गद्य गुँजन Jiwani,दिवस विशेष भिखारी ठाकुर : वंदना

भिखारी ठाकुर : वंदना



भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 को बिहार के सारण (छपरा) जिले के कुतुबपुर दियारा गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था। वे भोजपुरी भाषा के महान कवि, नाटककार, गीतकार, अभिनेता, लोकगायक और समाज सुधारक थे। उन्हें “भोजपुरी के शेक्सपियर” के नाम से भी जाना जाता है।
भिखारी ठाकुर ने औपचारिक शिक्षा बहुत कम प्राप्त की, लेकिन अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर भोजपुरी साहित्य और लोक रंगमंच को नई पहचान दिलाई। उन्होंने अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, बाल विवाह, जातीय भेदभाव, महिलाओं की स्थिति और प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को उठाया।
उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं:
बिदेसिया – प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों की पीड़ा पर आधारित।
बेटी बेचवा – दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर प्रहार।
गबरघिचोर – सामाजिक संबंधों और पारिवारिक संघर्षों को दर्शाता है।
भाई विरोध
गंगा स्नान
विधवा विलाप


भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी लोकनाट्य शैली “नाच” को लोकप्रिय बनाया और इसे सामाजिक जागरूकता का माध्यम बनाया। उनके नाटक गाँव-गाँव में खेले जाते थे और लोगों को सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सोचने के लिए प्रेरित करते थे।
10 जुलाई 1971 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएँ और लोक संस्कृति में उनका योगदान आज भी अमर है। आज भी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और भोजपुरी भाषी समाज उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ याद करता है।
भिखारी ठाकुर का प्रसिद्ध कथन:
“नाम भिखारी, काम भिखारी ना, समाज के आईना रहलें भिखारी।”
वे केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन के अग्रदूत और भोजपुरी संस्कृति के अमर नायक थे।
“भिखारी ठाकुर एक नाम नहीं, बल्कि भोजपुरी लोक संस्कृति, जनचेतना और सामाजिक परिवर्तन की एक सशक्त आवाज़ हैं।
उनकी रचनाएँ और नाटक आज भी समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं।
‘बिदेसिया’ से लेकर लोकनाट्य की समृद्ध परंपरा तक, उनकी विरासत सदैव अमर रहेगी।”


वंदना
प्राथमिक विद्यालय हासिमपुर बालक बरारी कटिहार।

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