी है।
दादा जी प्रणाम, शुभ रात्रि।

भोला प्रसाद शर्मा (शिक्षक)
डगरूआ, पूर्णिया
(बिहार)

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