गाँव के एक सरकारी विद्यालय में रमेश नाम के शिक्षक अन्य शिक्षकों की तरह वे भी पढ़ाते थे। उसकी सादगी, लगन और शिक्षण शैली के कारण बच्चे उसे बहुत पसंद करते थे। लेकिन विद्यालय के कुछ सहकर्मी उसकी विधियों को व्यर्थ समझते और कहते, “रमेश जी, इतना परिश्रम करने से क्या लाभ? बच्चे तो अंत में वही रटकर परीक्षा में पास होंगे!”
शिक्षक मुस्कुरा देते और कहते, “शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि जीवन में ज्ञान का उपयोग करना है।”
एक दिन गाँव में एक बड़ा मेला लगा। वहाँ बहुत सारे खेल और प्रतियोगिताएँ आयोजित हुईं। मेले में एक बूढ़ा व्यापारी एक अनोखी प्रतियोगिता लेकर आया। उसने कहा, “जो भी इस पहेली को हल करेगा, उसे मैं इनाम दूँगा!” उसने एक जटिल गणितीय प्रश्न रखा, जिसे सुलझाने में बड़े-बड़े विद्वान भी असमर्थ दिखे।
तभी रमेश के विद्यालय के एक छात्र, छोटू, ने हाथ उठाया और धीरे-धीरे अपनी कॉपी में हल कर दिखाया। बूढ़ा व्यापारी चकित रह गया और बोला, “तुमने यह हल कहाँ सीखा?”
छोटू ने गर्व से कहा, “मेरे गुरुजी ने हमें ज्ञान को समझकर सीखने की प्रेरणा दी है।”
रमेश दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसके सहकर्मी, जो उसकी शिक्षण पद्धति पर संदेह करते थे, अब शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। उन्होंने स्वीकार किया कि शिक्षा केवल रटने का नहीं, बल्कि समझने और व्यवहार में लाने का विषय है।
शिक्षा: ज्ञान की सच्ची पहचान परीक्षा के अंक नहीं, बल्कि जीवन में उसका प्रयोग करने की क्षमता है।
सुरेश कुमार गौरव
प्रधानाध्यापक, उ.म.वि.रसलपुर, फतुहा, पटना (बिहार)