बहुत दिनों तक मैंने सोचा कि मदद करना ही मेरा धर्म है। कोई पुकारे तो दौड़ जाना,कोई माँगे तो अपना समय,अपनी क्षमता,अपना सब कुछ दे देना। मुझे लगा, यही अच्छाई है।
पर धीरे-धीरे समझ आया, हर कोई मदद नहीं माँगता, कुछ लोग बस इस्तेमाल करना जानते हैं।
जब तक उनको जरूरत होती है वो मुझे सबसे अच्छा मानते हैं। मेरे विचारों का इंतजार करते हैं। मेरे सुझावों पर अमल करने का ढोंग कर मेरी तारीफ भी करते हैं,क्योंकि मेरे काम से उनका काम निकलता था। और मैं… मैं खुश होती थी कि चलो, किसी के काम आई। मेरा आज का दिन अच्छा गया।
फिर काम खत्म,और मैं भी खत्म।
न फोन,न हाल,न शुक्रिया। जैसे मैं कभी थी ही नहीं। भीड़ में साइड कर दी गई। एक कोने में।
उस वक्त जो खालीपन लगता है ना, वो शब्दों में नहीं बता सकते। लगता है जैसे मेरी काबिलियत नहीं, मेरी मजबूरी थी सबके लिए उपलब्ध रहना।
आज फिर एक घटना ने मन में उदासी भर दी है। कई दिनों के विचारों को अंततः आज लिखने पर मजबूर हो गई।
मेरा दुख ये नहीं कि लोगों ने मेरा इस्तेमाल किया। मेरा दुख ये है कि मैंने खुद को इतना सस्ता कर दिया कि हर कोई खरीद ले।
लेकिन ,लेकिन, लेकिन
अब नहीं।
अब मैंने फैसला किया है कि अफसोस करते हुए, रोते हुए नहीं,जागते हुए और बकायदा जोरदार गरज के साथ हर उस इंसान को बेनकाब करूंगी जिन्होंने मेरी अच्छाइयों को सीढ़ी बनाकर मंजिल हासिल की है। उन्हें चेतावनी ही है कि आगे से मुझसे कोई मदद की उम्मीद न रखे और यदि भूलवश मैने कभी मदद कर भी दी तो सार्वजनिक रूप से उसे स्वीकार भी करे अन्यथा मैं लिखने पर आ गई तो चेहरे के नकाब उतर जाएंगे।
अब से मेरी नीति यही होगी कि अपने कार्यों का मूल्य सबसे पहले मुझे ही तय करना होगा और तभी दूसरे से भी करवा पाऊंगी।
तो आज से मैं
अपनी ऊर्जा वहीं लगाऊँगी जहाँ उसकी कद्र होगी।
जहाँ मेरे “हाँ” की कीमत समझी जाए, मेरे “ना” की भी इज्जत हो।
जहाँ मेरे होने से फर्क पड़े, सिर्फ मेरे काम से नहीं।
जहाँ मुझे याद तब नहीं, हमेशा किया जाए।
*मैं दीया हूँ स्वरा जलूँगी जरूर…… पर अब हर अंधेरे के लिए नहीं, सिर्फ उस घर के लिए जहाँ मेरे उजाले को संभाल कर रखा जाए।…..(डॉ स्वराक्षी स्वरा)
क्योंकि “जलाते चलो” का मतलब खुद को खत्म कर देना नहीं है,
इसका मतलब है – सही जगह पर रोशनी बनना।
इस्तेमाल करने वालों सावधान!
डॉ स्वराक्षी स्वरा
खगड़िया बिहार