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उधार की जिंदगी



रात के दो बजे है । निशाचर झींगुर लयबद्ध होकर अपने बच्चों को लोरी सुना रहा है “ट्रिर्र-ट्रिर्र..ट्रिर्र-ट्रिर्र..ट्रिर्र-ट्रिर्र…..।दूर खेतों में अंधेरी काली रात डर के मारे थर-थर कांप रही है । पेड़ -पौधे ख़ामोश है। पासवान टोला गहरी निद्रा में सोया हुआ है। लगातार बारिश से बिजली गुल है। धरती नींद से बोझिल है । आसमान में काले बादलों का साम्राज्य स्थापित हो चुका है । निसिभाग रात में कभी- कभार टोले के बीच से कुत्ते की भौंकने की आवाज आती है -भू.भू..भू..भुऊ..भू..भू..भू…भूऊ । बरामदे पर मास्टर रविंदर के पिता जीतन दास ऐसी गहरी निद्रा में सोए हुए हैं । जिस निद्रा से आजतक कोई नहीं जगा है । बग़ल में अगरबत्ती जल रही है । रविंदर दीवार से सटी सीढ़ी पर बैठकर खुद से बातें कर रहा हैं । _ इ..बाऊ. को. अगर. मरना. ही .था , तो.महीने.के.शुरूवात.में.मरते..। .मगर ..नही..ये.. मरेंगे..महीने.के.आखिरी. में । अभी.तो.ठीक.ढंग.से. एबसेंटी. भी.जमा.नही.हुआ.है । अब..हम.. कहां ..से. क्या.करें..? । दस तारीख को बैंक लोन काट लेती हैं। बचे -खुचे पैसे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ,दवा-दारू पर खर्च हो जाते हैं । उसके बाद तो हाथ -मुटठी एक दम छूछ। अब हम इ बाऊ का दाह संस्कार कैसे करे ?। भिखना का टेंपू भाड़ा पर लेना होगा। फिर पेट्रोल पंप के दिनेश मेहता से लकड़ी लाना पड़ेगा..।बैण्ड पार्टी के मूलगेन चिचाय राम को भी बुलाना पड़ेगा । उ.आएगा तो एक- दो ठो समदन गाएगा और फिर ठीठीयाते हुए कहेगा..हीहीहीही …मास्टर साहेब चार हजार..टेका….भेल…पैसा.दायके….हमरा. सब. के.कनी.जल्दी.विदा..करु. । खोजरीयो में एक ठो मरकी छै:। हूंह.. इसको तुरंत पैसा चाहिए।मेरे दादा जी के दाह-संस्कार में भी इ चिचाय राम और इसकी मंडली इतने खेला किया था ..।’रविंदर मास्टर मन ही मन बुदबुदाये जा रहे थे ।’दूसरी तरफ़ वो सोच रहे थे – हर तकलीफ में जो पिता परिवार के लिए कवच बने रहते थे, आज वो कवच टूट चुका है । जब वो थे तो मैं निश्चिंत था । उनकी छत्रछाया में हम बचपन से अभी तक उन्मुक्त गगन के पंछी ही थे । मेरे बच्चों का लालन-पालन उनकी पढ़ाई -लिखाई , उन्हें स्कूल छोड़ना, उनकी ज़रूरतों की पूर्ति से लेकर खेती -किसानी के सारे कार्य पूर्ण करवाने की ज़िम्मेदारी वो बखुबी निभा रहे थे ।मेरी छड़ी या डांट -डपट से बचने के लिए मेरे बच्चों का सबसे बड़ा ढाल भी मेरे पिताजी ही थे ।बुजुर्ग पिता दरवाजे पर लाठी लेकर भी बैठे थे, तो मैं दुनियां का शक्तिशाली इन्सान था । मगर अब … असहाय व निर्बल हो जाऊंगा।भोज खाने में थोड़ी विलम्ब हो जाय तो बाबूजी का फोन तूरंत घनघना उठता था। कते. छ: आबअ..ने..घर….। रात.. हो.. गेले..मोरलिंग..स्कूल..चले..छ:..सवेरे..सुतभो..तब..ने..सबेरे..उठभो..।अब कौन मेरी फ़िक्र करेगा ।अब तो मैं टुगर हो गया हूं… ।सिसक पड़े थे रविंदर मास्टर।मेहनत -मजदूरी कर चिथड़े पे सोनेवाले पिता ने हमेशा उसके लिए गद्देदार बिछावन का सपना देखा था । जो कमोवेश साकार भी हुआ …।

२ रविंदर मास्टर अजीब उलझन में थे । वे सोच रहे थे अगर बाऊ.के.दाह.संस्कार. के .लिए पासवान. टोला. में .किसी से पईंचा- उधार मांगेंगे, तो इलोग भर दुनियां ढिंढोरा पीट देगा । कहेगा इ रविन्द्रर मास्टर के सुखले फुटानी है । इसका बुरहवा मरा तो इसके घर में एगो फुट्टी कोरी नहीं था । दाह-संस्कार में हम ही दिये थे कफ़न के लिए पैसा।अरे बाफ रे ! ना .. इ लोग से कभी..मदद नही.. मांगेंगे ।रविंदर मास्टर को पड़ोसी सकलचंद साह पर रह- रह कर ग़ुस्सा उठता है। सकलचंद साह अपनी सेखी बघारने या यू कहे तो ख़ुद को ऊंचा और उसे नीचा दिखाने के लिए अक्सर उससे कहा करते थे – हो रबेन भाय आप मास्टर है , मास्टर के तरह रहीये । क्या ई टाट-फरक वाला घर में रहते हैं। हमको देखिए नौकरी नहीं है । गुमटी हटिया में आलू ,प्याज ,साग ,सब्जी बेचते हैं । मगर फिर भी दो कोठली का मकान बना लिये है । उसी के बहकावे में आकर रविंदर मास्टर बैंक से लोन लेकर घर बनाये है । जब से लोन लिये है उनका वेतन लकुवा ग्रस्त हो गया है। जो जिंदा तो है मगर खिसट -खिसट कर जिए जा रहे हैं।

३ उधर अंधेरे की विदाई हो गई थी , प्रकाश ने अपना मोर्चा संभाल लिया था । चहकती चिड़ियों का झुंड सुबह की मनोरम धूप का स्वागत कर रहा था।”। इधर रविंदर के मन में गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा था ।दाह-संस्कार कैसे होगा ? । एकाएक पैसे का प्रबंध कहां करें ?। कहां हाथ फैलाए? ।किससे कहें ? ।तभी पड़ोसी शंकरपुर वाला जनार्दन एक बड़ा सा सूची रविंदर के हाथ में थमा दिया । उसमे लिखा था- तिल,जौं,कोड़ी,सरेर ,घी,चन्दन,मटकुरी ,उजला धोती , पताका और भी ढ़ेर सारा अगड़म -बगड़म । जाते-जाते जनार्दन बोले –मास्टर हो ,जल्दी जाइए भरगामा हटिया ,मिथलेश श्रीवास्तव के दुकान से सारा चीज़ फ़ौरन लेकर आइए।लहाश को ज्यादा देर तक दरवाजे पर रखना ठीक बात नही है। जैसे-जैसे दिन चढ़ने लगा , रोने-धोने की आवाजें बढ़ने लगी । फिर धीरे-धीरे रिश्तेदारों की झुंड भी आनी शुरू हो गई । जो गरीब रिश्तेदार थे वो सबसे पहले आकर काम में जूट गए थे । कुछ बांस काटने लगे थे , तो कुछ बत्ती बना रहे थे । बीजो फूफा उन बत्तीयों को अर्थी का आकार देने में लगे हुए थे ।। अमीर रिश्तेदार अंतिम दर्शन की खानापूर्ति कर आस-पास के गांव में अपने दूसरे रिश्तेदारों से मिलने चले गए थे । उसमें से कुछ वापस घर भी लौटने लगे थे । ४जनार्दन बुढ़वा जो लिस्ट दिया था , दीजिए तो ? । रविंदर मास्टर की पत्नी पिपरावाली रविंदर की तंद्रा भंग करते हुए बोली।रविंदर किसी हारे हुए खिलाड़ी की तरह लिस्ट पिपरावाली की ओर बढ़ा दिया।रविंदर पत्थर की तरह ख़ामोश पड़ा रहा । दाह-संस्कार की सारी जिम्मेदारी पिपरावाली ने अपने कंधे पर उठा लिया था। दिनेश मेहता के यहां से लकड़ी लाई गई। मिथलेश के यहां से दाह-संस्कार का सामान । चिचाय राम का बैण्ड पार्टी और नूर मुहम्मद के यहां से बम-पटाखे । देखते ही देखते सारा प्रबंध कर ली थी पिपरावाली ने ।रविंदर आश्चर्यचकित था। आखिर पिपरावाली ने पैसे का प्रबंध कैसे किया ? ।पासवान टोले में किसी से पईंचा-उधार तो नहीं लिया ?। रामसरूफ आते ही रविंदर से बोला सोंठी लाए हैं की नही ? । लखना रविंदर के बग़ल में बैठते हुए बोला नूर मुहम्मद से दस ठो बम काहे नहीं ले लिए भिया । मोहना कैची से कागज का झालर काटते हुए बोला – रमन पोद्दार के दुकान से खुदरा पैसा ले लीजिए। अर्थी के आगे -आगे लुटाते जाइएगा। …घर में भूजी भांग ने चौराहा पर नाच । जितनी मुंह उतनी बातें । जीतन की अर्थी उठी तो परिवार के सदस्यों के साथ -साथ बच्चों की चित्कार फुट पड़ी । रविंदर की आंखें सूजी हुई थी मगर उसमें आंसू का नामोनिशान नहीं था । उसे मालूम था अब वो परिवार का मुखिया हैं अगर उसने हिम्मत हार दी तो परिवार बिखर जाएगा । जीवन में ऐसे बहुत से दुख की घड़ी आती है जहां पुरुष परिवार को दिखाने के लिए अपना दिल कठोर कर लेता है । मगर अकेले में फूट-फूटकर रोता है । छोटे बच्चे अर्थी के आगे- आगे लाल पताका गाड़ते जा रहे थे । राम नाम सत्य के नारे के साथ जीतन दास का पार्थिव शरीर अपनी अंतिम यात्रा पर आगे बढ़ रहा था । कुछ लोग दूर से ही अर्थी को प्रणाम कर रहे थे ।

५बस्ती में लोग गोनर पासवान का कोई महत्व नहीं देते हैं । मगर जब टोले में कोई मर जाए तो गोनर का महत्व काफी बढ़ जाता है । क्योंकि लाश जलाने का तजुर्बा बस्ती के अंदर अब सिर्फ गोनर के पास ही बच गया है । चिता कैसे सजाना है , गड्ढा कितना खोदना है। केला का डमपोच कैसे रखना है। बांस का खूंटा कैसे ठोकना है । लाश को किस मुंह रखना है ,उसके ऊपर लड़कीयों को कैसे जमा करना है । और फिर लाश जब तक पूरी तरह से जलकर समाप्त न हो जाए गोनर मरघट में ही बैठा रहता है। उसकी आंखें मुर्दा जलाने के वक्त काफी क्रूर हो जाती है । उसके चेहरे विकराल हो जाते हैं । बांस के लंबे खोंचे से जब वह जलती चिता की बिखरी लकड़ियों को एकत्रित करता है तो ऐसा लगता है मानो वह साक्षात जमराज हो । उसवक्त उनका काला कलूटा , रौबदार घनी मूंछों वाला चेहरा और भी डरावना लगने लगता है। लगभग लोग तो आजकल चिता में आग पड़ते ही वापस अपने-अपने घर आकर नहाने -धोने लगते हैं । अब लोगों को फुर्सत कहां? । बस गोनर बचा है जो मरघट में डटा रहता है ।जीतन की चीता की लपटें आसमान से बातें कर रही थी । चिचाय राम की मंडली समदन गा रहे थे ।..माटी.. के. इ .बनल .शरीरीया. माटी. में. मिल. जाई. हो .भाई ..केयो.कुछो. लेके .नहीं. जाई … ।गोनर, जलती चिता में खोचा मारता हैं और फिर बैठकर खैनी खाने लगता हैं। एक नम्बर का फुचीयहा है गोनर । अगर उसके काम में कोई दखल अंदाजी किया तो वो लाश जलाना बीच में ही छोड़कर भाग जाएगा। मरघट में वह खैनी का पिच मारते हुए जालेश्वर से बोला — अब इसमें क्या बचा है भैया सिर्फ ठठरी है ठठरी । इन्सान का सारा घमंड यहां आकर चकनाचूर हो जाता है । हम सब तो मिट्टी के पुतले हैं भिया। कितना भी बाफ- बाफ कर लीजिए, कितना भी बेईमानी ,शैतानी ठक- फूस, कीजिए। कितनों अमीरी-गरीब ,ऊंच नीच का चोला ओढ़ीये मगर यहां आकर सब सोहा…।

६ जी मुंह छान कर , पाई-पाई रूपैये जो पिपरावाली ने जमा किए थे। वह सब रुपए बुढ़े के दाह संस्कार में समाप्त हो गये । मास्टर रविंदर को पता चल चुका था की जो दो-चार पैसे पिपरावाली कभी-कभार उससे मांग कर लेती थी । वह उस पैसे को खर्च करने के बजाय जमा किया करती थी । आज वही पैसा वक्त पर काम आया। सफेद धोती, अर्धनग्न शरीर ,गले में हल्का हाथ में बांस की करची लिए रविंदर दरवाजे पर बैठा है । और सोच रहा है एक अकेला आदमी पीठ पर ढेरों भार उसपर अब एक और भार पड़ने वाला है । मंहगाई की मार से कमर तो पहले ही टेढी हो गई है। मगर फिर भी अपनी प्रतिष्ठा तो बचानी ही पड़ेंगी ।10 रोज बाद क्रिया- कर्म , भोज भात को लेकर पूरी बस्ती की बैठकी हुई । लोगों ने एक सूर में कहा — अरे रविंदर मास्टर का बाप दोबारा थोड़ी न लौट कर आएगा। होगा तीन सांझ एकदम धमगिजर भोज । अंततः बैठकी में तीन सांझ भोज देने का प्रस्ताव पारित हुआ । कार्ड छपवाई गई। सारे रिश्तेदारों को बुलाया गया । कोई छूट न जाय या भोज में कोई कमी न रह जाए इस बात का पूरा ख्याल रखा गया। भोज समाप्त हुआ, रिश्तेदार अपने-अपने घर गये । टोले के कुछ लोग ने भोज की बड़ाई की तो कुछ ने कमीयां गिनवाया। मगर इन सब के बीच रविंदर और उसका परिवार कर्ज के दलदल में थोड़ा और नीचे धंस गया है। समय के साथ जिम्मेदारीयों का बोझ बढ़ता ही चला जाएगा। आनेवाले समय में वह इस दलदल से निकलने के लिए जितना हाथ -पांव मारेगा वह उतना ही और धंसता चला जाएगा ।

अरविंद, भरगामा

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