एक प्रवेश : स्मिता ठाकुर



एक प्रवेश… जिसने शिक्षा का वास्तविक अर्थ समझा दिया

विद्यालय का कार्यालय उस दिन सामान्य दिनों की तरह ही व्यस्त था। कहीं प्रवेश प्रपत्र भरे जा रहे थे, कहीं प्रमाण-पत्रों की जाँच चल रही थी। औपचारिकताओं के उस वातावरण में अचानक दरवाज़े पर एक ऐसी दस्तक हुई, जिसने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के मन को भीतर तक छू लिया।

लगभग चौदह वर्ष की एक मासूम बच्ची अपने वृद्ध दादाजी का हाथ थामे कार्यालय में दाखिल हुई। उसका नाम कक्षा 9 में लिखवाना था। वह मेंटली चैलेंज्ड CWSN (Children With Special Needs) थी।

उसकी आँखों में मासूमियत का अथाह सागर था। चेहरे पर एक निष्कलुष मुस्कान थी, जो किसी परिचय की मोहताज नहीं थी। कभी वह अचानक ताली बजा देती, कभी खिलखिलाकर हँस पड़ती, तो कभी कमरे में रखी किसी साधारण-सी वस्तु को बड़े कौतूहल से निहारने लगती। उसकी हर हरकत उसके अपने संसार की भाषा थी।

कार्यालय में उपस्थित कुछ बच्चे उसे देखकर सहम गए। कुछ उसकी ओर उत्सुकता से देखने लगे, तो कुछ अनजाने भय से अपने अभिभावकों के पीछे छिप गए। यह भय उस बच्ची से नहीं, बल्कि उसे न समझ पाने का भय था।

उधर उसके दादाजी के चेहरे पर उम्र की झुर्रियों से कहीं अधिक वर्षों की चिंता की लकीरें थीं। वे बार-बार कागज़ों को सँभालते और फिर उस बच्ची को स्नेहभरी निगाहों से देखते। उनकी आँखों में एक ही प्रार्थना थी—”मेरी पोती को भी सीखने का एक अवसर मिल जाए… बस इतना ही काफी है।”

विद्यालय के शिक्षकों ने उस मौन प्रार्थना को शब्दों के बिना ही सुन लिया।

किसी ने बच्ची से मुस्कुराकर बात की, किसी ने उसे प्यार से बैठाया, किसी ने उसके दादाजी को आश्वस्त किया कि यह विद्यालय केवल मेधावी बच्चों का नहीं, बल्कि हर उस बच्चे का है, जो सीखने का अधिकार रखता है। उस क्षण शिक्षक केवल अपने दायित्व का निर्वहन नहीं कर रहे थे, बल्कि शिक्षा की आत्मा को जी रहे थे।

कुछ ही देर में कार्यालय का वातावरण बदल चुका था। जो निगाहें पहले आशंका से भरी थीं, उनमें अब अपनापन उतर आया था। मुस्कानें सहज हो गई थीं। मानो उस बच्ची ने बिना एक शब्द बोले सबको संवेदनशीलता का पाठ पढ़ा दिया हो।

प्रवेश की सारी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थीं। तभी कार्यालय के बाहर से एक नन्ही-सी आवाज़ आई—

“दीदी… चलो, घर चलते हैं।”

वह उसकी छोटी बहन थी।

वह धीरे से भीतर आई, अपनी दीदी के पास पहुँची और बड़े प्यार से उसका हाथ थाम लिया। उसने स्नेह से उसके बिखरे बाल सँवारे, पानी की बोतल उसके हाथ में दी और मुस्कुराते हुए उसे चलने का इशारा किया। उस छोटी-सी बच्ची के चेहरे पर उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता थी। वह बहन कम, अपनी दीदी की संरक्षक अधिक लग रही थी।

यह दृश्य देखकर कार्यालय में उपस्थित कई आँखें अनायास ही नम हो उठीं। उस नन्ही बहन के स्नेह ने मानो यह घोषणा कर दी कि प्रेम का सबसे बड़ा विद्यालय परिवार ही होता है।

दादाजी ने जाते-जाते एक बार पलटकर विद्यालय की ओर देखा। उनकी आँखों में अब चिंता नहीं, विश्वास था। विश्वास इस बात का कि उनकी पोती को केवल एक विद्यालय नहीं, बल्कि अपनापन देने वाला परिवार मिल गया है।

उस दिन विद्यालय के कार्यालय में केवल एक बच्ची का प्रवेश नहीं हुआ था, बल्कि मानवता ने शिक्षा के मंदिर में प्रवेश किया था।

हम अक्सर बुद्धिमत्ता को अंकों से मापते हैं, पर उस मासूम बच्ची ने सिखा दिया कि सबसे ऊँची बुद्धिमत्ता संवेदनशील हृदय में बसती है। उसने यह भी बता दिया कि समावेशी शिक्षा कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे करुणा, सम्मान और स्वीकार्यता का सबसे सुंदर रूप है।

उस दिन कोई भाषण नहीं हुआ, कोई पुरस्कार नहीं बाँटा गया, फिर भी वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति अपने भीतर एक अमूल्य सीख लेकर लौटा—कुछ बच्चे हमारे विद्यालय में पढ़ने नहीं आते, वे हमें इंसान बनाना सिखाने आते हैं।

स्मिता ठाकुर
विद्यालय अध्यापिका
उच्च माध्यमिक विद्यालय कर्णपुर, सुपौल

0 Likes
Spread the love

Leave a Reply